तन्त्र विधि से शिवलिंग साधना

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‌मन्दिरों में स्थापित शिवलिंग मूलाधार का शिवलिंग हैं सामान्य जन प्रतिकात्मक ढंग से इन पर जल अपॆण करते हैं.पर हमारे शरीर में यह जल लगातार अपिॆॆत होता रहता है.इसी से हमारा जीवन है .यह जल एक ऊजाॆथारा है,जो सिर के चाँद के ऊपर लगातार बनती रहती है और उसमें गिरती रहती है.यह पुराणों में वणिॆत सती है. इसे ही सावित्री या देवगंगा भी कहा जाता है.यह मूलाधार प्लेट के शिवलिंग पर गिर कर ऊपर उठती है, फिर सिर के सहस्त्रार से टकरा कर नीचे आती है. ये तीनों धारायें पूँछ के रूप में नीचे जाती हैं.यह गंगा जितनी शक्तिशाली होती है ,उतनी ही हमारे शरीर और जीवनीशक्ति में वृद्धि होती है.एक सीमा के बा‌द यह दैवी शक्तियों में परिवतिॆत होने लगती हैं.

‌   ब्रह्म मूहुतॆ में पूवॆ की ओर मुख करके सुखासन में बैठ कर श्वाँसगति के साथ (सो हं)मन्त्र के साथ चाँद पर नीचे की ओर मानसिक बल लगाकर चाँद में चाँदी जैसी ऊजाॆ जलधारा को उसमें गिरते कल्पना करना और उसे रीढ़ के मध्य से मानसिक बल द्वारा मूलाधार केन्द्र केन्द्र पर गिराना ,यह गुप्त साधना है. भिन्न भिन्न मागोॆं में पूजाविधि बदलती है .मामूली अन्तर से मुख्य तकनीकी यही होती है.

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