कौन हैं ‘शिवा’?

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शिवा और शिव में अंतर

पिछले पोस्ट में मैंने जानबूझकर इस सम्बन्ध में विवाद छेड़ा है; क्योंकि यह विषय सनातनधर्म की कुछ ऐसे उलझनों से सम्बंधित है; जिनके कारण यह पूरा विज्ञान ही भ्रम के तानों-बानों में उलझ गया है।

‘शिवा’ – शिव का स्त्रीलिंग शब्द है। यह शिव की शक्ति का नाम है। सदाशिव की ‘शिवा’ योनिरुपा आदि मातृका है; जिसे काली के साधक महाकाली कहते हैं। यहाँ सदाशिव से ही इस महायोनि की उत्पत्ति होती है और सदाशिव से ही इसकी प्रतिक्रिया में लिंग की उत्पत्ति होती है। इनके धारक का कोई स्वरुप नहीं होता।

इन दोनों के मिलन से जन भैरवी-चक्र की उत्पत्ति होती है; तो इसके शीर्ष के कैलाश पर बिन्दुरूप ‘शिव’ का उदभव होता है। यहाँ से ये अपनी शक्ति से केंद्रीय नाभिक के राजराजेश्वर शिव के र्रोप में परिणत हो जाते हैं। इसकी शक्ति से समस्त ऊर्जा-उत्पादन बिन्दुओं से शिव के प्रतिरूप स्थापित हो जाते हैं। इस बिंदु रूप कैलासवासी शिव की शिवा ‘पार्वती’ हैं। यही उनकी भैरवी हैं। अर्द्धनारीश्वर में भी इनकी भैरवी यही मानी जाती हैं और शरीर के समस्त बिन्दुओं में भी।

सनातनधर्म की सबसे बड़ी समस्या यह है कि हर पंथ के लोगों ने एक ही बात को अलग-अलग नामों और फैंटम रूपक व्याख्याओं से भर दिया है। जैसे-काली के उपवास समस्त शरीर में केवल ‘काली’ के ही रूपों की व्याख्या करते हैं। ये 9, 13, 18, 26, 108, 128 …….. क्रम में अनंत रूपों में इसकी उपासना करते हैं। इसमें अन्य किसी देवी-देवता की अवधारणा ही नहीं है। इस दृष्टिकोण से सभी रूपों में शिव की भैरवी ‘काली’ हो जाती हैं।

अब दुर्गा के उपासक सभी उन्ही स्थानों में दुर्गा के रूपों की व्याख्या करते हैं; नित्या के उपासक उन्ही स्थानों पर नित्या की। महाकाल के उपासक सभी सभी उन्ही स्थानों पर महाकाल की और शिवलिंग के उपासक शिवलिंगों की व्याख्या करते हैं। मार्ग भेद से ये विष्णु, श्री देवी, भैरवी, अघोर पंथ कि डाकिनी-हाकिनी आदि अनेक नामों से प्रशाखित हो जाती हैं।

पर इससे भारी भ्रम उत्पन्न हो जाता है। सभी सत्य ही कहते हैं; व्याख्याएं भी सत्य है; पर जब एक ही स्थान पर दर्जन भर नाम हों, तो यह निर्धारित करना ज़रूरी हो जाता है कि स्थान में कौन कहाँ? और पूरा मामला ही भटक जाता है। जैसे हम कहें – कि सूर्य तो दिखाई पड़ते है, पर उनमें भास्कर, आदित्य आदि दिखाई नहीं पड़ते। उसमें इनका स्थान कहाँ है? इससे सारे विज्ञान की व्याख्याएं उलझ कर एक मृगमरीचिका उत्पन्न कर देते है। यह भारत के धार्मिक सनातन क्षेत्र के सम्प्रदायवादी भाव की देन है, वर्ना सभी तुलनात्मक व्याख्या करते। पर दूसरे तो विरोधी थे, उनका नाम लेना भी पाप था। इसलिए प्रत्येक मार्ग में इनकी चर्चा पर भी रोक थी।

हमें यह समझना होगा कि ब्रह्माण्ड या उसकी कोई भी इकाई एक विशिष्ट पॉवर-सर्किट में है। इसे ही भैरवी –चक्र या श्री चक्र कहा जाता है। इस सर्किट के अनंत पॉवर-पॉइंटो का ज्ञान रहते हुए भी तंत्राचार्यों ने ( जिनमें जाने-पहचाने वैदिक ऋषिगण भी है) मुख्या केंद्रीय धूरी के 9 पॉवर-पॉइंटो की ही सर्वाधिक महत्ता दी है। हमें इन नौ को अलग-अलग नामों से जानना ही होगा, क्योंकि तभी हम इनके गुणों का अध्ययन कर सकते हैं, जो पहले से मौजूद हैं। क्या अंतर पड़ता है कि हम इन्हें डीटा, बीटा नाम से पुकारें या 1,2, 3 … रूपों में।

इस ब्रह्माण्ड की प्रत्येक प्रकार की शक्ति, प्रत्येक प्रकार के फल इसी पॉवर-सर्किट से उत्पन्न हो रहे हैं; इसलिए इनका अध्ययन करके इसका भौतिक रूप बनाया जाए, तो हम हर तरह की शक्तियों को प्राप्त कर सकते हैं। आधुनिक विज्ञान की तकनीकी का उपयोग करके हम अचम्भित करने वाले वैज्ञानिक यंत्रों का अविष्कार भी कर सकते हैं। क्या आवश्यक है हजारों वर्ष पूर्व की स्थिति में ही इनका उपयोग किया जाये? मैं तो सिद्धियों में भी आधुनिक ध्वनि, प्रकाश आदि के उपकरणों का उपयोग करवा रहा हूँ और इसमें अप्रत्याशित सफलतायें प्राप्त हो रही है।

 

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