शान्तिकर्म के देवता और उनकी सिद्धियाँ

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आयु, आरोग्य एवं अमृत दान का देवता ज्योतिष में चन्द्रमा को माना जाता है; तन्त्र में शिव एवम पार्वती को। इनकी सिद्धि कई प्रकार से की जाती है। मुख्यतः इसमें ध्यान और मन्त्र का प्रयोग किया जाता है। मैं इसकी एक सरल विधि बताता हूँ। पदमासन या सुखासन में बैठिये। मुख पश्चिम की ओर रखें। सिर के चाँद पर पहले बायीं हथेली रखिये, उसके ऊपर दायीं हथेली रखिये और हल्का दबाब डालिए। इससे आपकी दोनों नासिका खुल जाएंगी। कम से कम 21 बार सांस को खींचिए और रोकिये ( कुम्भक), फिर छोडिये। यह कुम्भक सामान्य समय तक होना चाहिए। अबहुत देर तक रोकने की जरूरत नहीं है।

जब यह अभ्यास हो जाए, तो नाक की जड़ से एनर्जी ऊपर की ओर चढ़ाएं; चाँद पर नीचे की ओर सिकुड़ता दबाब डालें और ‘अं’ की मानसिक ध्वनि से सांस अंदर खीचे और पहले की तरह कुम्भक करके ‘हं’ की मानसिक ध्वनि से श्वांस छोड़े। यह क्रिया नित्य आधा घंटा करें और आज्ञा चक्र पर आँखें बंद करके आशीर्वाद देते प्रसन्न मुद्रा में सूरज की तरह जगमगाते ‘शिव’ की छवि स्थापित करने का प्रयास करें।

प्रारंभ में छवि प्रकट नहीं होती। जब प्रकट होती है, तो स्थायी नहीं रहती। मानसिक प्रत्यन जारी रखें। यह धीरे-धीरे स्थायी हो जाएगी। फिर इसे और चमकदार हो, और चमकदार हो – की मानसिक भाव से उस पर ध्यान केन्द्रित करते रहें।

इस प्रकार 6 महीने तक अभ्यास करने पर यह छवि जगमगाते रूप में वहां स्थापित हो जाती है; पर इस पर 18 महीने से 2 वर्ष तक अभ्यास करना चाहिए।

तब पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो जाती है। जब आँखें बंद करेंगे, वह जगमगाती छवि वहाँ प्रकट हो जाएगी।

इनको आहार प्रकट करने के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ेगा। यह बहुत बड़ी सिद्धि होती है। चूँकि आजकल खान-पान और वातावरण का प्रदूषण साथ होता है और दिन चर्या भी अव्यवस्थित होती है और इसके साथ ही अभ्यास केवल आधा घंटा का होता है; इसलिए इसमें बरसों का समय लग सकता है; पर आगया चक्र पर इनको स्थापित कर लेनेवाला साधक भी इनकी शक्ति से मानवेत्तर शक्तियां प्राप्त कर लेता है। वह क्रोध करे, तो लक्ष्य बिंदु का क्षय हो जाए, वह आशीर्वाद दे तो वह फलित हो जाए। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि तत्काल एनीमेशन की तरह परिवर्तन होने लगेगा। परिस्थितीयाँ  ऐसी हो जाएंगी कि क्रोध या आशीर्वाद फलित हो जाएगी।

समय- महाकाल रात्रि (9 – 1:30) यह ब्रह्ममुहूर्त

दिशा – पश्चिम, वस्त्र श्वेत, चन्दन –लकड़ी का चन्दन, जाप का समय दीपक जलाने या अन्य कोई क्रिया करने की आवश्यकता नहीं है।

विशेष – यदि कोई साधक किसी भी देवी-देवता की सिद्धि किये हुए है, तो वह सभी षट्कर्म कर सकता है। अभिचार कर्म सभी विद्याओं में वर्णित है। विधियाँ और मन्त्र आदि अलग-अलग है।

    किन्तु शास्त्रीय निर्देश है कि भैरव जी के आठों रूपों या महाकाली के 13-17 रूपों में से किसी की साधना करने वाला उग्र भाव का उपासक होता है। वह शान्ति कर्म कर सकता है; पर उसे अधिक परिश्रम करना होगा; जबकि वह अन्य पाँचों कर्म सरलता से कर सकता है।

किसी के मृत्यु काल का समय

गोरोचन, कुमकुम, लाख और साध्य को अनामिका के रक्त से एक बारह दल का कमल बनाएं (वृत पर पंखुडियां) , इसके ऊपर पुनः एक वृत बनाकर बारह दल का कमल बनाएं। इसके ऊपर पुनः ३२ दल का कमल बनाएं।

वृत में साध्य का नाम लिखे। उसके बाद के बारह दल में उस वर्ष से प्रारंभ करके बारह वर्ष आगे का वर्ष, उसके आगे 12 में बारह महीने का नाम; दल में सामने दो में ‘शिव’ लिखें फिर बायें से दायें तिथि क्रम । क्रम बायें से दायें होता है। प्रारम्भ अपने सामने वाली पंखुड़ी से किये जाता है।

‘अंहं’ से शिव को आगया चक्र पर प्रतिष्ठित करके मन्त्र का पूर्व तरीके से जाप करते हुए उस चित्र को देखते रहें ( पूर्ण एकाग्रता से); मन्त्र जाप करते रहें देखतें रहें। वर्ष, मॉस, दिन में से जो-जो अंक विलुप्त हो जाएँ दिखाई न पड़ें , वह उस व्यक्ति के मृत्यु का वर्ष , मास, दिन होगा। यदि लुप्त न हो, तो वह व्यक्ति बारह वर्ष तक नहीं मरेगा। जब अंक लुप्त होते और होते हों या धुन्धुले होकर लुप्त हो, फिर आ जाएं; तो वह दिन , मास, वर्ष उस व्यक्ति के लिए खतरनाक होता है। उसकी मृत्यु भी हो सकती है।

मंत्र- ॐ शिवम् कालपुरुषोत्तम  सन्धा विश्व मुर्त्ते  काल क्षयं  अंत कालं प्रदर्शय प्रदर्शय फट स्वाहा!

विशेष – इस मन्त्र को पहले जपकर याद करना आवशयक है। अलग से भी इसकी सिद्धि 10 हजार मन्त्र जपने से होती है।

परन्तु जरा इन मन्त्र पर ध्यान दें। यह मन्त्र नहीं शिव से आग्रह मात्र है; जो संस्कृत में है। ‘ अं हं’ मन्त्र की सिद्धि किये कोई साधक या शिव के किसी स्वरुप का साधक, महाकाल या भैरव जी का साधक – अपने ईष्ट से उनका मंत्र जपते हुए मानसिक रूप से उपयुक्त प्रार्थना करे, हिंदी या निज भाषा में करें, तो भी परिणाम वही प्राप्त होगा। किसी भी कार्य के स्वरुप को समझना चाहिए। ऐसा नहीं है कि देवी देवता केवल संस्कृत ही समझते है। हाँ बीज मन्त्रों की बात दूसरी है। उनका विज्ञानं चक्रों से जुड़ा है। शांतिकर्म में प्रत्येक कार्य के लिए अलग-अलग मन्त्र है और उनके यंत्र भी अलग है। पर इनको करने के लिए उस मन्त्र की या किसी ईष्ट की सिद्धि आवश्यक होती है। इसका विस्तार इतना बड़ा है कि उन सभी मन्त्रों को देना यहाँ संभव नहीं है। कोई चाहे  तो 500 रु. धर्मालय को देकर सम्पूर्ण सिद्धि विधि के साथ किसी भी रोग के शांति कर्म का विवरण प्राप्त कर सकता है। इसके उच्चारण एवं कम्पन वृत्ति के साथ समय, आसन, वस्त्र, दिशा,आदि भी बताये जाते है। पर यह सिद्धि करवाने का वचन नहीं है।

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