धर्मालय का ध्यान एवं योग

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धर्मालय का ध्यान एवं योग (Dharmalay Meditation And Yoga)

वैधानिक चेतावनी (Legal Warning)

ध्यान और योग पर आगे कोई भी जानकारी देने से पहले मैं सभी सर्व साधारण जिज्ञासुओं और योगी, महात्मा, साधक से यह कहना चाहता हूँ कि हमारे इन विवरणों का शास्त्रीय स्तर चल रहे सम्प्रदायों और गुरुओं के ध्यान योग का कोई सम्बन्ध नहीं है। यह तन्त्र साधनाओं का ध्यान योग है और अपनी साधना के समय और उसके प्रतिफल के विज्ञान के आधार पर सारे विवरण और प्रयोग मौलिक हैं। जो लोग शास्त्रीयत स्तर पर समस्त विद्याओं को अपने-अपनी गुरु परम्परा में अभ्यासित कार रहे हैं, उनसे इसका कोई सम्बन्ध नहीं है और सारे विवरण मौलिक हैं।

इसलिए इसका कोई भी अंश बिना अनुमति या बिना रिफरेन्स के किसी भी माध्यम से प्रसारित,प्रकाशित करना या व्यवसायिक उपयोग करना जालसाजी करके बौद्धिक सम्पदा की चोरी और कॉपीराइट के उल्लंघन दोनों प्रकार के वैधानिक अपराध माना जायेगा। व्यक्तिगत प्रयोग कोई भी कर सकता है।

हम क्षमा चाहते है कि यह चेतावनी हमें फिर से प्रसारित करनी पड़ रही हैं , क्योंकि सभी हाल में कई व्यक्तियों ने अपने वेबसाइट और ब्लॉग पर मेरे वेबसाइट से पोस्ट कॉपी करके अपने नाम से डाल लिया है और ‘नाथ’ टाइटल को कलंकित कर रहे है। ये लोग फ्रॉड आई.डी. बनाये रहते है , हम ट्रेस कर रहे है किये कौन है और इन पर वैधानिक कार्यवाई के लिए वकील को बुलाया गया है।

नयी राह ही विज्ञान की प्रगति का आधार है (The new path is the basis of science’s progress)

एक और समस्या सामने आई है कि आध्यात्मिक क्षेत्र की हर विद्या को भिन्न-भिन्न मार्गों के सम्प्रदायों ने अपने नियम, विधि एवं प्रकिया की सीमाओं में बाँध दिया है और बहस करने बैठ जाते है कि ‘योग’ तो इसको कहते है और ‘ध्यान’ इसको। इसके लिए अमुक-अमुक आसन मुद्रा आवश्यक है।

मेरा ऐसे सभी व्यक्तियों से अनुरोध है कि मैं उनके मार्ग का शिष्य नहीं हूँ और उनकी विधि, प्रकिया, व्याख्या से हमारे विवरणों का कोई सम्बन्ध नहीं है। ‘ध्यान’ और ‘योग’ शब्द  हैं और इनके अर्थ हैं।  हम उन व्याकरण अर्थों में ही इन शब्दों के अंतर्गत अपनी व्याख्याएं और प्रयोग कर रहे हैं और शब्दों पर, यदि उसके व्याकरण अर्थों का प्रयोग किया जा रहा है किसी भी सम्प्रदाय या गुरु की व्याख्याओं परम्पराओं और विधियों का एकाधिकार नहीं होता।

यह मैंने इसलिए स्पष्ट कर दिया है कि निरर्थक टकराव न हो और मैं अपनी व्याख्या , इसका विज्ञान और अपनी तकनीकी लोगों तक पंहुचा सकूं।  ज्ञान , विद्या, प्रक्रिया , विधियां आदि को सीमाबद्ध करना जड़ता है। और यही मत अभिनव गुप्त सहित उनके प्राचीन तान्त्राचार्यों के रहे हैं। इन्होने कहा है कि इस बात से कोई अन्तर नहीं पड़ता कि किसने कैसे , किस विधि से लक्ष्य की प्राप्ति का मार्ग ढूढा। मूल्य हमेशा नए का होता है। परम्परागत ज्ञान तो मिल चुका होता है; पर उस लक्ष्य के लिए नए मार्ग तलाशने का आयाम सदा खुला रहता है। जो न्य ढूंढता है, वही मूल्यवान होता है। जो सबसे अलग ढूंढ लेता है, वह सांसिद्धिक  गुरु होता है और किसी क्षेत्र का प्रवर्तक बन जाता है।

इस विषय को हमने ‘गुरु क्यों चाहिए?’ के शीर्षक में पहले ही साईट पर विस्तृत प्रकाश डाल रखा है। यहां हम एक उदाहरण देते है—

एक विशाल पेड़ पर हर वर्ष बहुत से आम फलते  थे। वे पकते थे। बगल में एक गाँव था , पर कुछ ही लोग आम खा पाते थे। सभी पेड़ पर चढ़ना नहीं जानते थे। सीखना भी बहुत कठिन था। लोग समझ लेते थे कि उन फलों का स्वाद वे नहीं पा सकते। एक दिन एक युवक ने पेड़ पर चढ़ने की बहुत कोशिश की, नहीं चढ़ पाया, तो क्रोधित होकर उसने एक पत्थर पेड़ पर दे मारा। पत्थर पके आमों पर लगा और चार-पांच टूट कर गिरे। युवक चमक पड़ा। उसने आम तोड़ने का नया रास्ता ढूंढ लिया था। उसने झोला भर के आम तोड़ा और गाँव वालों को बताया। सब टूट पड़े। इस पर चढ़नेवाला ग्रुप नाराज हो गया , – “यह क्या है ? तुम लोगों  ने इस अमृत फल को इतना सस्ता बना दिया। यह तरीका नहीं है। इससे आम बर्बाद होता है। पहले चढ़ना सीखों । बिना पेड़ चढ़े आम नहीं टूटता।”

पर कोई मान ही नहीं रहा था। लेकिन जब बाहर के सब आम गायब हो गये, तो पत्तों डालियों में हुए आम पत्थरों के निशाने पर ही नहीं आते थे। एक दिन एक व्यक्ति वहीँ बाँस काट रहा था। वह लम्बा बाँस पेड़ पर गिरा तो छुपे आम भी टूट कर गिरे। तब उन्हें एक और रास्ता मिल गया कि बाँस का लग्गा बनाकर भी आम तोड़ा जा सकता है।

आप वैज्ञानिक उपकरणों का विकास देखिये, आपको यही कहानी नजर आएगी । प्राचीनकाल के दार्शनिकों , ऋषियों, आचार्यों , साधकों(The seekers) , तंत्राचार्यों के काम और विवरण देखिये, सर्वत्र यही कहानी नजर आएगी। एक ही देवता के सैकड़ों मंत्र, दर्जनों विधियाँ , दर्जनों आचार प्रक्रियाएं , दर्जनों मुद्राएं मिलेंगी। इनमें से आधे में बिल्कुल विपरीत स्थिति मिलेगी। सभी ने सभी  का आदर किया है। हानि-लाभ पर बहस हुई है , पर किसी ने नहीं कहा कि तुम्हारी विधि से यह नहीं हो सकता है।

परन्तु हजारों वर्षों से सनातन धर्म के सभी मार्गों की सभी शाखाओं ने सभी विद्याओं को जड़ कर दिया है। आध्यात्मिक प्रगति के क्षेत्र में हम 1000 ईसा के आस-पास है। इन मार्गों में साधना करने का मतलब हैं , 5 वर्ष की अवस्था में आश्रम पकड़िये और सारी जिन्दगी अभ्यास करते रहिये। फिर भी कुछ मिल जाएगा , इसकी आशा कम ही हैं; क्योंकि सभी सिद्धि-साधनाएं- पर्योग निरर्थक विधियों प्रक्रियाओं के इतने जटिल कार्यक्रम से भरे हैं कि हैरत होती हैं।

मैं शोधात्मक विश्लेषण(Discovery analysis) करने वाला साधक रहा हूँ, क्योंकि मैं सिद्धि नहीं,ज्ञान का जिज्ञासु था। जब इस सम्पूर्ण सनातन विज्ञान की डिस्कवरी की, तो माथा पीट  कर रहा गया।    इन सबकी जरूरत ही नहीं है। यह सम्प्रदाय को विशिष्ट देने के लिए बनाई गयी जटिलता है।

जैसे –

आपको एक देवी की सिद्धि करनी हैं। दो – तिन वर्ष तो गुरु की सेवा करते रहिये। वे प्रसन्न हो गये, तो दीक्षा देंगे, पर दीक्षा का कार्यक्रम शौच से लेकर स्नान तक , मुंह धोने से लेकर दातून फेंकने तक के नियम है। दीक्षा मण्डल में प्रवेश होने के समय आपको 24 देवताओं , लोकपालों की पूजा करके मंडप में बैठना होगा, फिर अभिषेक का काम आठ घंटे तक मंत्र से आसन , घड़ा, पात्र, वस्त्र, गुरु , गुरु पादुका, गुरु में तीन क्रम या पांच क्रम , सबकी पादुका पूजा , आदि विस्तृत कार्यक्रम होगा। जबकि इसमें तथ्यात्मक वैज्ञानिक सार इतना है कि गुरु-शिष्य की पात्रता , भावना और संकल्प परीक्षित और दृढ थे।

भूत शुद्धि, आसन , न्यास के बाद

इसी प्रकार साधना के समय आपको मंडल प्रवेश में गणेश जी , के बाद 21 देवताओं , उनके पादुकाओं , अस्त्रों की पूजा करनी होगी। फिर मंडल चक्र पूजा में मध्य बिंदु, से नवकोण , अष्टदल (कम से कम) में तीन-तीन , उसके गैप में आठ, चतुरस्त्र में आठ, बाहर दस के पादुका और अस्त्रों सहित तीन-तीन बार पूजा करनी होगी।

तब बिंदु में आवाहन , स्थापना , ध्यान, मंत्रजप शुरू होगा। यह प्रकिया जप समापन के बाद भी विस्तृत हैं। कौन मानसिक एकाग्रता बना पायेगा? यहाँ तो केवल विधियों का जाल है। फूल फेंकने की भी विधि हैं।

जबकि देवी-देवताओं की सिद्धि या मंत्र जप का विज्ञान केवल इतना है कि वातावरण शुद्ध हो, दिशा – मुहूर्त , समय-काल सही हो, आपके शरीर का शुद्धिन्यास सही हो और मानस में वह शक्तिरूप ध्यानकृत हो। मानसिक एकाग्रता में स्व की अनुभूति खोकर आप मंत्र जपें। यह न हो, तो आप किनती भी विधि अपना ले कोई शक्ति प्राप्त नहीं होगी, क्योंकि शक्ति अवतरण की चाभी भाव की एकाग्रता का गहन होना है , विधि आसन नहीं।

 

प्राचीनकाल में आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण नहीं थे। मंत्रध्वनि की आवृत्तियाँ , प्रकाश का दृष्टि ध्यान प्रभाव , चुम्बक, हल्का विद्युतीय प्रवाह – आपको वर्षों का फल महीनों में दे सकता है।

पर तुरंत लोग चिल्लाने लगते है । यह कैसे हो सकता है? आप तो पूरी साधना ही भ्रष्ट किये दे रहे हैं।

यानी प्राचीनकाल में आग अरनी से जलाई जाती थी, तो दियासलाई से अग्नि प्रज्वलित करना घोर पाप है।

कुछ यह साबित करने पर तुले है कि तमाम देवी-देवता(God) देव लोक में रहते हैं; साधक के लिए वहां से भागे-भागे नंगे पाँव आकर प्रत्यक्ष होकर उनकी मनोकामना पूरी करते हैं।

यूनिवर्सिटीयों में संस्कृत के अत्यंत प्राचीन तंत्रग्रन्थ भरे पड़े हैं। उनमें से दर्जनों तो प्रसिद्ध आचार्यों एवं पंथों के हैं। एक भी व्यक्ति ने उपर्युक्त का अनुमोदन नहीं किया है। उन सभी ने कहा है कि ये अमूर्त शक्तियां है, समस्त ब्रह्माण्ड(Universe) में व्याप्त है (यानी ऊर्जारूप) । ये भाव से आकर्षित होकर रूप ग्रहण करती हैं और साधक को  ही इतना सशक्त बना देती है कि वह अपनी मनोकामना को इच्छा मात्र से पूर्ण कर लेता है।

प्रत्यक्ष भी साधक का भाव होता है। वह भाव जिसका वह ध्यान लगाता है। दूर्गा पूजा के समय बंगाल – बिहार में हजारों मूर्तियाँ बनती हैं। सब में भिन्नता होती हैं। यहाँ सूत्र यह है कि आप जिस रूप का ध्यान लगा(Meditated) रहे हैं , वह प्रकट होगा। वास्तव में आपका ही भाव पॉजिटिव रूप में घनीभूत होकर प्रकट होता है और तन्त्र में इसे बहुत बड़ी सिद्धि माना जाता है।

 

कृपया सनातन धर्म को अपनी जड़ आस्थाओं , विधियों, प्रक्रियाओं , सम्प्रदायों में बाँध कर मारिये मत। इसकी पहले भी बहुत दुर्दशा हो चुकी हैं। अआप बंधे रहना चाहते है, बंधे रहिये। हम सम्प्रदाय नहीं चला रहे है कि सबको कनविन्स करते फिरे कि हमारे अनुयायी बन जाओ।

जो तर्क , बुद्धि, मस्तिष्क(Logic, intelligence, brain) से इस हतप्रभ कर देने वाले विज्ञान को जानकार लाभ उठाना चाहते हैं;  ‘धर्मालय’ उनके लिए हैं।जड़ आस्थावादियों(Faithists) के लिए नहीं।

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2 Comments on “धर्मालय का ध्यान एवं योग”

  1. सत्य है गुरुमहाराज अब इन सम्पर्दायो के गुरुवो या संचालको या शिष्यो से इनके विधान के वैज्ञानिक आधार पूछे तो आहब गजब उत्तर देबे लगते है।

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