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स्त्री-पुरुष के भैरवी चक्र में शरीर के अंगों में अमृत बिंदु और अमृत न्यास

हमारे शरीर की एक ऊर्जा –संरचना है और इसमें पृथ्वी के वातावरण के अनुसार परिवर्तन होता रहा है। हमारी ज्योतिष विद्या इसी पर आधारित है। पर तन्त्र में इस वैज्ञानिक सत्य का प्रयोग दूसरे ही रूप में होता है। विशेषकर अघोर विद्या , महाकाल विद्या, श्री विद्या और भैरवी विद्या

भैरवी चक्र की सरल साधनाएं

भैरवी चक्र की विधि से इन साधानाओं को सरलता से सिद्ध किया जा सकता है। इस मार्ग के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी हमारे वेबसाइट धर्मालय www.dharmalay.com पर उपलब्ध है। कुछ भी करने से पहले विषय का विस्तृत ज्ञान आवश्यक होता है। इसलिए इसे पूरा पढ़े और अपनी किसी भी शंका

महाकाल मार्ग में भैरवी युक्त महाकाली साधना

एक विशेष बात ध्यान में रखना चाहिए कि तन्त्र का चाहे वाममार्ग हो या दक्षिण मार्ग, योग हो या पूजा क्रम – सभी में सर्वप्रथम मूलाधार की इस महाकाली को ही सिद्ध किया जाता है, जो मूलाधार के श्याम  शिवलिंग की  शक्ति है और ये खुनी लाल रंग की अपनी

भैरवी चक्र में ‘लिंग’ और ‘योनि’ की पूजा

 भैरवी मार्ग के साधक ‘योनि’ को आद्याशक्ति मानते हैं क्योंकि सृष्टि का प्रथम बीजरूप उत्पत्ति यही है। ‘लिंग’ का अवतरण इसकी ही प्रतिक्रिया में होता है। इन दोनों के मिलने से सृष्टि का आदि परमाणु रूप उत्पन्न होता है। इन दोनों संरचनाओं के मिलने से ही इस ब्रह्माण्ड का या

साधना कैसे करें?

भैरवी को माध्यम बनाकर सभी देवी-देवता, काल्पनिक शक्तियों से लेकर भूत-प्रेत-पिशाचिनी-डाकिनी तक सिद्ध किया जाता है।महाकाल, रूद्र, काली, दुर्गा, कमला, अर्द्धनारीश्वर, श्री कृष्ण, विष्णु आदि की भी सिद्धि कि जाती है।नित्या रुपी सभी देवियों की साधना भैरवी के माध्यम से की जाती है। भैरव जी, अगिया बैताल आदि की भी।

भैरवी साधना से पहले

भैरवी की पूजा के बाद उससे सामान्य काल में ‘देवी है’ ऐसा व्यवहार करना चाहिए। उसे भी यह विश्वास दिलाना चाहिए कि उसमें देवी का वास है और वह देवी रूप हो गयी है।इसलिए प्रत्येक रात्रि साधना से पूर्व चाहे 21 मन्त्र से ही सही उसकी पूजा करनी चाहिए। प्रथम पूजा

भैरवी चक्र साधना में साधक-साधिकाओं के लिए निर्देश

   1.किसी भी नारी कि उपेक्षा या अपमान न करें।कन्याओं को देवी का रूप समझकर उनकी पूजा करें।कन्याओं-नारियों की शक्ति पर सहायता एवं रक्षा करें।पेड़ न काटे, न कटवाएं।मदिरापान या मांसाहार केवल साधना हेतु है। इसे व्यसन न बनाये।जो मस्तिष्क और विवेक को नष्ट कर दे; उस मदिरापान से भैरव

स्त्री पुरुष की असावधानी से खतरे

  स्त्री हो या पुरुष रतिकाल में दुनियादारी या घरेलू मामलों पर बातें न करें। यह ऊर्जा चक्रों को खराब करेगा। सन्तान हुई, तो वह राहु के प्रकोप से ग्रसित होगी. रतिक्रीड़ा के बाद लिंग और योनी को ठन्डे पानी से कदापि न धोएं। इसे हवा से भी बचाएं वरना

भैरवी चक्र: विधि एवं पूजा क्रिया का सत्य

यह केवल भैरवी चक्र का ही सत्य नहीं है। सभी प्रकार की सिद्धि-साधनाओं में पूजन की प्रक्रिया को जटिल से जटिलतम बनाया गया है। पर जब साधना की बात आती है, तो वातावरण, मुद्राओं, शरीर के चक्रों पर ध्यान लगाकर मंत्र जप करना ही सर्वत्र है। चाहे श्मसान में साधना

सिद्धियों ऊर्जाचक्रों का शुद्धिकरण और न्यास

आप कोई भी सिद्धि करना चाहते है, आपको गुरु के द्वारा दो प्रकार कि शुद्धि प्रक्रिया से गुजरना होगा। इन प्रयोगों को अनेक प्रकार की पूजा विधियों में विस्तृत आयर कठिन बना दिया गया है। मैं इन सबको गहरा अध्ययन करके स्वयं पर अनुभव करने की भी कोशिश की और

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