परमात्मा का रहस्य

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यह एक अभौतिक (नान फिजिकल) तेजोमय विरल निष्क्रय सूक्ष्म तत्त्व है, तो अनंत मेअनंत तक (जिसका आदि और अंत नहीं है ) व्याप्त है। यह निराकार , चेतनाविहीन , क्रियाविहीन, अदभुत तत्त्व ही सभी का सार तत्त्व है यानी मूलतत्व। इसी में सबकी संरचना बनती है।

यह एक विचित्र प्रकार का तत्त्व है। यह न जन्म लेता है , नहीं नष्ट होता है। इसके बाद भी सबकी उत्पत्ति और विनाश का कारण यही है।

यह निष्क्रिय है, पर सभी क्रियायें इससे ही उत्पन्न होती है। यह चेतनाविहीन है , पर सभी प्रकार की चेतना इसी से उत्पन्न होती है। यह आकृतिविहीन है , पर सभी आकार इसी से उत्पन्न होती है।

वैदिक ऋषियों ने इसे ‘0 ’ पर ब्रह्म एवं अक्षर तत्त्व (अविनाशी तत्त्व ) कहा है। शैमार्गी इसे ‘सदाशिव ’ कहते है। बाद में उत्पन्न हुए महान आत्माओं ने इसे अनेक नामों से पुकारा है। इसे ही ‘खुदा’, ‘अल्लाह’, ‘गॉड ‘ या परमात्मा भी कहा जाता है। परमात्मा का अर्थ होता है- ‘परमसार’

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