मंदिर-मस्जिद के शातिर खिलाड़ी

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आजकल पुनः राम मंदिर बनाने या न बनाने की चर्चा मीडिया का विषय बना हुआ हैं। मीडिया को भी इसकी चर्चा के लिए मिलते कौन है? राजनीतिक दलों के प्रवक्ता और अपने को धर्म-मजहब का ठेकेदार बनाते वाली संस्थाओं के प्रतिनिधि। एक मन्दिर बनाने के पक्ष में तर्क देता है, एक मस्जिद बनाने के पक्ष में तर्क देता है, एक सुप्रीमकोर्ट का हवाला देकर पल्ला झाड़ता हैं , तो एक लोक सभा एवं राज्यसभा में बहुमत न होने का बहाना करके। बहुमत हो भी गया, तो क्या करोगे भाई? संविधानिक ढांचें को बदलोगे? बिना बदले तो राम मंदिर बनने से रहा? वैसे संविधान कि एक व्यापक समीक्षा की आवश्यकता है; ताकि चोर-उच्चकों द्वारा बनाई गयी समांतर व्यवस्था पर रोक लग सके। पर कोई इस पर चर्चा नहीं करता, न करेगा; क्योंकि उस समांतर व्यवस्था के खिलाड़ी सभी राजनीतिज्ञ और अफसरों की जमात है। पूरा का पूरा सरकारी तंत्र जालसाजी और धोखा के कागजातों एवं आकड़ों का सेल खेल रहा है।

गंगा की सफाई पर फिर 20 हजार करोड़ दिए गये है; पर कोई नहीं है, जो यह बताए कि पहले व्यय किये गये हज़ारों करोड़ कहाँ गये? हर विभाग-हर तन्त्र में जाली कारोबार चल रहा है। यहाँ तक कि किसानों की राहत, सूखा, बाढ़,भूकम्प, प्राकृतिक आपदाओं की राशी भी लूट ली जाती है। वृक्षारोपण, बीज, खाद, शिक्षा, चिकित्सा हर क्षेत्र में प्रखंड एवं जिला मुख्यालय से लेकर सचिवालयों तक कमीशनखोरी, निष्क्रियता, जालसाजी और विश्वासघात का खेल चल रहा है। इसके लिए इस देश में कोई मसीहा नहीं है। लोग अपने ‘मन की बात’ करते हैं, मगर कोई है, इस देश में जो जनता में मचे हाहाकार को समझने का प्रयत्न करे? जो आपके इस धोके के सिस्टम में लूट रही है?

राम का मन्दिर बनायेंगे। …… खुदा का मस्जिद बनायेंगे।…… कहाँ? शैतानों की शैतानियत की जमीन पर? … बन भी गया, तो वह शैतानों का ही अस्त्र बना रहेगा। 23 वर्ष से देश भर में अशांति उत्पन्न करनेवाले लोगों से हमारा पूछना है कि इस देश में तो सनातन धर्म हिन्दू रहते है या इस्लाम मानने वाले मुसलमान। भाई मेरे कौन सी सरकार, कौन सा राजनीतिक दल इनकी संस्कृति और रीति-रिवाज एवं परम्पाराओं को मान्यता देकर देश में रामराज्य या खुदाई शासन स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील है? ये सभी बाजार की शैतानी शक्ति के गुलाम है और यूरोपियन आद्योगिक क्रान्ति के कचरे से उगे आदर्शों के गुलाम है। शासन, क़ानून,संविधानिक आदर्श सभी सभी उससे प्रभावित है। इन्होंने तो दोनों संस्कृतियों एवं उनके आदर्शों का मटियामेट कर दिया है। फलतः धरती, पानी, हवा, फल, अनाज, दूध से लेकर रहन सहन, रीति-रिवाज, खान-पान तक जहरीला हो गया है। य हम इस जहर को पीने-खाने के लिए मजबूर है। ये पहले जहर प्रसारित करते है, दवा के नाम पर भी जहर बेचते है, फिर उसके इफ़ेक्ट को दूर करने को बेचते हैं। गंगा या नदियाँ हमारे जल स्रोत 75 के बाद से बर्बाद हुए है।

अब ये उसके नाम पर भी लूट मचाएंगे। मोदी लाख ईमानदार हो, पर इस लूट को रोक नहीं सकते; क्योंकि सारा कासारा तन्त्र ही इसमें लिप्त है।

अब इस शैतानी धरती पर भी खुदा या राम का भव्य मस्जिद-मंदिर बनाकर भीसमाज का क्या भला करोगे भाई? राम मंदिर बनाने से अच्छा यह नहीं होगा कि राम के आदर्शों को समाज में प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न करें?……… जिन्हें सनातनधर्म का मोह है; उन्हें और उन्हें जो रामायण के आदर्शों को मानते हैं या उन्हें जो खुदा का गीत गाते है; उनके अपने संस्कार और परम्परा पर चोट करके उसका कबाड़ में परिवर्तित करनेवाली इस शासन-व्यवस्था को परिवर्तित करने का आन्दोलन करना चाहिए। क्या आदर्शवादी समाज बनाया है? क्या आदर्श स्थापित कर रहे है? भाई ने भाई का हक मार रखा है, उसने बहन का , बहन ने भाई का, पति ने पत्नी का, पत्नी ने पति का हक मार रखा है। यहाँ सभी एक-दूसरे के शोषक है; इसलिए सभी एक-दूसरे से लड़ रहे है और शैतानी ताकतों का समूह हँसते हुए शैतानी मायाजाल फैलता जा रहा है।

मन्दिर या मस्जिद बाद में बनाना भाई। पहले इस शैतानी नाच को बंद करो। लालसा, तृष्णा, ईर्ष्या, प्रतिस्पर्द्धा को जन्म देने वाली शक्तियाँ राक्षसी होती है। सनातनधर्म का भी यही कहना है। इस्लाम और क्रिश्चन आदर्शों में भी यही कहा गया है। वह शैतानी मायाजाल लिए आता है। इंसानों की बुद्धि-भ्रष्ट कर देता है और वे हैवान बन जाते है।

हम अपने आपको , अपने समाज को, अपनी व्यवस्था को देखे। क्या हम मनुष्य रह गये है?

हम मन्दिर-मस्जिद बनाकर क्या करेंगे?

जो लोग इसके झंडावतार, वे न राम के हैं, न रहीम के। उनके ड्रामों पर मत जाईये। किसी शायर की हमने एक शायरी सुनी थी –

हमेशा ईमानदारी हाशिये पै रहती है।

खुदा बनने की चाहत मन में छुपी रहती है।

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