प्रबल कामना और अभ्यास ही सफलता और चमत्कार की कुंजी है।

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बहुत से लोग संदेह में ही अपनी सफलता को नष्ट कर लेते हैं। जरा सी कठिनाई हुई नहीं कि असमंजस में पड़ जाते हैं। प्रकृति से भी कुछ नहीं सीखते। यहाँ एक व्यवस्था कायम है। आप जैसी कामना करेंगे और उस पर अभ्यास करेंगे, वह सब कुछ आपको प्राप्त होगा। प्रकृति के शब्दकोश में असंभव शब्द नहीं है।

आध्यात्मिक रूप से कहा जाए, तो इस प्रकृति के प्रत्येक इकाई में परमात्मा का ही अंश विद्यमान है। भले ही वह स्थानीय धाराओं और अपने ऊर्जा चक्रों में बंधा हुआ है, पर वह परमात्मा है। वह लगातार गहन कामना करता रहे और अपने शरीर को कामना के अनुसार अभ्यासित करता रहे ; तो वह अपनी कामना के अनुरूप ही अतिरिक्त शक्तियों को प्राप्त कर सकता है। सर्कस में , रेस में, पर्वतारोहण में सर्वत्र इसे फलित होते देखनेवाला मनुष्य यह नहीं देखता कि किसीने चाहा कि दुनिया को रौशन कर दे, उसने कर दिया। किसी ने चाहा कि वह हवा में उड़े, उसने सबको उड़ने का मार्ग बता दिया। साधनाएं चाहे बाहरी आविष्कारों की हो, या शरीर की ऊर्जा को प्रयुक्त करने की नियम सबकी प्राप्ति के लिए एक ही हैं। प्रबल कामना , अभ्यास और जिद्द । प्रो. राम मूर्ती इतने दुर्बल थे कि हाईस्कूल तक सभी उनका मजाक उड़ाते थे और यह व्यक्ति अपनी छाती पर हाथियों को पास करवाने लगा। किशोर कुमार ने कहीं संगीत की शिक्षा नहीं ली थी। एक व्यक्ति में नेचर था कि जैसे ही कुछ शरीर के नजदीक आता, वह सिहर जाता था।किशोरवस्था में ही उसके शरीर में बिजली बनने लगी। मैंने कुरुक्षेत्र के इस युवक को देखा था। उसे कार का दरवाजा भी जूते से ठेलकर बंद करना पड़ता था।

जब मैं सनातन धर्म के इन नियमों का परिक्षण कर रहा था, मुझे जानकारियों के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ता था। हर चीज स्वयं परीक्षित और अनुभव करनी पड़ती थी, पर आज जब मैं डिस्कवरी जैसे चैनलों को देखता हूँ; तो पाता हूँ कि प्रत्येक जीव ने अपनी-अपनी अलग-अलग क्षमताएं विकसित कर ली है। कुछ हवा से पानी में उतर गये और उसके अनुसार ढल गये। जिसको जहाँ जैसा खतरा हुआ, वैसा ही रूप रंग शरीर विकसित हो गया , जिसको जहाँ जैसे औजार कीई जरूरत हुई , वह उसके शरीर में ही विकसित हो गये। यहाँ तक कि जीन्स तक परिवर्तित हो गये, अंग परिवर्तित हो गये।

इन्हें अलग-अलग मत देखिये। इनमें इन नियमों की समानता देखिये, जिसने जैसी कामना की, जैसा अभ्यास किया , वह वैसा ही हो गया। योग का एक आधार सूत्र है कि ध्यान योग में डूबकर जैसी कामना करोगे, वैसे ही हो जाओगे। तन्त्र भी यही कहता है और समस्त आध्यात्मिक जगत इसी सूत्र पर खड़ा है। जैसी भावना होगी, वैसे ही कर्म होंगे , वैसा ही अगला-पिछ्ला जन्म होगा।

एक बहुत बड़ी अज्ञानता है यह सोचना कि यह केवल आध्यात्म के सूत्र हैं। यह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र की प्राप्ति के लिए सफलता के सूत्र हैं। यह प्रकृति परमात्मा की कामना से उत्पन्न हुई है और यह वचनबद्ध है (नियमबद्ध है) कि अपने अंदर की प्रत्येक इकाई की कामना की पूर्ती करे। इसके प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त ऊर्जा में घूर्णन बल अधिक है, इसलिए परिवर्तन की गति संघर्ष युक्त होने के कारण तुंरत फल अनुभूत नहीं होता, पर यदि भावनात्मक गहनता अधिक हो, तो यह शीघ्र ही अनुभूत होने लगता है । किसने चाहा कि वह निशानेबाज बने और वह नहीं बन सका? किसने प्रयत्न किया कि वह गोताखोर बने और नहीं बन सका? जिसने जो चाहा , उसे मिला; पर जिसने केवल ड्रामा किया उसे कैसे प्राप्त हो जाएगा? सबको अपनी माया प्रकृति से छलने वाले उस छलिये को ही जो धोखा देने का प्रयत्न करते है , उनको क्या प्राप्त हो सकता है? प्राप्ति का मार्ग बहुत कठिन है। सरलता से कुछ भी प्राप्त नहीं होता , चालाकी-छल से छिना-लूटा जा सकता है; प्राप्त नहीं किया जा सकता। भला कोई विद्या भी छल से प्राप्त कर सकता है? चोरी करके डिग्री प्राप्त की जाती है, विद्या नहीं और ऐसी डिग्रीयों का कोई मूल्य नहीं होता।

समस्या यह है कि भौतिक फल तो लूट-छीन कर प्राप्त किया जा सकता हैं; पर आध्यात्मिक शक्तियां चालाकी से कैसे प्राप्त कर लेंगे? इनका कोई भौतिक वजूद होता ही नहीं है। लेकिन क्षमा कीजियेगा , आज जिसे देखो चालाकी, छल, झूठ का ही प्रयोग करके इन्हें प्राप्त करना चाहता है। गुरु से भी धोखे से कुछ झटक केने के लिए उद्यत ऐसे लोगों को कुछ भी प्राप्त होना संभव नहीं है। ये निरर्थक समय नष्ट करते हैं। इन्हें बृहस्पति भी कुछ नहीं दे सकते। चाहे , तब भी नहीं; क्योंकि ये बार-बार संदिग्ध होंगे और बार-बार इनका छल प्रकट होगा , संदेह होने पर ये कमीनापन भी करेंगे और गुरु धक्के देकर बाहर कर देगा।

पहले के आचार्य मुर्ख नहीं थे कि बरसों पहले पात्रता परखते थे। और आजकल ये मुर्ख पूछते हैं कि कितना धन व्यय करके प्राप्त किया जा सकता है यानी ये बाजार से सोना-चाँदी खरीदने निकले हैं। अब कोई इनसे पूछे कि बहन से प्रेम और माता से श्रद्धा कितने-कितने मूल्य में मिलता हैं? तब इन्हें अपनी मूर्खताएं समझ में आएँगी।

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