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धर्मालय > डिस्कवरी ऑफ़ भैरवी चक्र (Page 2)

भैरवी साधना की तांत्रिक सिद्धि

केवल इसी स्तर पर रात्रि 9 बजे से डेढ़ बजे तक पूजित भैरवी को चक्र के मध्य बैठाकर सामान्य प्रार्थना करके मदिरा-मांस-सिन्दूर-फूल-अक्षत-बेलपत्र आदि चढ़ाकर पहले उसे फिर स्वयं उसे ग्रहण करके उसे देवी रूप ध्यान करके देखते हुए प्रतिदिन इस मंत्र का 11 माला का जाप करें।(यहाँ एक बात जानना

घट पूजन

इसके पश्चात वहाँ भैरवी के सामने रखे घट का भी पूजन किया जाता है। इसमें मदिरा या मदिरा द्रव्य होता है। इसके सामने भुना मांस, भुना चना और फल होता है। तीन चषक (पात्र होते है) एक गुरु का, दूसरा साधक तीसरा साधिका का। पूजन के पश्चात सबसे पहले गुरु

भैरवी पूजन विधि

मंत्र – हंहक  लं  ह सौ हं रं वं लं रं ढ ह स ख  फ्रे ऋ  हं फटध्यान रूप – भैरवी में ज्योतिमर्य चांदनी सी उज्जवल तीन नेत्रों वाली(तीसरे नेत्र के भैरवी के आज्ञा चक्र पर कल्पित करना चाहिए), उन्नत पयोधरों से युक्त, यौवन से भरपूर, भरे अंगों वाली

त्रिपुर भैरवी रहस्य

अपनी चुनी हुई ‘भैरवी’ को  तंत्राचार्यों ने ‘दूती’ कहा है यानी मध्यम। इसे ‘भैरवी’ भैरव जी की शक्तिरूपा पत्नी के रूप में कहा जाता है, जो इसमें आवाहन करके प्रतिष्ठित की जाती है।इसमें और ‘त्रिपुर भैरवी’ में क्या अन्तर है?इसे समझना होगा। भैरव जी महाकाल के ही एक रूप है।

न्यास विधि

सबसे पहले अंग न्यास किया जाता है। न्यास की कई प्रक्रियाएं वाममार्ग एवं वैदिक मार्ग में प्रचलित रही है। षडंग न्यास , मालिनी न्यास, मातृका न्यास, षोडा न्यास आदि। पूजा में छै अंगों का न्यास सिर, मुख, ह्रदय, नाभि,कमर और पैर में किया जाता है। मातृका न्यास में शरीर के

भैरवी से पूजा हेतु अनुज्ञा प्रार्थना

चूँकि भैरवी अब देवीरूपा हैं, इसलिए उससे पूजा की अनुमति ली जाती है। प्रार्थना फूल हाथ में लेकर चरणों पर चढ़ते हाथ जोड़कर यह प्रार्थना की जाती है। यहाँ संस्कृत में  जो कुछ कहा जाता है; उसे अपनी भाषा में कहना चाहिए। वह इस प्रकार है – ‘ हे काला

भैरवी में देवी का आवाहन

यह कल्पना करते हुए कि समक्ष बैठी –भैरवी देवी का ही प्रकट रूप है। वह देवी ही है। उसको फूलों से प्रेक्षित (फेंकना)करते हुए देवी मंत्र का जाप करते हुए मानसिक स्तर पर उसमें देवी को अनुभूत करना चाहिए। इस मार्ग में सबसे पहली देवी कामकला कालिका को माना जाता

भैरवी का चक्र प्रवेश

श्रृंगार के बाद भैरवी को चक्र में प्रवेश कराकर मध्य वृत्त में बैठाया जाता है। यहाँ लाल सूती आसन के प्रयोग का विधान है।प्रवेश के समय ‘ह्रीं श्रीं ह्रीं भगवती ..... मण्डले उपविश नमः’ जिस देवी के रूप में भैरवी को ईष्ट बनाया है, खाली स्थान में उसका नाम होता

भैरवी चक्र में शरीर की शुद्धि

स्नान विधि- स्नान तलवों से मस्तक, मस्तक से तलवों ता ‘ॐ भैरवाय नमः’  मंत्र के साथ पहले मिट्टी से; फिर पानी से स्नान करके तेल (सरसों) से; फिर सिद्ध उबटन से, फिर गोबर (गाय), फिर गौमूत्र, फिर पानी से धोकर, दही से फिर दूध से, फिर पानी से करें और

भैरवी चक्र साधनाओं में मुख्य चक्र की पूजा

सबसे पहले भैरवी का अभिषेक एवं उसका पूजा किया जाता है। इसमें उसे पहले अभिमंत्रित मिट्टी से; फिर पंचामृत से एक-एक करके स्नान करवाया जाता है। किसी किसी गुरु द्वारा पहले मिट्टी, फिर उबटन और इसके बाद  पंचामृत का प्रयोग किया जाता है। इसके बाद भैरवी को देवी के रूप

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