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धर्मालय का उद्देश्य

‘धर्म’ की स्थापना के लिए उसके बौद्धिक स्वरुप का ज्ञान होना आवश्यक हैं। ‘धर्म’ का मानवहित में सदुपयोगी होना भी आवश्यक है। गुरुदेव का उदेश्य यही है। धर्म के वैज्ञानिक स्वरुप को बताना और इसका जनहित में उपयोग करने की गुप्त विधियों को बतना। प्राचीन ऋषियों एवं आचार्यों द्वारा रिसर्च किये गये करोड़ो औषधियों, दिव्य-रसायनों,दिव्य-विधियों,गुप्त क्रियाओं को सामने लाना, जिससे सभी अपनी-अपनी समस्याओं को दूर कर सकें।

हम आपको यह बताना चाहते हैं कि गुरु जी बाबा या साधु नहीं हैं। वे सामान्य व्यक्ति की तरह रहते हैं और उनकी उनके जन्म भूमि पर एक कुटी जरूर है; पर उनका कोई आश्रम या सम्प्रदाय नहीं है। न बाबाओं की तरह उनका कोई नेटवर्क है। वे चन्दन, तिलक, माला, गेरुआ वस्त्र धारक भी नहीं है। उनका कहना है कि ये सब साधनाकाल के साधन हैं। मेकअप वे करते है, जो अन्दर से दुर्बल होते है। सनातनधर्म केवल हिन्दुओं का विज्ञान नहीं है। यह मच्छर का भी विज्ञान है और हम अपनी आध्यात्मिक वेशभूषा विश्व की विभिन्न सभ्यताओं पर नहीं लाद सकते। इसकी कोई उपयोगिता भी नहीं है। विज्ञान – विज्ञान होता है, वेशभूषा नहीं।

हमारा उदेश्यसंस्थापक का परिचय