क्या साई भगवान् है? काशी के शंकराचार्य की आलोचना में कितना दम है?

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यह प्रश्न ही निरर्थक है। ‘भगवान्’ शब्द हमारी आदि और वर्त्तमान दोनों संस्कृति में के आदरणीय संबोधन मात्र के रूप में व्यवहृत होता रहा है। ‘प्रभु’ भी ऐसा ही सम्बोधन रहा है।

हाँ, ईश्वर का अर्थ वह पहला परमाणु है, जो ब्रह्माण्ड के रूप में विकसित हुआ। हमारे यहाँ विष्णु ब्रह्माण्ड के नाभिक को कहा जाता है। वैदिक ऋषि उसे सूर्य का बड़ा भाई मानते थे। उस महा शक्ति पुंज को किसी मनुष्य में प्रदीप्त नहीं किया जा सकता । कोई मनुष्य ईश्वर नहीं हो सकता। अवतारों को उसक अंश बताया जाता है, पर वह अंश तो सभी है। अंतर केवल ज्ञान-अज्ञान का है।

शंकराचार्य का प्रमुख विरोध साईं की मूर्ति को सनातनधर्म के सार्वजानिक मंदिरों में स्थापित करने से है। यह संविधान, कानून, नैतिकता तीनो के आधार पर गलत है। किसी को अधिकार नहीं पहुँचता कि नये-नये देवी-देवता बनाकर उसे सनातनधर्म के मंदिरों में स्थापित कर दे। जिनको आस्था है वे अलग मंदिर बना लें। घर में चाहे जैसे पूजा करें। पर सार्वजनिक मंदिरों में किसी भी आस्था को प्रतिस्थापित करने का तो अर्थ यह हुआ कि हम सहस्त्रार्जुन को भी वहां प्रतिष्ठित कर देंगे, क्योंकि प्राचीन ग्रंथों में इसकी भी पूजा के विवरण मिलते है। हैहेय वंश का यह अत्याचारी नृशंश राजा परशुराम के हाथ मारा गया था। मगर उसके प्रशंसक फॉलोवर भी थे। … यह गलत इसलिए भी है कि कल कोई मस्जिद में राम की, गिरजाघर में महाकाली की मूर्ति स्थापित करने चला जाएगा । तब तो अव्यवस्था फैलेगी, उसका जिम्मेदार कौन होगा?

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