महाकाल के अभिषेक में चिता भस्म का रहस्य

धर्मालय के प्रसार में सहयोग करें

अभी-अभी कुछ लोगों ने पूछा है कि उज्जैन के महाकाल का पारम्परिक अभिषेक जिस भस्म से होता था, उसमें चिता का भस्म मिलाया जाता था। क्या इसमें भी वैज्ञानिकता थी।

उज्जैन का मामला क्या है, इसे स्थानीय महाकाल के पुजारी आदि ही जानते होंगे; परन्तु महाकाल की गोपनीय साधनाओं में जिस चिता भस्म न्यास और अभिषेक किया जाता है, वह यह भौतिक चिता नहीं है। ये अतिगुप्त साधनाएं होती है ; इसलिए हम अधिक विस्तार से नहीं बता सकते; परन्तु इसके न्यास और भुत शुद्धि में मानसिक ध्यानावस्था में स्वयं को ही चिता पर अवस्थित मानकर उसमें अग्निबीज मंत्र से आग लगाकर जलाया जाता है और उसी भस्म से निर्मल आत्मा (महाकाल रूप) का अभिषेक किया जाता है। फिर वायुबीज मन्त्र से उसे झाड़ा जाता है और जल बीज मन्त्र से देव गंगा का आवाहन कारके आत्मा को स्नान करवाया जाता है।

इस देवगंगा के बारे में हम पहले भी बहुत कुछ बता आएं है (देखें गायत्री प्रकरण .. www.dharmalay.com ) । इसे गायत्री , सावित्री , शिव सार , ब्रह्मा के कमंडल का अमृत , बिंदु आदि अनेक नामों से (सम्प्रदाय भेद) जाना जाता है।

जहाँ तक मुझे ज्ञात है , मानव चिता का भस्म मानव शरीर के लिए हानिकारक है। इसका प्रयोग तन्त्र के अभिचार कर्मों में मारण, उच्चाटन, विद्वेषण, शत्रुदमन आदि में होता है। महाकाल के साधक महाकाल की साधना के बाद हवन के भस्म से स्नान करते है और उसे शरीर पर मलते है। इस्मेंन मानसिक भाव उसे अपनी ही चिता के भस्म के रूप में अनुभूत करने का होता है। यह हवन भस्म औषधियों के काष्ठ, द्रव्य आदि का और महाकाल के मन्त्रों से अभिमंत्रित होता है। इसके चमत्कारिक प्रभाव होते हैं। यदि कोई साधक इसे किसी को किसी कष्ट के लिए देता है , तो इसके एक चुटकी उसके कष्ट के निवारण के लिए पर्याप्त होता है।

धर्मालय के प्रसार में सहयोग करें

One Comment on “महाकाल के अभिषेक में चिता भस्म का रहस्य”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *