श्री कृष्ण का दर्शन

‘श्री कृष्ण’ का चित्रण राम से सर्वथा विपरीत रहा है, पर दोनों में एक बात समान रही है। धर्म और न्याय की स्थापना का प्रयत्न। दोनों के मार्ग एवं पद्धतियों में अंतर है , पर यह युगधर्म के अनुरूप था। महाभारतकाल में प्रपंच और दुराचार का बोलबाला था। इस काल में आदर्श मर्यादा का पालन करनेवाला नष्ट हो जाता है। श्री कृष्ण ने बताया कि नहीं सशक्त दुश्मन यदि बलांध होकर अत्याचारी हो जाए,तो उसका वध कूटनीति प्रकार से कर डालने में भी कोई हानि नहीं  है।

‘श्री कृष्ण’ की प्रणय सम्बन्धी आख्यान की बड़ी आलोचना होती है, पर वे तो विष्णु है। सभी में बैठे भोग कर रहे हैं। सब जगह उनकी ही प्रतिलिपि भोग में लिप्त है। विरक्ति यहाँ भी हैं। प्रेम की विव्ह्लता में भौतिक संसार से विरक्ति हो जाना। यह प्रेम वासनाजन्य नहीं है। ‘वासना’ तो ‘प्रेम’ है ही नहीं। एक ‘काली’ गुण है , दूसरा विष्णु का।

‘विष्णु’ ह्रदय के देवता है और हम चाहे उनके जिस रूप की पूजा करें, उनको प्रेम से ही वश में करना होगा। विष्णु के तीन पूजनीय रूप सदा श्रद्धा के योग रहे हैं। गुरु, अवतार और विष्णु – इन तीनों में गुरु का स्थान सर्वोपरि है, क्योंकि गुरु ही अवतार या विष्णु के रहस्य और उसकी गोपनीय शक्ति से परिचित कराता है और ये तीनों प्रेम के वशीभूत होते हैं।

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