पागलों की सिगरेट

धर्मालय के प्रसार में सहयोग करें

अपराजिता, कोयल, कटभी की छाल , त्रिकुटा, प्रियंगु, सिरस, हल्दी, दारु-हल्दी, सिरस की छाल , देवदारु, बकरी की मेंगनी,अपामार्ग की बीज।

इन सब को सुखाकर कूटकर रखे। इन्हें बीड़ी के पत्ते या सिगरेट के पेपर में लपेट कर दिन-रात में चार बार धुम्रपान कराने से- साथ में सिर में बिनौले का तेल लगाने से- मिर्गी, पागलपन, हिस्टिरिया, पीनस रोग, शरीर में एकत्रित हुए विष विकार दूर होते है।

ऐसा चरक ऋषि का कहना है।

धर्मालय के प्रसार में सहयोग करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *