क्या बिना शुक्राणु के संतानोत्पत्ति हो सकती है?

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बिना बीज के धरती पर अंकुर उत्पन्न नहीं होता। आपने कहा है कि तन्त्र में तो सबकुछ संभव है। आपका कहना सत्य है।  इसके लिए अनुष्ठान है; पर वे बेहद जटिल और कठिन है। स्त्री द्वारा मंत्र जप करके अनुष्ठान करना पड़ता है। प्रारंभ में तिन महीने उसे स्वयं रात में एक घंटे तक मंत्र – पूजा करनी पड़ती है। परहेज से रहना होता है। फिर दस दिन का तंत्रानुष्ठान होता है। इसमें दैवी –शक्तियों का आवाहन पति के रूप में किया जाता है। यह बहुत खर्चीला और कठिन साध्य है; क्योंकि प्राकृतिक वातावरण की भी जरूरत होती है। विशेषकर १० दिन।

इसमें यह भी समझना आवश्यक है कि सूक्ष्म ऊर्जा रूप देवता के पास कोई शुक्राणु नहीं होता। व प्रकृति से ही उसे गर्भ में डालता है और मनुष्य को मनुष्य का शुक्राणु चाहिए, इसलिए वह उसी गुणों से सम्पन्न किसी मनुष्य का ही होता है, चाहे वह एक दायरे में कहीं का हो। वह एक कोस का दायरा होता है यानी दो मील त्रिज्या लगभग 3 कि.मी.  1 स्त्री संकल्पित हो,  इस अनुष्ठान के प्रति मानसिक रूप से बद्ध हो या यह भी आवश्यक होता है । यह प्रयोग गुप्त रहस्यमय क्रियाओं के अंतर्गत आता है और बिरला ही कोई इन्हें जानता है।

हां, शुक्राणु चाहे कितना भी दुर्लब हो, यदि वह बन रहा है; तो स्थिति सरल होती है। पुरुष 6 महीने में उसकी शक्ति और संख्या को समृद्ध कर सकता है। पर केवल शुक्राणु ही सब कुछ नहीं है।  स्त्री का अंडाणु भी स्वस्थ होना चाहिए। रक्त की कमी, गर्भाशय विकार, योनि में अम्लीय रस का बनना, रतिक्रीड़ा के समय  असावधानी और नस्ल (सामुद्रिक तौर स्त्री/पुरुष को पशुओं के भिन्न नस्लों के अनुसार बांटा गया है।) की प्रतिकूलता । यह सब सन्तान प्राप्ति में बाधक होते हैं।

 

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