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साधना एवं सिद्धियों का वैज्ञानिक सत्य क्या है? क्या सच में देवियाँ होती है ? ये कहाँ रहती है? आपके पोस्टों में सच्चाई होती है, कृपया इसका सत्य बताईये ।

इन प्रश्नों को बार-बार समझा चुका हूँ। धर्मालय का ज्ञानक्षेत्र एवं तन्त्र रहस्य या साधना सिद्धि के गुप्त नियम में इनका पूरा ब्यौरा है और वैज्ञानिक रूप में है।

हम अपनी संस्कृति के हर पढ़े लिखे युवक-युवती स्त्री पुरुष से प्रार्थना करते हैं कि वे इसे समझें। अंधी आस्था और काल्पनिक विश्वासों से कुछ नहीं मिलेगा। यह इलेक्ट्रॉनिक युग है। आधुनिक विज्ञान से सनातन सूत्रों की व्याख्या समझें। सब समझ में आ जाएगा कि यह क्या है और होता क्या है? यह केवल ‘आस्था है’ का विषय नहीं है; हम चाहते है कि अपनी संस्कृति के विद्वान् यह कहें कि ‘आस्था है’ क्योंकि हम इसके विज्ञान को जानते है – इस विज्ञान को जानिए सारे धार्मिक-आध्यात्मिक स्वरुप का विज्ञान सामने आ जाएगा। तब जो विश्वास होगा, वह पहाड़ की तरह अडिग होगा। इसलिए कि आपने उसे जाना है। सत्य जानकार आप पाखण्डियों , की भी पहचान कर सकेंगे।

मैं जो भी बताऊंगा सत्य ही बताऊंगा। धर्मालय के ‘तन्त्र रहस्य’ में सृष्टि की उत्पत्ति के प्रारंभिक तीन चरण दिए गये है ; पहले उनको पढ़ लीजिये।

यहाँ आप देख रहे है कि सृष्टि की उत्पत्ति एक विस्फोट से उत्पन्न हुए ‘गैप’ (रिक्त स्थान) से प्रारंभ हुई है। इस विस्फोट के विवरण प्राचीन ग्रन्थों में स्पष्ट नहीं है;क्योंकि ये तत्कालीन धार्मिक स्वरुप में है। उस युग में सनातन धर्म ही विज्ञान था, जैसा है भी। इसलिए इसे परा नाद कहा गया है। इस के कारणों पर मतान्तर है। दो तरह के मत है। एक यह कि संभवतः यह परमतत्व की प्रवृत्ति है यानी स्वाभाविक क्रिया। दूसरा कहता है कि उसे निष्क्रिय कहा गया है ; इसलिए यदि उसमें क्रिया होती है, तो अपनी इच्छा से ही होती होगी; क्योंकि दूसरा तो कोई होता ही नहीं कि उसे विवश करें। एक तीसरा मत मेरा है । एक विरल तत्व में अन्तर धाराओं का बनना स्वाभाविक है, जबकि वह सर्व चैतन्य भी हो। इनके घर्षण से बनने वाले आवेशों के +, – मिलन होने से यह विस्फोट होता है। इसे सत्यासत्य का निर्धारण प्रकृति से ही क्रिया जा सकता है। जो वहां हुआ है , वही प्रकृति में होगा और प्रकृति में ऐसा ही होता है।

अब यहाँ एक नियम आ जाता है। सृष्टि में जहाँ भी किसी इकाई कि उत्पत्ति होगी, प्रक्रिया यही होगी। +,- अंतर धाराओं का मिलन, विस्फोट , गैप और उस गैप को भरने के लिए दौड़ने वाली धाराओं से बनने वाला एक त्रिशंकु मीनार का भंवर, जिसके पेंदे पर एक अर्ध कटोरी , बीच में छेद होगा। यह नेगेटिव इकाई है । इस पर जो चार्ज होता है, उसके विपरीत उल्टे शंकु का बनना और विपरीत आवेश से चार्ज होना; यह नियम भी सामने लाता है कि नेगेटिव जहाँ उत्पन्न होगा, पॉजिटिव अपने आप उसके बाहर उत्पन्न होकर उसमें समाहित होगा। उससे जो इकाई बनेगी, वह भी नेगेटिव होगी, क्योंकि यह ब्रह्माण्ड ही नेगेटिव है। पॉजिटिव केवल वह परमतत्व है; यह उसी के कारण अस्तित्त्व में है। वह अपनी शक्ति देना बंद कर दें, यह भंवर नष्ट हो जाएगा।

यही सूत्र ब्रह्माण्ड की इकाइयों का हैं। हमें परमात्मा रुपी पॉजिटिव नहीं मिले, तो हम भी बिखर जायेंगे। उसी से शरीर बनता है और वही हमारा ईंधन भी है। मूल रूप घर चीज में उसी का है। उसमें कोई परिवर्त्तन नहीं है । कोई भी चीज धाराओं के समीकरणों से बनी हुई है। धारा किसकी, उसी की। वहां कोई नया तत्व नहीं बन रहा।

‘परमतत्व’ हमारे शीर्ष के चाँद से एक अद्योगामी शंक्वाकार ऊर्जा- संरचना के मध्य में सिमटकर गिरता है। यह सदाशिव (पत्मात्मा/पर ब्रह्म/ 0 /मूलतत्व ) की गंगा है; जो वातावरण से प्रकट होती है। यह ऊर्जा स्वतंत्र रूप से ब्रह्माण्ड में कहीं पायी नहीं जाती। यह प्रत्येक इकाई के समीकरण की प्रतिक्रिया में बनती है। यही हमारा जीवन है, हमारा मूल अमृत; जिसके कारण हमारा शरीर सड़ता नहीं और हमारी प्रत्येक क्रिया चलती है। इसकी कमी होने पर शरीर पर झुर्रियां पड़ती है या पकता है, रुकने पर अस्तित्त्व नाश। तन्त्र में यह गंगा ही वास्तविक गंगा है, नदी गंगा इसका स्थूल प्रतिरूप। तन्त्र साधक इसी गंगा के स्नान को महत्त्व देता है। इसी धारा को मूलाधार के शिवलिंग (चक्र) पर गिराने की क्रिया योग-समाधियों में भी की जाती है।

लेकिन हमारी ऊर्जा हमारे शरीर के चारों ओर भी निकलती है और यदि हम नेगेटिव है, तो उसके चारों ओर भी उसी समीकरणों में पॉजिटिव बनकर हमें प्राप्त हो रही है।

तन्त्र में जो सूत्र प्रयोग किया जाता है उसके केवल विधि-विधान का वर्णन है; पर इन पर कुछ साधनाएं करने के बाद विश्लेषण करने पर यह निष्कर्ष सामने आया है कि अपना ऊर्जा समीकरण बदलों, उसे तीव्र और शक्तिशाली बनाओं, तो वैसा ही पॉजिटिव तुम्हे प्राप्त होने लगेगा।

अब प्रश्न उठता है कि कैसे बदलें?

उत्तर है ‘भाव’ से। यह पूरे शरीर का स्टीयरिंग व्हील है। इसे घुमाईये यानी भाव परिवर्तित कीजिये।

अब प्रश्न है कि इसे तीव्र और शक्तिशाली कैसे करें? तन्त्र में सिद्धियों के क्रम में कहा गया है –“बार-बार भजों।” यानी अभ्यास करों। अभ्यास से ही भाव परिवर्तित होता है , गहन होता है और तीव्र भी होता है। सिद्धि भौतिक हो, आध्यात्मिक हो, तांत्रिक हो या टारगेट शूट करने की हो, इसी सूत्र पर मिलती है।

जो मूर्ख यह समझता है कि पढाई का मतलब , लैंप कैसा हो, टेबल कैसा हो, कमरे का टेम्परेचर कितना हो, किताब कैसे कवर करके संभाल कर सजाया जाए आदि को कहते है ; तो उस मुर्ख को कभी विद्या हासिल नहीं होती। चाहे वह 12 घंटा पढ़े या 18 घंटा; उसे कुछ हासिल नहीं होगा। सिद्धि कार्यों में भी यही है। भाई मेरे। यह विधि –विधान कोई टेक्निकल वर्क नहीं है।ये सिद्धियाँ मानसिक शक्तियों से ही प्राप्त की जा सकती है। विधि विधान तो अप हजार तरह के अपना सकते है । ऐसा है भी। एक भी सकती की साधना के सैकड़ों विधान है और इनमें से आधे एक –दूसरे के विरोधी है। मन्त्र भी अलग है। इनका भी विज्ञान है कि ये कैसे निर्मित होते है । प्राचीन श्लोकों में ये वैज्ञानिक कोड में ही है।

अब इस इलेक्ट्रॉनिक युग में तो सोंच बदलिए।

इस विधि से अलौकिक शक्तियों की प्राप्ति की कोई सीमा नहीं है। परमात्मा के सार की कोई कमी नहीं है। आप डिमांड तो उत्पन्न कीजिये। गैप है ही नहीं और आप आपूर्ति चाहते है। आपकी वास्तविक इच्छा भावना कुछ और है, पर आप कह रहे है कि सिद्धि चाहते है । शिव कि कृपा कैसे प्राप्त करें?

मैं मन ही मन सोचता हूँ कि मनुष्य की इस प्रवृति को हमारे पूर्वज पहले भी जानते थे। इसीलिए कहा था –

कस्तूरी मृग में बसे, मृग ढूंढें जग माही

आप बच्चे है , युवा है , स्त्री है , पुरुष है, वीतरागी सन्यासी है , पर लोक सुधारने की कामना में लगे वृद्ध है – चाहे आप विद्यार्थी है या बिजनेसमैन – अपनी कामना का गैप गहरा कीजिये। व्याकुल हो जाईये उद्देश्य की प्राप्ति के लिए। सारी प्राकृतिक शक्तियां आपकी मदद करेंगी। यह परमात्मा के नियम से बंधी है। जहाँ जैसा गैप होगा , वैसा पॉजिटिव उसे प्राप्त होगा ही होगा। सारी ज्योतिष और पूजापाठ, मन्दिर आदि की विद्या इसी सूत्र पर है। तन्त्र के तमाम प्रयोग, शक्तियों , विधियों में यही विज्ञान है।

जो प्रकट होता है वह हमारे ही समीकरण के भाव का प्रतिरूप है। यह प्रकाशित कणों में अनुभूत होता है। पर इसे केवल साधक अनुभूत करता है । वहां अन्य लोगों को यह तो लगेगा कि वातावरण में कुछ परिवर्तन है, पर वह उन्हें अनुभूत नहीं होगा, क्योंकि उनमें उस समीकरण का गैप नहीं है। यानी वे उसके रिसीवर नहीं है। यद्यपि यह प्रकट रूप ऊर्जा रूप होता है; पर इसमें हमारी शक्ति से हजार गुणा अधिक, बल्कि अभ्यास से असीमित है। यहाँ तक तो 1% साधाक-साधिका भी नहीं पहुँच पाते। कुछ अलौकिक शक्तियां प्राप्त हुई, तो वे उसी के प्रयोग में लग जाते है। यह प्रकृति महामायाविनी जादूगरनी है। जो अपने गैप को नहीं भूलता, वही सफल होता है, दूसरा नहीं

समस्त कामनाओं की सफलता का सूत्र यही है। शेष सभी बातें गौण है। प्रो. राममूर्ति जैसे डेढ़ पसली के व्यक्ति जब सीने पर हाथियाँ पास करवाने लगते है , जब एक बच्चा सूखी रोटी खाकर, हजारों बार असफल होकर भी अपने गैप को बनाये रखता है , तो दुनिया को प्रकाशित करने वाला बन जाता है। एक साइकिल मिस्त्री कई जहाज़ों की दुनिया बना देता है, एक कबाड़ लेकर मोटर साइकिल बनाने वाला, दुनिया भर में मोटर साइकिल की विश्वस्त कंपनी खड़ा कर देता है। टाटा ग्रुप के पूर्वजों की कहानी देखिये, बिरला ग्रुप के पूर्वजों की कहानी देखिये, अभी अम्बानी ग्रुप की तो दूसरी पीढ़ी है। यह भी साधना ही है। अपने ‘गैप’ की साधना। आध्यात्मिक – तांत्रिक क्षेत्र में कोई दूसरे नियम नहीं है।

आध्यात्मिक सिद्धियों और भौतिक सफलता के नियम अलग-अलग नहीं है। परमात्मा के नियम सभी जगह समान होते है। अब यह आपकी इच्छा है कि आप सड़े हुए मांस की कामना का ‘गैप’ उत्पन्न करते है या फूलों के रस की कामना के गैप को उत्पन्न करते है। परमात्मा निर्लिप्त है। वह नियमों के अनुसार आपकी कामना पूर्ण करेगा। उसकी नजर में अच्छा-बुरा कुछ नहीं है। आप जहर ही जाहियेगा, तो समस्त क्रिया प्रकिया उधर शुरू हो जायेगी। खाकर मरियेगा , तो भी परमात्मा के नियमों को न पालने पर मरियेगा। नियमानुसार आपको मस्तिष्क से पूछना था , पर न पूछा। उसने मना किया, आप न माने। तो कौन जिम्मेदार हुआ।

अब अंतिम प्रश्न का उत्तर । हम क्यों नहीं मानते? क्यों काट देते है , मस्तिष्क की चेतावनी?

केवल लालच, मोह, काम, क्रोध और अहंकार के कारण । इनकी पालना में हमें एक सुख मिलता है, इन्द्रिय सुख-शरीर का सुख , मन भी इन्द्रिय में ही गिना जाता है।

ये ही अनर्थ करवाते है। इनको विवेक के दायरे में रखना चाहिए; पर हम ऐसा नहीं करते और मुसीबत में पड़ते है। विवेक यानी मानसिक शक्ति और मस्तिष्क का निर्देश। ज्योतिष में इसे बृहस्पति कहा गया है। परम्परागत प्राप्त ज्ञान। यह हवा है । यह गंदी हो गयी है, तो साफ कर लीजिये; मगर इस ज्ञान का उपयोग न करने वाला मुर्ख इस संसार में बुरी तरह बर्बाद होता है और नर्क भोगता है। जूतों के नीचे आसमान रौंदते गये, न बाप को छोड़ा, न मन्दिर को , न खानदान को माना,न कुल परम्परा या पुरोहित को। इन सबकी खिल्ली उड़ाई । पर वह अज्ञानी यह भूल गया कि बिना जड़ों की डालें हरी नहीं रहती। नई जड़ निकालनेवाली डालें भी कुछ प्रतिशत ही निकलती है। प्राण शक्ति सूखने और उत्पन्न होने में बहुत समय लगता है। इसलिए ऐसे लोग गिरते है। उड़िए। खूब उड़िए; पर मस्तिष्क में व्याप्त ज्ञान का उपयोग कीजिये। बहुत कम मामलों में वह गलत कैलकुलेशन करता है। वह भी तब जब उसके पास जानकारियाँ गलत हो।

 

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