किन देवी-देवताओं में टकराव होता है

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ज्योतिष के ग्रहों में मित्रता एवं शत्रुता का एक चार्ट है . यह चार्ट धर्मालय के ज्योतिष प्रभाग पर उपलब्ध है । प्रत्येक ग्रह का एक देवता होता है । वस्तुतः यह शरीर के चक्रों से सम्बन्धित विद्या है , ज्योतिष के ग्रह जो होरा में प्रयोग किये जाते है शरीर के ही चक्र होते है । इनपर सौरमंडल के ग्रहों का परिवर्तन प्रभाव डालता है और इसी की गणना ज्योतिष की विद्या है । हमारे देवी देवता भी इन्ही चक्रों से सम्बन्धित है । ये सूक्ष्म शक्तिरूपा होते है और इनका स्वरुप ऊर्जात्मक होता है । हमारे जीवन के लिए सभी की आवश्यकता होती है . इसलिए इन्हें माता पिता कहा जाता है। परन्तु ये शक्ति है और इनका संतुलन आपस में सही रहता है तभी जीवन की स्थिति सही रहती है । जैसे लक्ष्मी और सरस्वती एक मिट्टी है और दूसरा पानी  एक धन है , दूसरा भावुकता। इन दोनों का समिश्रण सही हो , तो जीवन में फूल खिलते है । भावुकता बढ़ जाए , तो धन उसमें घुलकर बह जाएगा । मिट्टी बढ़ जाए तो वह सुखकर कठोर हो जाएगी और उसमें कोई फसल नहीं उपजेगी।

 इसी प्रकार ह्रदय केंद्र का देवता विष्णु जी है पर मूलाधार का कामदेव प्रबल हो जाए , तो विष्णु जी की शक्ति क्षीण जाती है । यदि विष्णु प्रबल हो जाए , तो काम देव की शक्ति जलने लगती है और शरीर में गर्मी उत्पन्न हो जाती है । जिससे अनेक समस्याएं पैदा होती है। मुसीबत यह है कि अन्धास्थावादी विचाराधारा इन शक्तियों को इनकी मूर्तियों के अनुरूप किसी लोक के अतिमानव मानती है और इसी अज्ञानतापूर्ण विचारधारा को प्रसारित करती है क्योंकि इन्ही से धर्म गुरुओं की रोजी रोटी चलती है। पर कोई भी प्राचीन शास्त्र इसका समर्थन नहीं करता। ये पॉवर है जैसे की बिजली। नियंत्रित रहे तो अनेक भोगों की उपलब्धी कराती है । अनियंत्रित हो जाए तो विनाश कार देती है । इनमें प्लस माइनस का सम्बन्ध होता है। कुछ देवता + क्षेत्र के हैं , कुछ देवता – क्षेत्र के। इन्ही दोनों के मिश्रण से शरीर और सृष्टि का अस्तिस्त्व है। इन दोनों में विपरीत भाव होता है और यह जब असंतुलित होते है तो अशुभ की करते है । कोई व्यक्ति काली की शक्ति को बढ़ा ले और अपने केंद्र के राजेश्वर शिव एवं मस्तिष्क के शिव पार्वती की शक्ति को बढ़ाकर उससे उसको नियंत्रित ना करे तो वह पागल भैसे पर सवार व्यक्ति की तरह कहीं भी मारा जा सकता है

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