आधुनिक युग में इसे निरर्थक माना जाता है। बौद्धिक युग को यह समझ में नहीं आता कि अग्नि में आहुति देने और मन्त्र पढने से रोगादि कैसे दूर हो सकते है और किस प्रकार इसके द्वारा वशीकरण आदि अभिचार कर्म की सिद्धि होती है। उनके अनुसार यह सब केवल अंधी आस्था का विषय है।

परन्तु; इसका कारण जानकारी का अभाव है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार भले ही अग्नि के तीन रूप हो; परन्तु सनातन विज्ञान में अग्नि के नौ रूप तो वर्गभेद के है और अनंत रूप गुणभेद के है। प्रत्येक अग्नि के नौ रूप होते  है। तीन हमारे प्रत्यक्ष होते है। 6 सूक्ष्म होते है। गुण के अनुसार इस अग्नि के अनंत भेद है। यह जिस पदार्थ के भक्षण से जलती है; उसी के गुण से आवेष्ठित होती है। प्लास्टिक की आग और चन्दन की आग में अन्तर होता है।

जब भी  हम हवन की प्रक्रिया को देखेंगे; तो शास्त्रीय स्तर पर प्रत्येक देवी-देवता की समिधा (अग्नि आधार) और उसकी हवन –सामग्री में अन्तर नजर आएगा। अलग-अलग मन्त्रों के भी समिधा आदि में अन्तर होता है। अलग-अलग मनोकामना के लिए भी अलग अलग समिधा और सामग्री होती है।

ये पादर्थ जलकर सूक्ष्म ऊर्जा का निवारण करते है; जो वातावरण में व्याप्त होकर अपेक्षित फल उत्पन्न करते है। 1962 ई. में उत्तर भारत में मैंने बचपन में यह नजारा देखा है।दुनिया नष्ट होंने के डर से घर घर गली-गली मन्दिर-मन्दिर हवन हो रहे थे और उस साल हर प्रकार के पेड़ों के फलों ने रेकॉर्ड तोड़ दिया था। किसान अपनी फसल समेट नहीं पा रहे थे। सब्जियां , आम, कटहल लोग मुफ्त में भी लेने के लिए तैयार नहीं थे।

पहले घर-घर महीने हवन हुआ करते थे। पर आज यह सब बैकवर्ड प्रवृत्ति समझी जाती है।

पर तन्त्र शास्त्र में हवन का विशेष महत्त्व है। इसके बिना कोई पूजा सम्पन्न नहीं होती, कोई साधना नहीं होतीं कोई अभिचार कर्म सिद्ध नहीं होता। इसलिए इसके संक्षिप्त स्वरुप को हर परिवार को जानना चाहिए; क्योंकि वैदिक पूजा और यज्ञ का भी यह आधार रहा है।

 

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