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हनुमान जी क्या सच में थे?

स्त्रियों के लिए हनुमान जी की साधना वर्जित क्यों है?

हनुमान जी हुए थे या नहीं , यह विषय पुरातत्व और इतिहास के अन्वेषकों के लिए है। यह आध्यात्मिक विषय नहीं है। आध्यात्मिक विषय यह है कि हनुमान जी के ध्यान और साधना से सूर्य शक्तिशाली होता है, जिसके केंद्र में ‘आत्मा’ (भगवान् विष्णु या राम के प्रतिरूप) रहती है। इससे समस्त शरीर में प्राण ऊर्जा का संचार बढ़ता है। क्यों? इसके लिए ‘तन्त्र रहस्य’ में ‘अभाव’ और अभाव की पूर्ती के लिए भाव की उत्पत्ति का सूत्र देखिये।इन विषयों को जानने के लिए हमारी वेबसाइट के ‘ज्ञान क्षेत्र’ और ‘तन्त्र रहस्य’ का अध्ययन करना होगा। करोड़ों देवी-देवताओं की साधना में एक ही प्रकार के सूत्रों को बार-बार समझाना कठिन है।

आप हनुमान जी के रूप का ध्यान करके उनके मंत्र या स्तुति का मानस या वाचिक जाप करें या प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में प्राणायाम करते हुए उनका ध्यान करें। दिशा पूर्व एवं पश्चिम होती है। समय दोनों संध्याकाल (सूर्योदय से पूर्व/सूर्यास्त के बाद का सन्धिकाल) होता है। वस्त्र लाल होता है और प्रसाद गुड/शहद/बेसन के लड्डू (मीठा)। इन पदार्थों का प्रभाव सीधे केंद्र पर पड़ता है। आराधना के बाद इस प्रसाद का सेवन करें। (मधुमेह वाले ‘शहद’ का)

‘तन्त्र’ का सूत्र है कि स्वयं में ऊर्जा रूप हनुमान जी को न्यस्त (समाहित) करें और स्वयं ही हनुमान बन जाएँ यानी अनुभूत करें कि रोम-रोम में केंद्र सहित समस्त ऊर्जा संरचना में व्याप्त देव ऊर्जा रूप करोड़ों सूर्य से प्रदीप हनुमान जी हीई व्याप्त है। इसी स्वरुप में इसमें सभी देवी-देवता की साधना की जाती है। पहले ह्रदय केंद्र में फिर उसे प्रकाशित विकसित करते हुए समस्त अस्तित्त्व में।

निश्चित ही सभी प्रकार की शक्तियों की प्राप्ति होती है। इनकी साधना में श्वांस रोग, ह्रदय रोग के विकार मिटते है। मनोकामनाएं पूरी होती है।

आपने पूछा है कि हनुमान जी तो ब्रह्मचारी थे । स्त्रियाँ उनकी पूजा-साधना कैसे कर सकती है? इसलिए इन्हें इनकी पूजा नहीं करना चाहिए, यही परम्परा है।

आपके इस कथन पर समझ में नहीं आता कि हंसू या रोऊँ। मुझे ज्ञात नहीं है कि ऐसी कोई परम्परागत निर्देश है। मुझे यह भी ज्ञात नहीं है कि यह है , तो कहाँ से आया, मगर आपकी बात से मुझे हँसी इसलिए आ रही है कि स्त्रियाँ क्या केवल प्रणय-भाव से ही देवताओं की पूजा करती है? शादी शुदा देवताओं की ही आराधना का क्या अर्थ है?फ़्लर्ट करना? फिर नारी का पुरुषों के प्रति एक ही भाव नहीं होता। वह पति-प्रेमी के रूप में ही उन्हें नहीं देखती। वह पुत्र भी होता है, भाई भी और पिता भी, मित्र भी होता है और गुरु भी। आप भूल रहे है कि हनुमान जी की माता भी एक स्त्री के रूप में वर्णित है। ब्रह्मचारी है ; इसलिए स्त्रियाँ साधना नहीं कर सकती। क्या अर्थ है इसका? फिर हनुमान जी सीता की चरण वंदना क्यों करते थे?

वास्तव में देवी-देवताओं का स्वरुप एक ‘भाव’ है।चाहे वह अमूर्त शक्तियों का हो या जन्म लेकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करके लोगों का कल्याण करे वाले ‘सुपर हीरो’ का। आप किसी भी ‘भाव’ में किसी भी रूप में डूबेंगे, तो आपकी ऊर्जा उसी समीकरण में नेगेटिव होगी और वातावरण से वही समीकरण पॉजिटिव रूप में प्राप्त होने लगेगा। यही सनातन सूत्र है। इस पर हम पहले भी बता आये है।

यह एक प्राकृतिक सूत्र है और स्त्रियाँ चूँकि पुरुषों के सापेक्ष नेगेटिव होती है; इसलिए उनकाभाव (अभाव) अधिक गहरा होता है और उन्हें शक्ति प्रवाह भी अधिक मिलता है। मुझे ज्ञात नहीं कि कभी सीता को किसी मन्दिर में पूजा करने से रोका गया हो। मुझे यह भी ज्ञात नहीं कि प्राचीनकाल से लेकर आधुनिक काल तक किसी राज कुमारी या रानी को मन्दिर में या किसी पूजा स्थल पर जाने की मनाही हो। हाँ, एक-दो श्लोक यत्र-तत्र मिल जाते है; पर उनका इस व्यापक समष्टि के आदर्श से कोई ताल मेल नहीं है। इसलिए वे किसी ररूढ़ व्यक्ति द्वारा उनेमिन प्रक्षिप्त किये गये है; यही मानना उचित और सत्य होगा।

तन्त्र के जो वास्तविक आचार्य या विद्वान रहे है; उन्होंने तो कहा है कि – “स्त्री-पुरुष , छूत-अछूत, अच्छे-बुरे का भेदभाव संस्कारों का रूढ़ बंधन है। क्या अच्छा क्या बुरा या निष्पक्ष ढंग से ही विचारना चाहिए, संस्कारों के प्रभाव में नहीं। हम अनके प्रकार के रूढ़ बन्धनों में जकड़े हुए है। वह साधक कितना कमजोर है, वह देवता कितना निसहाय है; जिसकी तपस्या और शक्ति नारी के स्पर्श से ही नष्ट हो जाती है। अपने संस्कारों को अज्ञानता में जकड़ा ऐसा साधक कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता। वह स्वयं को ही धोखा देता हुआ इस संसार से विद्य हो जाता है। हमारे ऋषि मुनि भी शादी करते थे। कई ने तो कई युवतियों से शादी की थी। सनातन चक्र के सभी देवी-देवता के जोडें है। तो इन भ्रष्ट लोगों और शक्तियों की आराधना क्यों करते हो भाई?

One thought on “हनुमान जी क्या सच में थे?

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    Thank you sir, for giving such sacred knowledge of mother nature and supreme zero.

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