तन्त्र सिद्धियों की वैज्ञानिक तकनीकी क्या है?

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जब भी आप अपनी आंतरिक क्रियाओं पर ध्यान देंगे, आपको ‘तन्त्र’ की रहस्यमय तकनीकी का वैज्ञानिक ज्ञान हो जाएगा। आपको प्यास लगती है, तो क्या प्रकिया होती है। पानी शरीर को चाहिए होता है, पर अनुभूति आपक अंदर उत्पन्न होती है। यह ‘पानी’ की कामना उत्पन्न करती है। ‘कामना’ उत्पन्न होते ही भाव चक्र से जुड़ जाता है। वह जितना गहरे (शक्तिशाली होगा) चलेगा, कामना की गहराई और व्याकुलता बढती जायेगी। इसकी अनुभूति मस्तिष्क को होगी और मस्तिष्क आज्ञाचक्र के हाथों से (तरंगों से) उस कामना पूर्ती के लिए शरीर के विभिन्न चक्रों को स्पर्श करता आवश्यक क्रिया सम्पन्न करता है। ‘कामना’चाहे पानी की हो या सिद्धि की या अन्य किसी प्रकार की, इसी प्रकिया से पूर्ण होगी।एक मद्यप भी इसी प्रकिया से अपनी शराब की जरूरत को पूरी करता है।

‘तन्त्र’ में ही नहीं, वैदिक ऋषियों ने कहा है कि यह प्रकृति एक कल्पवृक्ष है। इससे जो चाहोगे, वही मिलेगा, पहले कोई कामना तो करो। ‘तन्त्र’ की सभी देवियाँ शवों पर आसीन है। अधिकतर साधनाएं शमशान में करने के निर्देश है। इसका अर्थ केवल भौतिक श्मशान नहीं है। श्मशान का अर्थ भौतिकता से शून्य होना या विचारों के प्रवाह से शून्य होना भी है। हमारे आँख, कान हैं, इसलिए हमारी दृश्य और श्रवण शक्ति इन पर निर्भर है, वरना हमारी तरंगों की क्षमता इससे कहीं अधिक है। इन भौतिक इन्द्रियों एवं देह की अनुभूति से मुक्त होना ही शव पर बैठना है। यह एक दुर्गम मानसिक अवस्था है और अभ्यास से ही प्राप्त की जा सकती है, चमत्कारिक क्रियाओं की विधि को विधि पूर्वक अपनाने से नहीं ।विधियां जिसे उत्प्रेरित करेंगी, वे आपके ऊर्जा तत्व है।यदि वह कमजोर है, तो कोई भी पूजा-पाठ निरर्थक है।

जब आप शून्य में जाकर शक्तियों को जगाने का प्रत्यन करेंगे, तो आपको समस्त शक्तियां वही केंद्रीभूत हो जाएंगे। इसके बाद ही तकनीकी विधियों का काम प्रारंभ होता है। ‘तन्त्र’ का मार्ग सरल नहीं है। दृढ़ संकल्प, अटूट श्रद्धा, योग्य गुरु, धैर्य साहस (निर्भयता), ऊचित प्रक्रिया और अभ्यास – यही तन्त्र की गूढ़ता का रहस्य है। इसी प्रक्रिया से शारीरिक चक्रों की शक्ति को बढाकर नियंत्रित करने का अभ्यास साधना है और वांछित शक्ति की प्राप्ति सिद्धि। यही वास्तविक विज्ञान है, इसलिए इसका फल निश्चित है। जैसी कामना होगी, जैसी लग्न होगी, वही फल प्राप्त होगा, उसी के अनुरूप अगला जन्म होगा। जो-जो भाव संचित किये है, आपकी जीवात्मा का आवेश उत्पादक पैटर्न वही होगा और मृत्यु के बाद भी यह आवेश उत्पन्न होता है, इसलिए उसे शरीर (नेगेटिव यंत्र) भी वैसा ही प्राप्त होता है। उसी ऊर्जा समीकरण में प्राप्त होता है। उसके शरीर की मातृ-पितृ शक्तियां भी उसी समीकरण में होंगी। इस समीकरण को शून्या कारके सदाशिव या परब्रह्म में स्वयं को जोड़कर उनका दर्शन करना ही मोक्ष है। तब सारा ज्ञान हो जाता है और कुछ भी जानने, पाने की इच्छा शेष नहीं रहती। कामनाएं गयीं,आवेश गया , तो मुक्ति निश्चित है।

 

 

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2 Comments on “तन्त्र सिद्धियों की वैज्ञानिक तकनीकी क्या है?”

  1. शर्माजी प्राणाम मै खेचरी मुद्रा के बारे में अनुभूत जानकारी प्राप्त करना चाहता हूँ यदि सम्भव हो तो बताने की कृपा करिये!

    1. अलग अलग इन मुद्राओं के सम्बन्ध में जानकारियाँ देना संभव नहीं है| हम धीरे धीरे एक एक करके इन सबको अपने वेबसाइट पर डालेंगे| आध्यात्म में बहुत सारे सब्जेक्ट है और लोग अलग अलग सब्जेक्ट की जानकारियाँ जानना चाहते है| हमने जिन मुद्राओं का प्रयोग किया है वो हमारे द्वारा खोजी गयी मुद्राएं है| और पहले हम उन्हें देंगे इसके बाद शास्त्रीय मुद्राओं की जानकारी दी जाएगी| इनमें से कुछ हमारे द्वारा अनुभूत है पर सभी नहीं|खेचुरी मुद्रा पर अभ्यास करने की कोशिश हमने कभी नहीं की| हमें अपनी मुद्राओं से ही; जो हम करना चाहते थे उनमें सहायता मिली| शस्त्रीय मुद्राएं जो सरल थी उनके बारें हमें कुछ प्रयोग किये| परन्तु सारी मुद्राएं कोई एक व्यक्ति अभ्यास कारके अनुभूत करे यह संभव ही नहीं है| क्योंकि यह सैकड़ों में है|

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