तन्त्र की शक्ति का रहस्य

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तन्त्र की शक्ति – यह किसी परालोक की शक्ति नहीं है। ऐसा कोई परालोक होता ही नहीं है; जहाँ देवी-देवता और उनकी शक्ति रहती हो या साधक के मंत्र अनुष्ठान से सिंची चली आती हो। ‘परालोक’ का अर्थ है, जो हमारी अनुभूतियों से परे का लोक है। इसी लोक में , जो अनुभूतियों से परे का यही जगत है और हर जगह व्याप्त है, तन्त्र की तमाम शक्तियों का रहस्य छुपा है।

हम अपना शरीर देखते या अनुभूत करते हैं; पर हम इसका केवल बाहरी प्रत्यक्ष रूप ही अनुभूत कर पाते हैं। यह बाहरी रूप एक ऊर्जात्मक स्वरुप है, जो स्थूल है। इसके अंदर इससे सूक्ष्म एक स्तर है, उसके अंदर उस्ससे सूक्ष्म और इस प्रकार यह नौ स्तर में है। मध्य में एक सूक्ष्म ‘गैप’ है। इसके अंदर परमात्म तत्व यानी परमात्मा की लहर बहती रहती है। यह प्रत्येक अस्तित्त्व की संरचना है। जैसे पानी को लीजिये। हम जानते है कि यह H20 है याने हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का यौगिक परन्तु ये दोनों गैस है और पानी हमें गैस रूप में नहीं, किसी और रूप में अनुभूत होता है। इन दोनों गैस के अणुओं में भी ऊर्जा के उपर्युक्त नौ सूक्ष्म से सूक्ष्मतम स्तर है और बीच में ‘गैप’ है। यह गैप हर स्थान की संरचना के मध्य में होता है। यह ‘गैप’ ही इसके अस्तित्त्व का कारण है।

इन रहस्यों को जानने वाला इसका लाभ उठाता है और इनसे ऐसे प्रयोग विकसित कर लेता है, जिनसे विभिन्न क्षेत्र में ऐसे गुणों को उत्पन्न किया जा सके, जो सामान्यतया नहीं पाए जाते। मुर्ख ही इन्हें चमत्कार समझते हैं। ये चमत्कार नहीं है। उन जानकारियों पर आधारित प्रयोग मात्र है, जिन्हें आप नहीं जानते।

उदाहरण के रूप में आपको ज्ञात नहीं कि आपके तलवों का शरीर से क्या सम्बन्ध है और वह किन-किन जगहों को प्रभावित करता हैं। लेकिन हम जानते हैं कि वह कैसे बनता है और उसका काम क्या है। किसी को नींद नहीं आती , तो डॉक्टर शामक औषधियाँ देते है, जो रक्त के प्रवाह को कम कर देता है यानी आपके शरीर की विद्युतीय क्षमता में रेजिस्टेंस लगा देता है और उस नशे की बेसुधी को आप नींद समझ लेते हैं। यहाँ डॉक्टर यह भूल जाता है कि शरीर या मन को जिस आदता का शिकार बना दिया जाये, वह उसका आदी हो जाता है। वह आपको नशे का आदी बना देता है। पर इसे शरीर एडजस्ट कर लेता है और फिर आपको दवाओं से आगे इंजेक्शन तक बढ़ना पड़ता है, डोज बढ़ाते जाना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि आयुर्वेद निर्देश है। मुर्खता पैथी में नहीं , उसके विशेषज्ञों में होती है। ऐसे वैद्यों की कमी नाहीं, जो सी दशा में अफीम का प्रयोग करने लगते है; जिसकी आपातकालीन व्यवस्था तन्त्र में हैं। आयुर्वेद में इसे तन्त्र से ही लिया गया है। यह आपातकालीन व्यवस्था पागलपन की अनिद्रा को नष्ट करने की है। कई बार केवल नींद आ जाने से ही पागलपन नष्ट हो जाता है।

हम जानते हैं कि तलवों से धरती की ऊर्जा रीढ़ होते मस्तिष्क में और सारे शरीर में फैलती है और इससे प्रतिक्रिया करने वाली ऊर्जा मस्तिष्क के चाँद से आती है। हम यह भी जानते है कि सूक्ष्म स्थूल से अधिक शक्तिशाली होता है। हम नमक और गर्म पानी के घोल से पैरों को साफ करके उसकी कोशिकाओं को उत्तेजित करेंगे (नमक का गुण), सिर के चाँद को इसी प्रकार मालिश करके साफ करवाएंगे और यहाँ शराब, भाँग, धतूरा,अफीम जो मरीज के समीकरण के उपयुक्त है, मंत्र सहित (मंत्र का रहस्य अगली कड़ी) मालिश करवाएंगे। नींद अ जाएगी और तिन-चार दिन के बाद  इसकी जरूरत नहीं रहेगी, क्योंकि इसकी आयनित ऊर्जा उस कारण को ही नष्ट कर देगी, जो अधिक विद्युत् बना रही है। वह नार्मल हो जाएगा और रोग समाप्त।

दूसरा तरीका यह कि इन मादिक वस्तुओं को सूक्ष्मतम रूप देंगे (तन्त्र की गुप्त प्रक्रिया) और उसका एक-एक बूँद 6-7 दिन प्रयुक्त करेंगे (खिलाएंगे) , न नशा होगा, न साइड इफ़ेक्ट और कारण नष्ट हो जाएगा। यही प्रक्रिया अभिचार कर्मों में करके खिलाया-पिलाया जाता है। यह अविश्वसनीय लगता है; पर 100%प्रमाणित है और गंभीरतम लाइलाज रोग भी मैंने इससे दूर किये है। दुष्ट लोग इस विधि से विषैला योग बनाकर दिलवा देते है और एक बूँद हाहाकार मचा देता है। कुछ दिनों में ऊर्जाचक्र के समीकरण को ही बिगाड़ देता है। दुनिया का कोई डॉक्टर , कोई साइंटिस्ट  न इस बूँद के विष को ट्रेस कर सकता है, न ही उसकी चिकित्सा कर सकता है। इसकी चिकित्सा समय रहते जटिल तांत्रिक प्रक्रियाओं से ही सम्भव है, जो सामान्य लोगों को अजीबोगरीब लगता है, क्योंकि उन्हें और वैज्ञानिकों को भी यह ज्ञात नहीं कि हवन के धुंए में जड़ी-बूटियों या प्रतिषेधक पदार्थों की आयनित ऊर्जा होती है। उनके लिए वह केवल धुंआ है और  जलकर बची वस्तु राख, जिस राख को खाने से रोग कैसे दूर होगा, यह उनकी समझ से बाहर है; पर यदि वे उस राख का केमिकल परिक्षण करवाएं, तो रहस्य स्पष्ट हो जाएगा कि राख-राख में अन्तर होता है। वे एक जैसे नहीं होते।

ज्योतिष के सभी उपचारों में यथा रत्न , अंगूठी, कड़ा, यज्ञ , अनुष्ठान , मंत्रोपचार , अभिषेक स्नान आदि में तन्त्र के इन्हीं सूत्रों का प्रयोग किया जाता है।

मुर्ख-अज्ञानी समझते हैं कि ‘तन्त्र’ मतलब निष्कृष्ट क्रियाएं; पर इन मूर्खों को ज्ञात नहीं कि समस्त देवियाँ, शिव, शिवलिंग, भैरव, देवी-देवता , महाकाल, मन्दिर, यज्ञ, देवी, पिण्डिया , पूजा का चक्र , देवी चक्र , मन्त्र , ज्योतिष, वास्तु सभी में ‘तन्त्र’ के ही सूत्र और नियम स्थापित है। ये इसी की देन है। ‘तन्त्र’ का अर्थ व्यवस्था है और यह प्रकृति की उर्जा व्यवस्था का विज्ञान है। इस विज्ञान की उत्पत्ति सदाशिव, परमात्मा, पर ब्रह्म या 0 से होती है।  इस सम्पूर्ण व्यवस्था को जानने वाला ही सिद्ध है, वह सन्यासी है, वही तत्वज्ञानी है और तन्त्राचार्यों के अनुसार जो इस सम्पूर्ण व्यवस्था का सब कुछ जानता है, वह साक्षात शिव का ही प्रत्यक्ष रूप है।

यह भाव अतिशियोक्ति है। कोई मनुष्य परमात्मा नहीं होता; पर ऐसा माना जाता है कि सम्पूर्ण रहस्य को जाननेवाले की आत्मा निर्मल होकर उसके समान निर्विकार हो जाता है और उसका ज्ञान परमात्मा का ज्ञान बनकर जीवों का कल्याण करता है , इसलिए वह परमात्मा रूप ही है। बड़ा से बड़ा साधक भी इसके समकक्ष नहीं है। इन्हें इसका आदर करना चाहिए और वह सब जानना चाहिए, जो वह नहीं जानता हो ।

कुछ अन्य बातों को देखिये –

  1. घर में सूर्य की रोशनी बाधित हो, तो शनि का कोप होता है। बहुत परेशानियाँ होती है। घर में मदार के फूल, जड़ का हवन सूर्य मंत्र के साथ करते रहिये। परेशानियाँ दूर रहेगी। यहाँ सामान्य विज्ञान है मदार में सूर्य के समकक्ष ऊर्जा होती है। वह सूर्य की ऊर्जा की कमी पूरी कर देगी और नेगेटिव ऊर्जा नष्ट हो जाएगी।
  2. गर्भाशय विकार, उदर विकार, मासिक विकार, पेट की खराबी- कई रोग विकार की उत्पत्ति के कारण है। नाभि और अंगूठे के नख का ट्रीटमेंट कीजिये। हिंग या जमाल गोटा घिसकर नखों पर और नाभि पेट-पेडू पर मालिश कीजिये। दो-तिन दिन में या हफ्ते भर में जमा हुआ मल, रक्त , विकार निकल जाएगा।

सावधान – इससे पेट चलने लगता है और मासिक की तीव्रता होती है। ह्रदय रोग , गर्भ के समय इसका प्रयोग न करे। असर हो जाए ,तो लेप मिटा दें – यानी गर्म पानी से धो दें वर्ना यह रुकेगा नहीं।

  1. कमर दर्द – महिलाओं को यह दर्द गर्भाशय विकार के कारण भी होता है, रक्त की कमी के कारण भी, कैल्शियम की कमी के कारण भी। दूब का रस, केला, संतरा, अनार – चुने का पानी का भोजन और कमर –नितम्बों से तलवों तक प्रतिदिन गंगोट , आक, चिडचिडा, मूर्दाशंख , बरगद अंकुर, गूलर, वायविडंग, बच, मुलेठी, पवार, मिरचाईया – की बराबर मात्रा में सुखाकर चूर्ण बनाकर गर्म पानी में मट्ठे जैसा घोल बनाकर मालिश करें। सूखने पर गर्म पानी से धो लें। सारे शरीर –चेहरे पर मालिश करके धोने पर – चर्म विकार, चमड़े का सूखापन , मुंहासे, दाग-धब्बे, ढीलापन आदि भी नष्ट हो जाएगा और प्राकृतिक गोरापन भी प्राप्त होगा।
  2. श्वाँस के रोग – जिब लोगों को श्वाँस में कमी है ; वे प्रतिदिन रात में शुद्ध सरसों तेल में हिंग मिलकर गुदामार्ग में अंदर बाहर पचाए और बीच की ऊँगली से जल्दी-जल्दी गुदामार्ग को दबाएँ और गहरी साँस लें। एक महीने में श्वाँस खुल जाएगी।

दम्मा हो, तो गाय के ताजा गोबर का रस 10 ग्राम , घी मिलकर पीयें (प्रातःकाल प्रतिदिन) या धतूरे के फूलों (5) को पीसकर 50 ग्राम जल में घोलें और इसमें 15 ग्राम देशी चना डाल दें। जब अंकुर हो जाए , तो चना निकालकर इस पर 5 ग्राम मदार का दूध डालकर मिला दें और गाय की घी में भून लें। इसे बोतल में बंद कर लें। इसमें से एक दाना प्रातः – एक दाना सायं 5-5 ग्राम सौंप के साथ खाकर ऊपर से गाय का दूध पीयें। सारा कफ दो-तिन दिन में निकल जाएगा। दम्मा दो-तिन बरस का हुआ तो दो – तिन बार में  जड़ से समाप्त हो जाएगा।

  1. भूत-प्रेत प्रकोप –  इसके अनंत रूप है। लक्षण से ही चिकित्सा होती है। बहुत से लोग, विशेषकर स्त्रियाँ इससे प्रभावित होकर भी नहीं जानते कि वे ऊपर शक्ति की शिकार है। उन्हें कई मानसिक शारीरिक यन्त्रणायें होती है, डॉक्टरी में कुछ नहीं निकलता।

तन्त्र में प्रत्येक समस्या का समाधान है, चाहे वह रोग हो या कोई शोक-चिंता-भाग्य की समस्या , पर लोग पूरी बात बताते ही नहीं, झूठ भी बोलने लगते है।

विशेष – हमारे यहाँ सेक्स की समस्याएं सर्वाधिक आते है। ऐसे सेक्स रोग से पीड़ित स्त्री-पुरुष को हमारी विशेष चेतावनी है कि बाजार में एलोपैथिक हो या आयुर्वेद या हेमीयोपैथ – इसकी दवाएं गर्म होती है और 90% सेक्स का रोग में गर्मी अधिक होती है। यदि गर्मी को बिना दूर किये इन दवाओं का प्रयोग किया या बहुमूत्र – स्वप्नदोष आदि रहते इनका प्रयोग किया; तो बहुत नुक्सान होगा। रोग बहुत बढ़ जाएगा।

हमारे वेबसाइट पर गर्मी दूर करने के सरल उपाय निःशुल्क उपलब्ध है। आप कहीं से दवा लेकर खाए; पहले गर्मी अवश्य दूर कर लें या प्रमेह है तो उसकी चिकित्सा पहले करें।

 

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