क्या गंगा में स्नान करने और संगम में डुबकी लगाने से पाप कटते हैं और मुक्ति मिलती है?

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वह गंगा, जिसके बारे में यह कहा गया है; गंगा नदी नहीं है। वह संगम भी इलाहाबाद का संगम नहीं है। नदी में स्नान करने से शरीर पवित्र होता है; भला मानसिक जगत पर इसका क्या प्रभाव हो सकता है? कुछ विशेष ऋतु में नदी स्नान से शरीर एवं स्वास्थ्य की पुष्टि होती है। यह भारतीय संस्कृति की परम्परा रही है कि इन ऋतुओं एवं नक्षत्रों में लोग नदी, तालाबों में प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करते थे। गंगा में एक विशेषता जरुर रही है; की इसका जल नहीं सड़ता था – अब तो वह भी नहीं है।

सिर के चाँद से, एक ऊर्जा अंदर गिरती है, या पम्प होती है। यही ॐ का बिंदु है। तन्त्र में इसे शिवसार कहा जाता है। इसे सावित्री-गायत्री भी कहा जाता है। इसके मध्य में ० या परमात्मा होता है, उसके बाहर सरस्वती और उसके ऊपर गंगा। यह रीढ़ से मूलाधार के प्लेट से टकराकर ऊपर उठती है और फिर सिर के प्लेट से टकराकर नीचे जाती है। यही तीन धारा सरस्वती, गंगा और यमुना कही जाती है। इसके मध्य ही 9 पॉवर-पॉइंट होते है। इन पॉइंटो पर तीनों धाराएं मिलती है और +, – एवं न्यूट्रल के मिलाप से ऊर्जाओं की उत्पत्ति होती है। यही संगम है। इसमें डूबने से (ध्यान मग्न होने से) दिव्य शक्तियाँ प्राप्त होती है। अनाहत का केंद्रीय नाभकीय चक्र इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण माना जाता है। यह प्रयाग का संगम है। सहस्त्रार का संगम भी महत्त्वपूर्ण होता है। पर सभी मूलाधार पर गंगा को गिराकर ही साधनाएं प्रारम्भ करते है। आध्यात्मिक गंगा, सरस्वती, यमुना, संगम का यह अर्थ है। नदी और नदी का मिलाप नहीं।

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