पुतली तंत्र (क्रमांक 3) समुद्र मंथन का रहस्य

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शरीररूपी समुद्र से अमृत और विष की प्राप्ति

पुतली तंत्र के क्रमांक १ एवं २ में वर्णित विवरणों के साथ अभिचार कर्म में कुछ अन्य सूत्र भी जानना जरूरी है. ये विवरण तिथियों एवं दिशाओं से सम्बंधित हैं. ये विवरण केवल अभिचार कर्म के लिए ही नहीं हैं. इनको जान कर सामन्य स्त्री-पुरूष भी अपने शरीर में अमृत उत्पादन बढ़ा कर दिव्य सक्तियों को प्राप्त कर सकते हैं और उन्हें किसी सिद्धि की आवश्यकता नहीं है.

षट्कर्म के देवता

शांति, वशीकरण, स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन और मारण – ये छै षट्कर्म कहे जाते हैं. इनके देवता क्रमश:- रति, वाणी यानी सरस्वती, रमा, जेष्ठा, दुर्गा एवं महाकाली हैं.

यहाँ एक बात स्पष्ट समझनी चाहिये. कोई भी देवी-देवता ऐसे नहीं हैं, जिनकी सिद्धि के बाद षट्कर्म नहीं किये जा सकतें हों. केवल मन्त्रों में अंतर आ जाता है. पर छै कर्मों में उनके रूप एक से नहीं होते. शान्ति में सौम्य, वशीकरण में मादक, मोहक, स्तम्भन में जड़, विद्वेषण में कुटिल, उच्चाटन में क्रूर और मारण में उग्र होता है.

देवता के मूल मन्त्र की सिद्धि होने पर भी इनके मन्त्रों की सिद्धि अलग से करनी होती है, क्योकि ये मूल मन्त्र से बदले होते हैं.

ऋतुकाल एवं दिशाओं का समायोजन

उपर्युक्त दिए क्रम से षट्कर्म के लिए – ईशान, उत्तर, पूर्व, नैरित्य, वायव्य, एवं दो अंतिम के लिए आग्नेय प्रशस्त होती हैं.

ऋतू का क्रम हेमंत, वसंत, शिशिर, ग्रीष्म, वर्षा एवं शरद है. ऋतुएं वर्ष में छै होतीं हैं. एक ऋतु दो महीने की होती है, जो ज्योतिष से जानी जा सकती है; मगर एक दिन-रात में भी ये सुर्योदय काल से चार चार घंटे के अंतराल से बंटी होतीं है.

मन्त्रों का संयोजन

ग्रंथन-इसका उपयोग शांति कर्म में होता है . फिर साध्य  के नाम का एक अक्षर करके मन्त्र का समायोजन किया जाता है .

विदर्भ-यह वशीकरण में प्रयुक्त किया जाता है. इसमें मन्त्र के दो अक्षरों के बीच साध्य के नाम का एक अक्षर होता है.

सम्पुट-नाम के आदि और अंत में मन्त्र लिखने या जपने को कहते हैं. यह स्तम्भन में प्रशस्त है.

रोधन- यह विद्वेषण में प्रयुक्त होता है. इसमें नाम के आदि, मध्य और अंत में मन्त्र लिखा जाता है.

योग- उच्चाटन में इसका प्रयोग होता है. इसमें मन्त्र के अंत में नाम लिखा जाता है.

पल्लव- नाम पहले, मन्त्र बाद में हो तो इसे पल्लव कहा जाता है. यह मरण में प्रयुक होता है.

जन साधरण के लिए उपयोग

कोई भी स्त्री पुरुष अपने शरीर के के अमृत विन्दुओं का प्रतिदिन नहाते समय या पूजा के समय जल से “हूँ अस्त्राय फट” मन्त्र से न्यास करे, तो १०८ दिन में सौन्दर्य, स्वास्थ्य, चमक के साथ अपने उर्जा समीकरण के अनुसार कई दिव्य शक्तियों को प्राप्त करेगा.

इसी प्रकार रोग दूर करने में, औषधि खाने में, रतिकाल में, भोजन में इनका उपयोग करके विलक्ष्ण शक्ति की प्राप्ति की जा सकती है.

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One Comment on “पुतली तंत्र (क्रमांक 3) समुद्र मंथन का रहस्य”

  1. बहुत ग्यानवर्धक संकलन है आचार्यश्री
    अच्छी शिक्षा मिलती है हमें आपसे , बहुत आभार आपका

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