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स्त्री-पुरुष के भैरवी चक्र में शरीर के अंगों में अमृत बिंदु और अमृत न्यास

हमारे शरीर की एक ऊर्जा –संरचना है और इसमें पृथ्वी के वातावरण के अनुसार परिवर्तन होता रहा है। हमारी ज्योतिष विद्या इसी पर आधारित है। पर तन्त्र में इस वैज्ञानिक सत्य का प्रयोग दूसरे ही रूप में होता है। विशेषकर अघोर विद्या , महाकाल विद्या, श्री विद्या और भैरवी विद्या की साधानाओं में।

भैरवी साधनाओं में शरीर के विष एवं अमृत स्थानों का ज्ञान और उनकी चन्द्रमा की तिथि से ‘गति क्रम’ को जानना प्रत्येक साधक साधिका के लिए आवश्यक है। यदि कोई स्त्री-पुरुष का जोड़ा चाहे वह प्रेमी-प्रेमिका हो या पति-पत्नी इन अंगों इनकी गति को जानकर रात्रि में 9 बजे के बाद केवल विधिवत आपस में अंग न्यास करें ; तो उन दोनों को देवी-तत्व की प्राप्ति होती है और सुख –शांति के साथ कुछ अलौकिक शक्तियों की भी प्राप्ति होती हैं।

 

न्यास मंत्र – ॐ क्लीं क्लीं क्लीं ह्रीं श्रीं (अंग) न्यस्यते नमः

विशेष – यह भैरवी चक्र के एक गुप्त मार्ग का न्यास मंत्र है। विभिन्न मार्गों में यह बदलते रहते हैं।

 

पुरुष अंगों में अमृत – संचरण

शुक्ल पक्ष – 1. अंगुष्ठ   2. पादपृष्ठ     3. टखना   4. घुटना   5. लिंग   6.नाभि   7. हृदय   8.स्तन   9. गला   10. नाक   11. आँख   12. कान  13. भौंव   14. कनपट्टी     15. मस्तष्क (चाँद)

कृष्ण पक्ष – 1. मस्तष्क (चाँद)   2. कनपट्टी   3. भँव   4.कान   5. आँख   6. नाक     7.गला   8.स्तन     9.ह्रदय   10. नाभि   11. लिंग 12. घुटना   13. टखना   14. पादपृष्ठ   15. अंगुष्ठ

 

न्यास विधि – स्नानादि से शुद्ध होकर पाँचों उंगली के स्पर्श से दाहिने पैर के अंगूठे से मस्तष्क तक शुक्ल पक्ष में तिनं-तीन मंत्र से न्यास करें। फिर जिस तिथि में (ऊपर तालिका के अनुसार) जिस स्थान में अमृत हो; तिथि के अनुसार उस स्थान पर स्पर्श करते हुए 108 बार मंत्र जप करें। यह पुरुष की प्रकिया है। स्त्री में इसे बायें पैर के अंगूठे से प्रारंभ किया जाता है।

कृष्णपक्ष में यह न्यास इसी प्रकार मस्तक से अंगूठे तक किया जाता है। पुरुष में शुक्ल प्रति पदा से दायें अंगूठे से मस्तक तक समस्त दाया अंग फिर कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से मस्तक से बायाँ अंग अंगूठे तक। स्त्री में यह क्रम उल्टा होता है। ऊपर की ओर बायें भाग से चढ़ा और दायें भाग में उतरा जाता है।

 

न्यास के समय स्त्री दक्षिण मुखी , पुरुष उत्तर मुखी या स्त्री नैऋत्य मुखी , पुरुष ईशान मुखी होना चाहिए। वस्त्र ढीला पहने ।

एक विशेष बात यह है कि इसमें आज्ञाचक्र का जिक्र नहीं है। मेरी सलाह है कि प्रतिदिन सबसे पहले तीन मन्त्रों से इसी का न्यास करें। प्रैक्टिकल में यही होता है।

साधना कार्यों में अभिषेक, न्यास, दीक्षा , पूजन विधि गुरु के द्वारा सम्पन्न किया जाता है। पर सामान्य न्यास प्रक्रिया कोई भी स्त्री पुरुष अपना सकते है।

 

लाभ – मानसिक शक्ति, शारीरिक ऊर्जा चक्रों की शक्ति , दृष्टि ज्योति, सुनने की शक्ति , प्रेम भाव , सुख शांति की वृद्धि होती है। सम्मोहन की शक्ति जाग्रत होती है।

गुह्य न्यास – यह गुप्त न्यास प्रकिया है। केवल अभिषेकित दीक्षित साधक/साधिका के लिए ही अनुमेय है।

 

 

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