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क्या स्वर्ग नर्क होते हैं?

मौत के बाद की भी क्या ज़िन्दगी होती है? कैसी होती है मरने के बाद की दुनिया? और कहाँ जाता है इंसान मरने के बाद? क्या स्वर्ग और नर्क सच में कोई लोक हैं. क्या मरने के बाद हम स्वर्ग या चले जाते है. मरने के बाद क्या होता है? इस प्रश्न का

क्या मृत्यु के बाद एक घण्टे तक आत्मा शरीर में रहती है?

मौत के बाद क्या होता है. मृत्यु के बाद का सत्य मृत्यु के बाद एक घंटे तक आत्मा शरीर नहीं छोडती , इसमें हमारे परिक्षण का दोष है। सम्पूर्ण मृत्यु तभी होती हैं जब आत्मा शरीर छोड़ देती है। एक घंटा पहले जो स्थिति होती है लक्षणों से हम उसे मृत्यु

मृत्यु और नींद में अंतर

‘नींद’ में ‘आत्मा’ पॉवर सर्किट में बनी रहती है। वह केवल अपने एक बिंदु को सुप्त करती है , जो अनुभूत होता है। जबकि मृत्यु में दो स्थिति होती है –आत्मा शरीर को छोड़ देती है; क्योंकि पॉवर-सर्किट नष्ट हो जाता है।शरीर पॉवर सर्किट से अलग हो जाता है और

ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति – 01

जिस प्रकार वायु मंडल के एक बिंदु पर गर्मी के कारण वायु हल्की होके ऊपर उठती है, ठीक उसी प्रकार परमात्मा तत्व में एक बिंदु पर विकोचन होता है और वह स्थान घनत्व की दृष्टि से हल्का हो जाता है। चक्रवात की ही भाँती चारो और से इस परमात्मा (मूल्तत्व)

ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के शास्वत सूत्र

ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति 'परमात्मा रुपी' अनंत विस्तार में होती है। इसकी उत्पत्ति और संरचना चक्रवात-जैसी होती है। अंतर केवल इतना होता है की वायु एक भौतिक पदार्थ है, इसलिए चक्रवात में सर्किट नहीं बनता, पर परमात्मा एक तेजमय तत्वा है, इसलिए उसमे धाराओं के घूर्णन एवं एक-दुसरे के काटने से

क्या है यह मायाजाल?

प्रकृति का मायाजाल महर्षि कपिल से लेकर शंकराचार्य ने कहा है कि यह महामायावानी प्रकृति 'परमात्मा' की 'योगमाया' से उत्पन्न एक माया-मारीचिका है। यह मनुष्य को जिस रूप में दिखाई देती है, उस रूप में मच्छर को दिखाई नहीं देती। जिस रूप में यह हाथी को अनुभूत होती है, उस रूप

भोग के नशे में ही ज़िन्दगी बीतती है

बच्चा जन्म लेते ही जिस लुभावने जगत को देखता है, वह क्या है, इसको सोचने की उसे फुर्सत ही नहीं होती। वह उसी समय से कामनाओं में डूब जाता है। पहले उसकी कामना दूध और माता तक ही सीमित रहती है। फिर उसे खिलौने और खाने पीने की चीज़ें लुभाती

जीवन और मृत्यु की विचित्र पहेली

जीव इस संसार में जन्म लेता है, जन्म लेने के बाद एक आकर्षक और मनमोहक जगत को देखता है और उसे भोगने में लग जाता है। जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसकी अनुभूतियों का दायरा बढ़ता जाता है, इसके साथ ही उसकी भोग की कामना भी बढती जाती है। उसका

क्या पुनर्जन्म होता है?

क्या पुनर्जन्म होता है? इस जन्म के कर्मों से उसका क्या सम्बन्ध है? क्या कर्म ही भाग्य के रूप में फलित होते है? या भाग्य कर्म को निर्धारित करता है? ये एक साथ कई प्रश्न है। सभी प्रश्नों के उत्तर के लिए हमें जानना होगा कि ‘जीव’ क्या है? सनातन धर्म

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