हमारे शरीर की ऊर्जा – व्यवस्था

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हमारे शरीर की ऊर्जा – व्यवस्था (Energy System of our body)

आधुनिक विज्ञान ने प्राणी जगत पर बहुत शोध किया है; पर उसकी समस्त जानकारियों का स्रोत शरीर की स्थूल भौतिक संरचना है। वह केवल स्थूल शरीर के आंतरिक स्थूल अंगों की क्रिया जानता है। इस सम्बन्ध में भी उसका ज्ञान आधा-अधूरा और भ्रम से भरा हुआ है। उसे ज्ञात नहीं कि जीवन और मृत्यु क्या है, क्यों है? हमारे जीवन का मुख्य आधार तत्व क्या है? हमारा शरीर एक व्यवस्था में क्रिया करता है, वह व्यवस्था क्या है , क्यों है? यही भारतीय सनातन धर्म का विषय है।

इसका उत्तर भारतीय तत्व विज्ञानं देता है। वह कहता है कि हमारा या इस ब्रह्माण्ड की किसी भी इकाई का शरीर एक ही ऊर्जा – संरचना में बनता है। यह एक व्यवस्थित संरचना है और प्रत्येक में एक ही है। इसकी उत्पत्ति और विकास से लेकर क्रिया तक के नियम एक ही है। ( देखें मृत्यु के बाद)

सनातन तत्व विज्ञानं कुछ आश्चर्यजनक वैज्ञानिक तथ्यों के रहस्य बताता है। वह कहता है कि नेगेटिव-पॉजिटिव अणुओं या ऊर्जा धाराओं के मिलन से एक विस्फोट होता है और किसी भी इकाई का शरीर निर्मित होता है। इस शरीर में जब ब्रह्माण्ड का नाभकीय कण (आत्मा) समा जाता है, तो वह जीवित हो जाता है और क्रिया करता हुआ अपना पोषण और विकास करता है । इस ब्रह्माण्ड की भी उत्पत्ति ऐसे ही हुई है और इसी प्रकार वह अपना विकास कर रहा है।

यह संरचना ही जीव है । वास्तव में ‘जीव’ तो ब्रह्माण्ड का नाभकीय कण है, वही शरीर के केंद्र में बैठकर इसका संरचना करता है। चूँकि सभी  इकाई की संरचना एक ही है, इसलिए सभी ‘जीव’ है। यहाँ निर्जीव कि सत्ता नहीं है।  यह एक प्रमाणित सत्य है। इस पर मैंने वर्षों खोज की है और प्रमाण पाए है। हमारे आधुनिक वैज्ञानिकों को प्रमाण इसलिए नहीं मिले रहे कि वे अलग-अलग इकाइयों का अध्ययन कर रहे है। जिस दिन वे सोचेंगे कि आखिर विकसित जीवों के बाहरी और आंतरिक शारीरिक अंगों में , उनके क्रम में , उनकी क्रिया में , उनके गुणों में समानता क्यों है , तो अचानक उन्हें वह मार्ग मिल जाएगा, जो सत्य तक ले जाए।

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