कैसे लगाये ध्यान ?

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कैसे लगाये ध्यान ?  (How to apply meditation?)

  1. श्वाँस से चक्र शुद्धि – ध्यान लगाने से पहले सुखासन में सरल रूप से पूर्व की ओर मुख करके बैठ जाए और अपनी पूरी श्वांस अंदर खींचे। फिर उसे रोके। फिर छोड़ दें। जबरदस्ती बहुत देर तक न रोकें। कुछ देर रोके, फिर छोड़ दें। ऐसा 9 बार करें, फिर ध्यान  लगाने की प्रक्रिया प्रारम्भ करें।
  2. प्रथम चरण (फर्स्ट स्टेप) – श्वाँस को गहरे खींचकर छोड़ने की प्रक्रिया जारी रखें और उसके अंदर – बाहर होते समय शरीर में जो अनुभूति होती है, वहां ध्यान लगायें। इसका अर्थ यह है कि अंदर जाते श्वाँस पर ही ध्यान लगायें और वह जहाँ-जहाँ पहुच रही है , उसकी अनुभूतियों पर ध्यान केन्द्रित करें। फिर वह छूटता है, उस पर ध्यान केन्द्रित करें। आपको अपनी अनुभूति श्वाँस के साथ लेकर चलनी है। कम से कम 1 महीने यही अभ्यास करें।।
  3. द्वितीय चरण – यही क्रिया करते हुए ‘अं’ ‘हः’ मन्त्र का जप श्वांस की गति के साथ करें। खींचते समय ‘अं’ छोड़ते समय ‘हः’ ।यह ध्वनी श्वाँस की ही ध्वनि है। इस प्रकृति का प्रत्येक जीव बिना जाने ही इस ध्वनि को निकालता रहता है । चाहे वह मनुष्य हो या कुछ और। इस ‘अं’ ‘ह:’ ध्वनि के बीच श्वाँस की वायु सारे शरीर के चक्रों से गुजरती है और सबको शुद्ध करती है। तन्त्र के गुप्त ज्ञान में बताया गया है कि शरीर में 52 चक्र हैं। इनमें से 49 मुख्य है। तीन इनके मिश्रण से बने है। प्रत्येक चक्र की एक ध्वनी है, पर ‘अं’ ‘ह:’ के बीच ही सारी ध्वनियाँ आती है। इन्हीं ध्वनियों के आधार पर संस्कृत कि देवनागरी वर्णमाला में ‘अ’ से ‘ह’ तक के वर्णों को अनुसंधानित किया गया है। क्ष , त्र , ज्ञ, ये तीन मिश्रित वर्ण है।

सारे शरीर का ऊर्जाचक्र एक यूनिट की तरह काम करता है। शरीर चाहे हमारा हो या ब्रह्माण्ड का या किसी और का; वह एक ही संरचना के ऊर्जाचक्र में विकसित होता है और उसमें ये 52 ऊर्जा उत्पादन बिंदु या चक्र होते हैं। इसलिए इन वर्णों को मातृका कहा जाता है यानी मातृशक्ति देवी रूपी ऊर्जा शरीर महामाया के शरीर के बिन्दुओं से उत्पन्न होने वाली ध्वनि। भारत में देवी पिंडियों के आदि स्थान इसी पर आधरित है। कम से कम एक महीने इसका अभ्यास करना चाहिए।

इससे मानसिक शक्ति का ध्यान , अभ्यास करते समय बाहरी भौतिकता से हटकर श्वाँस पर केन्द्रित होता है। इसके साथ ही शरीर के चक्रों की सरल शुद्धि भी हो जाती है।

  1. तीसरा चरण ध्यान का केन्द्रीयकरण – ऊपर के अभ्यास के बाद मुख्य ध्यान लगाने की प्रक्रिया प्रारंभ करें। प्रतिदिन सरल आसन में बैठकर पहले 9 बार श्वाँस के साथ ‘अं’ ‘ह:’ का जप करें। फिर बाक की नोक पर देखें। नाक के ऊपर जहाँ दबाब महसूस हो , वहां ध्यान लगाये और आँखें बंद करके ‘ॐ’ थर्राहट के साथ सात स्वर में जपें। फिर ‘हं’ से श्वांस छोड़े। जिनका धर्म या मजहब आड़े आता है, वे ‘अं’ को सात स्वर में जपें। जिनको आपत्ति न हो, वे आज्ञाचक्र पर चन्दन घिसकर लगायें। इस समय आँखें बंद रखें और आज्ञाचक्र के केंद्र पर ध्यान लगायें। यह कल्पना करें कि अँधेरे में वहां जगमगाता बिंदु प्रकट हो रहा है। प्रारंभ में कठिनाई होती है, पर फिर वह बिंदु प्रकट होता है। पर स्थिर नहीं होता। लगातार आज्ञाचक्र के मध्य में उसे स्थिर करने का प्रयत्न करे पर वह वहां स्थिर होता है।
  2. चौथा चरण – इस बिंदु के मध्य उतरने का प्रयत्न कीजिये । उसके अंदर और अंदर घुसने का प्रयत्न कीजिये। वह और चमकीला होता जाएगा। यह अभ्यास जारी रखिये। यही मानसिक शक्ति का केन्द्रीयकरण है और इसकी कोई सीमा नहीं है। इससे आगे के स्टेप महयोगियों या पहुचे हुए साधक का है। यह सामान्य लोगों के लिए नहीं है। केवल इतना ही एक बहुत बड़ी सिद्धि है। इतने से ही कोई भी स्त्री-पुरुष भूत भविष्य में झाँक सकता है, कोई भी सिद्धि सामान्य परिश्रम से प्राप्त कर सकता है। उसे प्रत्येक कार्य में परमात्मा स्वयं बताता है कि वह काम कैसे सफल होगा और उसे क्या करना चाहिए । इससे वह व्यक्ति भौतिक जीवन में भी बड़ी सफलता हासिल करता है।

इस सिद्धि के होने से मन-मस्तिष्क प्रसन्न रहता है। शरीर स्वस्थ रहता है। आँखों में बड़ी सम्मोहन शक्ति आ जाती है। वह केवल कामना करके ही सब कुछ पा सकता है। वह वशीकरण की बड़ी शक्ति प्राप्त कर लेता है।

विशेष – यह केन्द्रीयकरण किसी भी सिद्धि में आवश्यक होता है। वहां अलग से इस ध्यान प्रक्रिया की चर्चा नहीं की जाती, पर हर जगह ‘ध्यान’ का ही निर्देश होता है। इस ध्यान लगाने में साधक असफल हो जाते है; क्योंकि उन्हें इसका अभ्यास नहीं होता। पहले गुरु परम्परा में इसे सर्वप्रथम सिद्ध करवाया जाता था, इसलिए सिद्धियों में इसकी अलग से चर्चा नहीं होती।

सावधानी(Caution) –

  1. इनमें से कोई भी क्रिया आधे घंटे से अधिक न करें ।
  2. जब ध्यान ज्योति बिंदु में केन्द्रित हो जाए, तो 5 मिनट से अधिक उसके अंदर उतरने का अभ्यास न करें।
  3. यदि साधना के समय भूत-प्रेत-छाया-चीख-चिल्लाहट , कोई आवाज सुनाई दे, तो उसपर ध्यान न दें, न ही भयभीत हो।
  4. ध्यान की क्रिया के बाद सामान्य जीवन में यदि आँखों के सामने छाया आदि उडती दिखाई दें ,आँखें या सर में दर्द हो , तो अभ्यास करना कुछ दिन बंद कर दें । यह समझे की कैपसिटी से ज्यादा समय तक अभ्यास हो गया है। सामान्य होने पर फिर प्रारम्भ करें, पर समय आधा कर दें।
  5. इस अभ्यास में आज्ञाचक्र पर, पैरों में या शरीर के किसी अंग में या पूरे शरीर में कम्पन होने लगे, तो समझे कि मूलाधार (नेगेटिव पॉइंट) और सहस्त्रार (पॉजिटिव पॉइंट) मिलने वाली ऊर्जा को ऐब्जार्ब नहीं कर पा रहा है। कभी इसमें से एक , कभी दोनों की शक्ति दुर्बल होती है।

उपचार (The Treatment)

  1. मस्तिष्क के ऊपर कहीं कम्पन हो, कंधा – बांह फड़के; तो मस्तिष्क लुब्रिकेसन कम है। वहां सर में ठंडा और कान में गर्म करके जैतून तेल, बादाम का तेल भी हल्का डाला जा सकता है।रात में घी डाले और प्रातः धोलें। बेल पत्र का शरबत पीये। स्नान करते समय बाथ टब में सर पैर ऊपर करके कमर पानी में डुबोकर ‘ॐ’ जपें। या नदी तालाब में कमर भर पानी में कुछ दिन अभ्यास करें।
  2. कमर से नीचे कम्पन हो , तो सर पर एलोविरा मलें, मस्तिष्क को तरावट देनेवाली चीजें पीयें।
  3. (i) बबूल के पत्ते, गूलर के कच्चे फल , बरगद के कच्चे फल (ii) ब्राह्मी , बच आदि को सुखाकर चूर्ण करके दोनों ग्रुप से कोई एक या मिला-मिलाकर 6-6 ग्राम सुबह-शाम खाना चाहिए । इससे मूलाधार सहस्त्रार मजबूत होता है।
  4. मिट्टी की मालिश करके स्नान लाभप्रद होता है। ध्यान के समय वस्त्र ढीला रखें।

विशेष – जो कर सकें , वह ही करें । जो कठिन लगे, उसका अल्टरनेटिव ‘धर्मालय’ से ईमेल पर पूछें।

ध्यान का समय और वर्जित कर्म(Time and forbidden action of meditation)

  1. ध्यान लगाने के लिए प्रातःकाल 3 से 5 और रात में 9 से 1 का समय उपयुक्त होता है। वैसे भ्यास हो जाने पर यह किसी भी समय लगाया जा सकता है।
  2. शोर-शराबा, भीड़, तेज हवा, व्याकुल करने वाली गर्मी या सर्दी , शरीरिक विकार ध्यान केन्द्रित नहीं होने देते । इसलिए इन बातों का ध्यान रखना होगा।
  3. पचने में भारी , मानसिक विकार उत्पन्न करने वाली चीजों , नशें , केमिकल युक्त पेय या भोजन ; तली हुई , छनी हुई या बासी चीजे खाना पीना मना है। आवश्यकता से थोडा कम खाए।
  4. वस्त्र कसे हुए न हों। ढीला चोंगा सबसे उत्तम है । अंदर कुछ न पहने।
  5. स्नान करते समय पहला पानी सर पर डालें और सर पर से ही पानी की धर नीचे तक जाये यह ध्यान रखें।
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