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स्वस्तिक का रहस्य

सनातन धर्म के प्रतीक के रूप में देखे जाने वाले स्वास्तिक चिन्ह का क्या महत्व है? क्या है स्वस्तिक का रहस्य? स्वस्तिक चिन्ह में कौन सा आध्यात्मिक ज्ञान छुपा है? क्या इसे बनाने से कोई लाभ है? स्वस्तिक को इतना शुभ क्यों माना जाता है? जानिए इसके स्वस्तिक का विज्ञान और स्वास्तिक का महत्व.

पश्चिमी देशों में स्वास्तिक का अर्थ नाजीवादी विचारधारा से जोड़ कर देखा जात है. परन्तु स्वास्तिक कोई चाँद सालों पुराना चिन्ह नहीं है. स्वास्तिक का इतिहास सदियों पुराना है. यह सनातन धर्म का एक अभिन्न चिन्ह है जिसे अत्यंत ही शुभ माना गया है.स्वास्तिक को सिर्फ भारतीय सभ्यताओं में ही नहीं बल्कि विश्वा की अनेक प्राचीन सभ्यताओं में देखा गया है.

स्वस्तिक चिन्हित सिक्के
प्राचीन यूनान के कोरिन्थ में प्रचलित सिक्के

प्राचीन ग्रीक एवं रोमन सभ्यताओं में 8 वीं सदी ईसा पूर्व से ही स्वास्तिक के चिन्ह का वर्णन मिलता है. 6 शताब्दी ईसा पूर्व के कई सिक्कों पर भी स्वास्तिक का चिन्ह पाया गया है.

स्वस्तिक चिन्ह प्राचीन चीनी सभ्यता में भी पाया जाता है. यहाँ इसे श्रृष्टि की रचना का प्रतीक माना जाता है. 8 वीं सदी से यह चीनी लिपि का हिस्सा है चीन, कोरिया और विएतनाम में इस चिन्ह को ‘वन’ या ‘मन’ कहा जाता है. चीन के प्रभाव से यह शब्द जापानी लिपि का भी अंग बन गया जहा इसे ‘मांजी’ कहा जाता है.

 

स्वास्तिक का महत्व – ब्रह्माण्ड के घूमने की दिशा

स्वास्तिक-चिन्ह
बाली के गोवा लवा मंदिर के द्वार पर चिन्हित स्वास्तिक.

सनातन धर्म के अनुसार स्वस्तिक ब्रह्माण्ड के घूमने की दिशा का ब्लूप्रिंट है। इसमें बताया गया है कि यह ब्रह्माण्ड बायें से दायें घूम रहा है।

स्वस्तिक की दिशा, बांये से दांये – यह सृष्टि को बनाने वाला क्रम है। जबकि इसका उल्टा क्रम दायें से बायें संहार क्रम है। यही कारण है की उल्टा स्वास्तिक चिन्ह अशुभ माना जाता है.

हम कोई यन्त्र बनाएं, चले या स्क्रू कसें , या मशीन चलायें – उसे बाएँ से दायें की गति में रखने पर ही वह उचित काम करेगा अन्यथा टूट जायेगा या असामान्य अवरोध सा उत्पन्न हो जायेगा।

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