क्या साधनाकाल में ब्रह्मचारी रहना आवश्यक है?

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इस विषय को समझने के लिए सबसे पहले ब्रह्मचर्य का अर्थ समझना होगा। ब्रह्मचर्य का अर्थ है, ब्रह्म में आचारण यानी ब्रह्म को जानने-समझने में लिप्त होना। कुछ लोग इसका अर्थ कामभाव का निरोध समझते है; पर इसका अर्थ यह नहीं है। इसका अर्थ है कि जिस समय आध्यात्मिक काम कर रहे है ; उस समय उसी पर ध्यान दें। काम , क्रोध , लोभ, मोह, निद्रा – ये पांच अत्यंत शक्तिशाली आकर्षण रखते है। जरा सी चिंगारी लगी नहीं कि ये भड़क उठते है। इस कारण यह निर्देश दिया जाता है कि इनसे दूर रहो। यह ठीक ऐसा ही है , जैसे बच्चों को कहा जाता है कि पढने पर ध्यान दो। टीवी सीरियल मत देखों।

पर इस विषय में भी अनेक प्रकार के विपरीत तथ्य प्राप्त होते है। मण्डल मिश्र और उनकी पत्नी एक साथ ही ब्रह्म के उपासक थे। शंकराचार्य मण्डल मिश्र के शास्त्रार्थ में पराजित हो जाने के बाद उनकी पत्नी से शास्त्रार्थ करना पडा था। लगभग सभी ऋषि मुनि शादी शुदा थे। स्वयं ब्रह्म के ही सभी रूप अपनी पत्नियों और प्रेमिकाओं के साथ है। शैवमार्ग , देवी मार्ग , अघोर मार्ग , भैरवी मार्ग में भोग से ही ब्रह्म और मोक्ष की प्राप्ति की विधियां है। इसलिए ब्रह्मचर्य का अर्थ काम निरोध नहीं है और यह आपके अपने मन और संस्कार पर है कि आप ज्ञान कैसे प्राप्त करते है । तन्त्र के आचार्यों ने कहा है कि विधि, तकनीकी , नियम का कोई महत्त्व नहीं होता। इस बात से कोई अन्तर प्राप्त नहीं होता कि किसी ज्ञान की प्राप्ति कैसे की गयी है। महत्त्व उस ज्ञान या फल का होता है । हमारे दवात बनाई गयी विधियों , तकनीकीयों , नियम-सूत्रों का नहीं। हम नियम बनाने वाले होते कौन हैं? इस प्रकृति पर केवल परमात्मा के नियम व्याप्त है। इनके विरुद्ध चलनेवाला नष्ट हो जाता है।

यह सत्य भी है। जिस अंग से काम न लो, वह निष्क्रिय हो जाता है, जिस शरीर से काम न लो, वह निष्क्रिय हो जाता है और ‘कामना’ किसी भी प्रकार की हो , विकार ही उत्पन्न करती है और इसमें केवल ‘कामभाव’ ही नहीं है। हम इनका निरोध नहीं कर सकते। यह असंभव है। हम शरीर को और उसके अंगों को निरुद्ध कर सकते है; अपने मानसिक भाव को नहीं। शरीर को निरुद्ध करेंगे, तो शरीर नष्ट हो जागेया। और इस प्रकार तो किसी भी विषय को साधा नहीं जा सकता। इससे उसका कोई सम्बन्ध ही नहीं है।

यहाँ श्री कृष्ण कहते हैं कि कर्म का नहीं , राग का त्याग करो। कर्म तो तुम त्याग कर ही नहीं सकते; सभी कर्म करते हुए भी उनसे राग मत रखो और जो शरीर का धर्म है; उसको करने दो। सारे अनर्थ ‘;राग’ के कारण होते है। कर्तव्य समझकर अपने कर्म करते जाओ। गुण ही गुण में बरतते है – यानी शरीर की आवश्यकताएं शरीर ही पूरा करता है। उसका आनन्द उठाओं , पर जब वह बीत जाए, तो उसके आनन्द का स्मरण करके फिर से उसकी चाह में डूबना ही ‘आत्मा’ को किसी भी विषय से भटकाता है। भूख लगी दूध पिया, कल पानी ही मिला तो दूध न मिला इसकी क्षुब्धता ही राग है। जो इस गूढ़ रहस्य को जानता है, वही सच्चा सन्यासी है।

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