सन्यास और साधना का रहस्य

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इस पर हम पहले भी बहुत कुछ कह आये हैं, धर्मालय पढ़िए , सन्यास लेने देने की चीज नहीं है। परिस्थितियों  से निराशा एवं जिन्दगी से उदासीनता का भाव सन्यास नहीं है। कोई घर छोड़ दें , तो उससे उसकी मानसिक दुनिया नष्ट नहीं होती, दुर्गा सप्तशती में इसकी कहानी हैं । गीता में भी यही कहा गया हैं कर्म छोड़कर भी भागने वाला अपयश का भागीदार होता हैं, मरने पर भी उसे शांति नहीं मिलती। सन्यास का अर्थ भौतिक लिप्सा से विरक्ति हैं, कर्म से विरक्ति नहीं।जहा तक किसी ध्यान या साधना से सम्बन्धित बात हैं वह सामान्यतया आधे से एक घंटे का काम है और इस समय आधुनिक यंत्रों का प्रयोग करने से तत्काल की जितनी भी मानसिक दुनिया होती है वह ध्यान या साधना के समय छुट जाता है और लक्ष्य की प्राप्ति हो जाती हैं।

 

हमारी समस्या यह है कि हम किसी भी क्षेत्र का प्रैक्टिकल सार्वजनिक तो कर सकते है , जो हम धीरे धीरे कर रहे हैं। पर व्यक्तिगत रूप से किसी भी व्यक्ति को दिशा निर्देश देना या देते रहना संभव नहीं है। हमारा धर्मालय ट्रस्ट नहीं है हमें सारे खर्चे ज्योतिष के कार्य और पुस्तकों के रोयालिटी से चलाने होते हैं;जिसमें आश्रम, परिवार, ऑफिस , तमाम इलेक्ट्रॉनिक ताम झाम सभी है। जिसमें मोटा खर्चा होता है। मुझे काम करना पड़ता है और मेरे पास समय का भारी अभाव होता है।

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