सफलता के सनातन नियम

सिद्धि प्राप्ति के उपाय
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नए नए गुरु पैदा हो रहे हैं. सफलता के नए नए गुर बता रहे हैं पर सनातन सूत्र में कोई उलझाव नहीं है. इसके तीन ही प्रमुख सूत्र हैं प्रबल कामना. यह केवल इच्छा नहीं है. इच्छा जब व्याकुलता बन जाती है, तभी प्रकृति फल देती है. जब एक शराबी को शराब चाहिये होता है, एक प्यासे को पानी की जरूरत होती है, जब एक भूखी शेरनी अपने बच्चों के लिए शिकार करती है, तो वह जिस व्याकुलता से कामना पूर्ति करती है; वह व्याकुलता प्रमुख तत्व है. अपनी कामना को जब आप अपनी सबसे प्रिय और आवश्यक जरूरत बना लेंगे तो सारे रास्ते स्वयं खुलते चले जायेंगे. यह पहली शर्त है, जो सफलता दिलाती है. केवल इच्छा का कोई महत्व नहीं होता. यह लालच लालसा से उत्पन्न होती है और इसमें आवश्यकता की पूरी तड़प नहीं होती.

दूसरी शर्त जिद्द या धैर्य है. असफलताएं सफलता के मार्ग कीं आवश्यक घटनाएँ हैं. कोई भी काम पहली ही बार में ओके नहीं होता. याद कीजिये साईकिल सिखते समय कितनी बार गिरे थे? चलना सिखने के समय कितनी बार गिरे थे? इसे आध्यात्मिक शब्दों में संकल्प कहा जाता है. यदि आप गेम छोड़ कर उठ जाते हैं, तो इसका मतलब है की आपको उस जीत की जरूरत नहीं है. यानी आपकी व्याकुलता समाप्त हो गयी. फिर कैसी सफलता ?

तीसरी शर्त असफलता को नष्ट करने के लिए है. बार बार भजो. यानी अभ्यास. किसी कम को बार बार करने से उसकी त्रुटियाँ दूर होती हैं. आप देखेंगे की आधुनिक प्रतियोगिताओं में भी  गाइड आदि का काम यही होता है.

मुख्य ये तीन ही हैं. ये तीन हैं तो गुरु, धन, अन्य सभी साधन अपने आप प्राप्त होने लगते हैं. साधन विहीन भी बड़े बड़े कामों में सफल होते देखे गए हैं. हाँ कठिनाइयाँ होती हैं; पर बड़ी मंजिलो में सरलता नहीं होती. कुछ अन्य बातें भी जरूरी हैं; पर वह कामना की ईमानदारी से सम्बन्धित हैं.

कामना धन कमाने की है और सरकारी नौकरी के लिए प्रयत्न कर रहे हैं तो यह अपनी कामना से ही धोका है. छाया पर फायरिंग करने से टारगेट शूट नहीं होता. यह आज की आम कमजोरी है. कामना सुन्दरता और जवानी देख कर किसी को प्राप्त करने की है या कोई अन्य लालच है और नाम प्यार का है. इच्छा तो सिद्ध बन कर चरण पूजा और भौतिक प्राप्ति की है, नाम धर्म और भलाई का है. हमारे यहाँ प्रति दिन २५ व्यक्ति संपर्क करते हैं की वे कर्न्पिशाचिनी, अप्सरा, भूतनी, यक्षनी की साधना करना चाहते हैं, जिससे धर्म और जन सेवा कर सकें. इनकी साधना से कौन सी धर्म सेवा और जन सेवा हो सकती हैं यह समझना मेरे लिए भी मुश्किल है. क्योंकि मैं जनता हूँ की ये देवियाँ क्या हैं और क्यों लोग सनातन देवी देवताओं को त्याग कर इन्हें सिद्ध करना चाहते हैं. गुरु से छल. असली मनसा छुपा जाना.

अब ऐसे को तो शुक्राचार्य भी सफलता नहीं दिला सकते यह सभी भौतिक – आध्यात्मिक छेत्र में लागु हैं प्रकृति में अलग अलग नियम नहीं हैं. जिन नियमों से मच्छर खून पीता है, उन्ही नियमों से यहाँ कोई भी किसी भी कम में सफलता प्राप्त करता है.

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