घट पूजन

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इसके पश्चात वहाँ भैरवी के सामने रखे घट का भी पूजन किया जाता है। इसमें मदिरा या मदिरा द्रव्य होता है। इसके सामने भुना मांस, भुना चना और फल होता है। तीन चषक (पात्र होते है) एक गुरु का, दूसरा साधक तीसरा साधिका का। पूजन के पश्चात सबसे पहले गुरु को मदिरा का पात्र अर्पित किया जाता है। गुरु उसे भैरवी रुपी देवी को अर्पण करता है। भैरवी उससे एक घूँट पान करती है, फिर उससे गुरु एक घूँट पान करता है, फिर साधक गुरु इसे साधक के पात्र एवं घट में डाल देता है।

साधक इसे फिर देवी को अर्पित करता है। वह एक घूँट लेती है और साधक को देती है। साधक उसे पी जाता है। यह पात्र साधक का होता है। फिर तीसरा पात्रा भरकर देवी को अर्पित किया जाता है। भैरवी घूँट भर्ती है, फिर गुरु को देती है। इस पात्र के शेष को साधक को नहीं दिया जाता । इससे देवी का पात्र जूठा हो जाता है और साधक को मना होता है। वह देवी रुपी भैरवी का जूठा खा-पी सकता है, पर उसे अपना जूठा उसे नहीं खिला सकता।

देवी पर चढ़ा प्रसाद तीनों ग्रहण करते है। पूजन की विधि सामान्य पूजन विधि होता है, जैसे देवी या घट की पूजा होती है; पर तन्त्र में मानसिक पूजा और केन्द्रीयकरण का भाव प्रमुख होता है, विधियां नहीं। साधक शुद्ध मानसिक भाव से केवल फूल प्रोक्षित करके मंत्र पाठ करके पूजन कर सकता है। घट को भी देवी माना जाता है। इसलिए इसका भी मन्त्र वहीँ होता है । यहाँ का मंत्र एक विशेष मार्ग का है। त्रिपुर  भैरवी के अन्य मन्त्र भी है।

विशेष – पूजन विधियों में अंतर भी होता है। कहीं पहले चक्र की पूजा करके भैरवी की पूजा की जाती है, तो कभी चक्र एवं घट दोनों की पूजा के बाद भैरवी पूजन होता है; पर यह सरल विधि यहाँ दी है। देवी भैरवी में प्रतिष्ठित होती है। चक्र को पीठ और घट को देवी पात्र समझ कर पूजा की जाती है।

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