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ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति – 01

जिस प्रकार वायु मंडल के एक बिंदु पर गर्मी के कारण वायु हल्की होके ऊपर उठती है, ठीक उसी प्रकार परमात्मा तत्व में एक बिंदु पर विकोचन होता है और वह स्थान घनत्व की दृष्टि से हल्का हो जाता है। चक्रवात की ही भाँती चारो और से इस परमात्मा (मूल्तत्व)

क्या है यह मायाजाल?

प्रकृति का मायाजाल महर्षि कपिल से लेकर शंकराचार्य ने कहा है कि यह महामायावानी प्रकृति 'परमात्मा' की 'योगमाया' से उत्पन्न एक माया-मारीचिका है। यह मनुष्य को जिस रूप में दिखाई देती है, उस रूप में मच्छर को दिखाई नहीं देती। जिस रूप में यह हाथी को अनुभूत होती है, उस रूप

जीवन और मृत्यु की विचित्र पहेली

जीव इस संसार में जन्म लेता है, जन्म लेने के बाद एक आकर्षक और मनमोहक जगत को देखता है और उसे भोगने में लग जाता है। जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसकी अनुभूतियों का दायरा बढ़ता जाता है, इसके साथ ही उसकी भोग की कामना भी बढती जाती है। उसका

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