शून्य की साधना विधि: निर्वस्त्र शमसान साधना

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विशेष योग्यता – यह  सदाशिव, परमात्मा, 0 पर ब्रह्म की साधना है। कम से कम साधनाकाल में साधक को स्वयं, संसार, भौतिक, स्वयं की अनुभूति से परे होकर ध्यान में डूबने का अभ्यास करना होगा। यह अत्यन्त कठिन और सर्वोच्च साधना है।

योग, तन्त्र, और तन्त्र के विभिन्न मार्गों में इसे निचले चक्र से प्रारम्भ किया जाता है और प्राण ऊर्जा को सहस्त्रार चक्र के मध्य चन्द्रमा के मध्य छिद्र तक पहुँचाया जाता है। इन विधियों में जीवन खप जाता है और तब भी शायद ही कोई यहाँ तक पहुँच पाता है । कुण्डलिनी की चक्र साधनाएं इसी से सम्बन्धित है।

इस बिंदु तक पहुँचने में किसी भी मार्ग में अनेक विघ्न बाधाओं और भयानक स्थिति का सामना करना होता है। इस तक पहुँचने में अपनी सिद्धियाँ भी बाधक बन जाती है। जब अतिरिक्त शक्तियाँ प्राप्त होंगे लगती है, तो साधक अनेक माध्यम से अपनी कामना के भोगों को प्राप्त करने में लग जाता है और अपनी मंजिल भूल जाता है।

निर्वस्त्र शमसान साधना

विशेष सरल विधि – पर वैदिक ऋषि सीधे इस बिंदु में ही डूबने का अभ्यास करते थे। इसमें सरलता है , पर इसका सबसे कठिन तथ्य यह है कि मन संसारिकता और अनुभूतियों से विमुख नहीं होता।

पर ऐसा नहीं है कि अभ्यास द्वारा यह विमुखता प्राप्त नहीं होती। इसके लिए साधक को सांसारिकता से विरक्त होना पड़ता है। संसार, अपने जन्म-मृत्यु, जीवन, सम्बन्ध, उपलब्धि और इसकी नश्वरता पर लगातार चिंतन करना पड़ता है। यह ज्ञान ही उसे विरक्त कर सकता है। तंत्राचार्यों ने कहा है कि नश्वरता का चिंतन ही रहस्य जानने की जिज्ञासा उत्पन्न करता है और इससे उस परमात्मा की लीला का ज्ञान होता है।

यह न भी हो , तो साधक विरक्त होता है और शून्य समाधि में डूबता है; जिसमें उसे अद्भुत आनंद की अनुभूति होती है। यह अभ्यास और चिंतन उसे सत्य तक पंहुचा देता है । तब परमात्मा की विशेष कृपा प्राप्त होती है और वह इच्छा मृत्यु या जन्म की शक्ति पाकर मोक्ष की प्राप्ति करता है।

इस साधना को रात्रिकाल में खुले आसमान के नीचे कुश के आसन में पश्चिम दिशा में मुह करके निर्वस्त्र साधना करनी चाहिए. मंत्र आदि की जानकारी नीचे दी गयी है.

साधना काल

प्रातः 3 बजे से 5 बजे या रात्रि 11 बजे से डेढ़ बजे ।

साधना स्थल

खुले आसमान के नीचे निर्जन विराना, श्मशान, नदी का किनारा या कोई एकांत सन्नाटे से युक्त कमरा।

आसन

कुश का आसन, सफ़ेद कम्बल, मछली का ढेर, बेल के पत्ते आदि का आसन।

वस्त्र

निर्वस्त्र, सफेद ढीला।

दिशा

पश्चिम मुखी

यंत्रादि

इसमें किसी यंत्र, दीपक , माला की आवश्यकता नहीं होती।

मन्त्र

ॐ – सात स्वर में मानसिक. ॐ नमः शिवाय.

भूत शुद्धि

साधना प्रारंभ करने से पूर्व तिन दिन तक समाधि में (सुखासन) अपने को शव रूप में चिंतन  करना , फिर तिन दिन तक चिंता में जलते हुए अनुभूत करना, फिर एक दिन जली राख को वायु से उड़ते अनुभूत करना, फिर एक दिन शिव की गंगा सिर से गिरकर जली हड्डीयों को बहाती विशाल समुद्र में जा रही है, यह कल्पना करना , फिर एक दिन उन समस्त हड्डीयों को गलकर घुलकर पानी में विलीन होते देखना।

ध्यान

इस विदेधनुभुती में चाँद के मध्य चन्द्रमा जैसे शांत प्रकाशित बिंदु की कल्पना करके उसमें उतरते जाने का अभ्यास ।

समय

प्रारंभ में 5 मिनट से अधिक ध्यान न लगायें। धीरे-धीरे जब मिनट तक बिंदु स्थिर हो , तब इसे एक-एक मिनट बढाये।

बाधाएं

डर लग सकता है। आँखों के आगे छाया, बिंदु  या भूत-प्रेत भी नजर आ सकते है। कोई सुन्दरी भी आमन्त्रण देती नजर आ सकती है। इस पर ध्यान न दें।

शरीर का ट्रीटमेंट

तलवे साफ़ रखें। पेट साफ रखें। रात में सिर के चाँद, कान, गुदा मार्ग, नाभि में गाय का घी पर्याप्त पचायें। सारे शरीर पर घृत की मालिश करें। सुबह मिट्टी से धोएं। यथा संभव केमिकल से बचें। जहाँ तक हो सके दूध, घी, चावल, रोटी, दाल, हरी सब्जी का प्रयोग करें। प्रातःकाल कुछ दिन बेल पत्र का शर्बत छानकर पीयें।

यथा संभव कम बोलें।  चिंतन में रहें। चाँद पर ध्यान हमेशा बनाये रखें और विलासिता से बचें।

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9 Comments on “शून्य की साधना विधि: निर्वस्त्र शमसान साधना”

  1. bohot aabhar.
    kripya ye btaye k jab ye kalpnab poorn ho jaaye ke haddiya paani me ghul rahi hai.uske next day kuch or imagine krna h ya sirf shunya /chaand par dhyan lagana hai.

  2. Jay gurudev,jay mahakal.aap kripya kar ke mujhe yeh bataye ki 0 sadhna sidhdhi kitne din me prapt hoti hai,kitne din me samapt ho jati hai.

    1. साध्ना सिद्धि का कोई समय काल नहीं होता। यह खाना बनाना नहीं है. यह अपनी मानसिक शक्ति, अभ्यास और तकनीकी जानकारी पर निर्भर करता है. 0 की साधना निराकार परमात्मा की साधना है. यह सबसे कठिन समझा जाता है. इसके लिए बैरागी होना आवश्यक है. झोला धारी बैरागी नहीं मानसिक बैरागी.

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