शिव के डमरू का रहस्य

धर्मालय के प्रसार में सहयोग करें

इस दोनों के मिलने से नारंगी के समान एक गोल आकृति जो ऊर्जधाराओं से बना एक पॉवर-सर्किट होता है; जिसके दोनों पेदों पर ऊर्जधाराएं अन्दर जा रही होती है जो बाहर के ‘0 ’ से घर्षण करता घूमता ऊपर फवारे छोड़ता निचे जेट की तरह ऊर्जाधारा छोड़ता हुआ क्रियाशील हो जाता है।

इसके बीच में यह डमरू की आकृति होती है। इसमें दोनों मीनार उल्टे होकर गुंथे होते है और कुछ निश्चित नियमों से (गोपनीय ) स्वचालित होकर एक- दुसरे में पंप करने लगते है।

यही पहली संरचना है , जिसके केंद्र में चेतना की उत्पत्ति होता है। इसी डमरू के नाचने- बजने से इस डमरू का ही विस्तार ब्रह्माण्ड के रूप में होता है , जो पहले एक सूक्ष्म परमाणु के रूप में उत्पन्न होता है।

धर्मालय के प्रसार में सहयोग करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *