श्री लक्ष्मी विनायक यंत्र

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इनका यंत्र और कुबेर का यंत्र साथ होने पर एक साथ ही स्थापित किया जाता है। लक्ष्मी जी का आसन लाल कपड़े का होता है, कुबेर का पीले का यानि यंत्र के पीछे दीवाल पर इस रंग का कपड़ा लगायें या पूजा में नीचे ऐसा कपड़ा डालें। कपड़ा न डालने से भी काम चलेगा। पूजा की थाल में लक्ष्मी जी के लिए सिन्दूर-कुमकुम , कुबेर के लिए हल्दी मिला सिन्दूर डालना चहिये।

यह यंत्र लक्ष्मी या महा लक्ष्मी यंत्र से भिन्न है। इसमें गणेश जी और लक्ष्मी जी, दोनों साथ है। वैसे गणेश जी मानसिक शक्ति है और लक्ष्मी शारीरिक। इन दोनों के मिलने से मन मस्तिष्क और शरीर में इनकी कृपा दौड़ती है और घन के साथ-साथ शारीरिक स्वास्थ्य एवं घर के सुख-सौभाग्य में भी वृद्धि होती है। इसलिए दीपावली के दिन इन दोनों की पूजा होती है।

आसन  एवं वस्त्र – लाल, लाल रंग का ढीला वस्त्र, जिससे मंत्र जप के समय शरीर के प्रत्येक अंग का कम्पन स्वतंत्र हो।

पूजन सामग्री – पीले-लाल फूल, हल्दी , सिन्दूर, कुमकुम , घृत का एक दीपक, बेसन और बूंदी के लड्डू , सभी प्रकार के फल, खीर, लाल  चन्दन

 

स्थापना विधि – इसकी स्थापना ईशान कोण के पूर्व या उत्तर की दीवाल में करनी चाहिए। इसी मुख आसन लगाना चाहिए। इनका दक्षिणा मुखी होना, कोई दोष नहीं है। गणना हमारे आसन के मुख से होती है। देवता सामने होते है। इसलिए उनकी दिशा विपरीत मुखी होगी ही। साइड से पूजा की जा सकती है। मन्त्र जप सम्मुख बैठकर ही होता है।

इसके बाद दीपक जलाकर इनकी छवि मानसिक ध्यान में लगाकर पूजा करके (मंत्र जपते) इनके सामने बैठकर 108 मंत्र का जप करना चाहिए। ध्यान लक्ष्मी के धन की वर्षा करते रूप का करें, जो एक कमल पर बैठी है; कमल एक अनंत सागर में है और चार हाथी चारों ओर से अपनी सूंढ़ से उसका स्नान कर रहे है। देवी के एक हाथों में पाश, अंकुश, कमल और सोने का घडा है। घड़े से स्वर्ण वर्षा हो रही है।

इस लक्ष्मी का रूप लाल वस्त्रों में सजी आभूषणों से लदी रानी जैसा  है  । इसके ललाट में आज्ञा चक्र पर गणेश जी सूंढ़ उठाये प्रकाशित रूप में है, ऐसी कल्पना करें। इसकी  पूजा सिन्दूर, फूल, फल आदि से करके एक माला (108) बार जप करें। फिर 11 मन्त्रों से आरती करें । या अधिक भी कर सकते है

मंत्र –    ॐ    गं    गां    गूं    ह्रीं  श्रीं     क्लीं    कमलाय    नमः

समय – प्रतिदिन रात में ( 9 से 1) में के माला जप करें। सामान्य पूजा सांयकाल भी की जा सकती है।

जप के बाद प्रणाम करके कृपा की प्रार्थना करें।

ध्यान का स्थान – इनका स्थान नाभि मूल रीढ़ में है, पर ध्यान ह्रदय में या आज्ञा चक्र पर लगाना चाहिए।

लाभ – इससे सुख, शांति, सौभाग्य एवं धन समृद्धि और शारीरिक शक्ति में वृद्धि होती है।

 

विशेष –

  • इनकी भी तामसी पूजा होती है। पर वह गृहस्थों के लिए नहीं है।
  • स्त्रियों को लक्ष्मी की कृपा (सभी की) शीघ्र प्राप्त होती है; क्योंकि उनका विश्वास प्रबल होता है और वे नेगेटिव है। उनमें हमसे अधिक पॉजिटिव उत्पन्न करने की शक्ति है। इसीलिए तन्त्र के कई मार्गों में इन्हें माध्यम बनाकर इनमें ही देवी रूप प्रतिष्ठित किया जाता है और उसकी पूजा की जाती है।
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