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पंचतत्व का रहस्य

यही नन्हा सा परमाणु जो एक अनुमानित गणना के अनुसार प्रकाश से 108 (81 *3 ) गुणा सूक्ष्म होता है; वह लगातार ‘0’ को खिंच – खीच कर अपना विस्तार करता हुआ , धुरी पर दो और ऊर्जा बिन्दुओं को उत्पादित करने लगता है। अब इसमें पाँच बिंदु हो जाते

तीन देवियों, त्रिशक्ति, अर्द्धनारीश्वर की उपत्ति

इस डमरू की प्रत्येक धारा में तीन मुख्या धाराओं का समिश्रण होता है। इस की धूरी पर भी एक केंद्र में एक धनध्रुव (+ पोल ) पर एवं एक ऋणध्रुव (- पोल ) पर तीन ऊर्जा बिन्दुओं की उत्पत्ति होती है। यहाँ से तीन प्रकार की

शिव के डमरू का रहस्य

इस दोनों के मिलने से नारंगी के समान एक गोल आकृति जो ऊर्जधाराओं से बना एक पॉवर-सर्किट होता है; जिसके दोनों पेदों पर ऊर्जधाराएं अन्दर जा रही होती है जो बाहर के ‘0 ’ से घर्षण करता घूमता ऊपर फवारे छोड़ता निचे जेट की तरह ऊर्जाधारा छोड़ता हुआ क्रियाशील हो

शिवलिंग का रहस्य

इस आधाशक्ति की प्रतिक्रिया में इसकी एक उल्टी प्रतिकृति इसके ऊपर इसी के समकक्ष बनती है , पर इसकी धाराओं घनत्व कम होता है। इस पर भी ‘0 ’ के घर्षण से चार्ज बनता है; जो पहली संरचना के आवेश से विपरीत प्रकृति का होता है। यही शिवलिंग है, जो

देवी – देवता का रहस्य

इस ‘0 ’ में अत्यंत सूक्ष्म बिंदु पर हुए विस्फोट से एक धाराओं से युक्त संरचना बनती है; जो अर्द्धप्याले में उठे मीनार जैसी होती है। यह तीव्र गति से घूम रही होती है। इससे इस पर 0 के घर्षण से आवेश बनने लगते है। यह योनी के आकृति में

परमात्मा का रहस्य

यह एक अभौतिक (नान फिजिकल) तेजोमय विरल निष्क्रय सूक्ष्म तत्त्व है, तो अनंत मेअनंत तक (जिसका आदि और अंत नहीं है ) व्याप्त है। यह निराकार , चेतनाविहीन , क्रियाविहीन, अदभुत तत्त्व ही सभी का सार तत्त्व है यानी मूलतत्व। इसी में सबकी संरचना बनती है। यह एक विचित्र प्रकार का

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