सिद्धियों ऊर्जाचक्रों का शुद्धिकरण और न्यास

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आप कोई भी सिद्धि करना चाहते है, आपको गुरु के द्वारा दो प्रकार कि शुद्धि प्रक्रिया से गुजरना होगा। इन प्रयोगों को अनेक प्रकार की पूजा विधियों में विस्तृत आयर कठिन बना दिया गया है। मैं इन सबको गहरा अध्ययन करके स्वयं पर अनुभव करने की भी कोशिश की और इस नतीजे पर पहुंचा कि अलग-अलग मार्गों में विधि प्रकिया को जटिल बनाने की जैसे होड़ लगी हुई है। यह अपने मार्ग को दूसरे से श्रेष्ठ दिखाने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। इनका पालन हर युग में असंभव रहा है और आज तो ये और कठिन हो गये है।

आधुनिकता के अनुसार खोज यह है कि प्रक्रिया को वैज्ञानिक सूत्रों पर कस कर छोटा करें। दांत साफ़ करके दतवन कैसे फेंकना चाहिए और शौच के समय कैसे बैठना चाहिए, फूल कैसे फेंकना चाहिए का कोई औचित्य नहीं है। उस पर मैंने तन्त्र के औषधियों सूत्रों को अपना कर न केवल छोटा कर दिया, बल्कि सामान्य व्यक्तियों के लिए भी सरल कर दिया है।

शारीरिक शुद्धि – गुरु दक्षिणा के समय सबसे पहले गुरु की पूजा दोनों द्वारा की जाती है। इसके बाद गुरु निर्देशन में शुद्धि प्रक्रिया होती है।

.ब्रह्म मुहूर्त में उठना, ताम्बे के पात्र में खुले आसमान के निचे रखा जल पीना, टहलना, शौच, दंत मंजन आदि के बाद पहली शारीरिक शुद्धि स्नान कर्म से शुरू होती है। अधिक उम्र और स्वास्थ  मानसिक स्थिति पाने की इच्छा रखने वालों को रात में सोने से पहले दोनों कान, सिर के चाँद और गुदा मार्ग में निम्बू का पत्ता डालकर उबाला गया घी या आम या कटहल का पत्ता डाल कर  उबाला गया सरसों तेल पर्याप्त मात्रा में प्रतिदिन डालना चाहिए।कब्ज, वायु, आदि के दोष का ध्यान रखें। शारीरिक कष्ट और कब्ज इत्यादि के लिए धर्मालय देखें।

स्नान विधि – काली या पीली मिट्टी को पानी में घोलकर इसमें मदार का पत्ता कूटकर डालें, घोंटे और छानकर रात भर छोड़ दें।  नीचे बैठी मिट्टी से पूरे शरीर पर मल मल कर मर्दन करें।मंत्र ‘हूँ अस्त्राय फट’ है।

इस मिट्टी के सूखने पर ताजे जल से स्नान करें। मंत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ है। आँखें बंद करके सिर से पानी की धर डालें और उसे चन्द्रमा से गिर रही ऊर्जा धारा सोचे। बंद आँखों से वे धाराएं ऊर्जा धारा की तरह चमकती शरीर से बहती नजर आएगी! कल्पना करें कि वह सारी प्रदूषित ऊर्जा को बहाए लिए जा रही है। कुछ लोग इसके बाद मंत्र स्नान भी करते है। कुछ भस्म स्नान भी; पर यह कोई आवश्यक क्रिया नहीं है। पंथ विशेष की क्रिया है।

भूत शुद्धि(ऊर्जा संरचना की शुद्धि)

सुखासन में बैठे कर 32 बार कुम्भक-रेचक करें। फिर कल्पना करें कि आप जलती चिता पर बैठे है और आपकी नाभि से अग्नि प्रज्वलित होकर लपलपा रही है। ‘ह्रीं’ जपते हुए उन लपटों को मानसिक बल से कल्पना में इतना बढाएं, कि आपका सम्पूर्ण शरीर भस्म हो गया हो; यह अनुभूत हो।फिर ‘स्त्रीं’ जपते हुए कल्पना करें कि वायु की तेज धारा उन भस्मों को उड़ा ले गयी। फिर कल्पना करें कि आप एक ज्योति मात्र रह गये है। ज्योतिमय सूक्ष्म शरीर मात्र है। फिर कल्पना करें कि शिव जी आपके ऊपर है और उनकी जटा की अमृत धारा चाँद से गिरकर ऊर्जा शरीर को धो रही है। यह (हूँ) मंत्र करें।

मंत्र 1. ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं फट स्वाहा

  1. ॐ स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं फट स्वाहा
  2. ॐ हूं हूं हूं फट स्वाहा
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