सनातन धर्म की सत्यानाशी व्याख्याएं

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अभी अभी में एक न्यूज चैनल देख रहा था। उसके रिपोर्टर का दावा था कि उसने उस नाग को ढूंढ लिकाला है , जिसके सर पर पृथ्वी होने की बात कही गयी है। ऐसी ही व्याख्याओं के कारण सनातन धर्म और उसेक विज्ञान की तो किरकिरी हो ही रही है; दुनिया के बुद्धिजीवियों के बीच हम उपाहस के कारण बने हुए है।

जिस शेषनाग के शीर्ष पर पृथ्वी अर्थात अस्तित्त्व (किसी भी चीज का) टिका है, वह एक ऊर्जा- संरचना है। एक ऊर्जा से प्रवाहित सर्किट। यह हमारे शरीर में शीर्ष के मस्तिष्क की कोशिकाओं, उससे जुडी रीढ़ की हड्डियाँ, नीचे कमर की हड्डी और लम्बी हजार शाखाओं वाली पूंछ के रूप में है। यह वह शेषनाग है, जो प्रत्येक इकाई में पाई जाती है। पेड़ों में यह स्पष्ट दिखाई देता है। अनगिनित फणों (पत्तों) से फुफकार छोड़ता अनेक कमर शाखाएं और लम्बी पूछ में हजारों शाखा पूछों से युक्त एक संरचना। पृथ्वी आदि ग्रहों में ये छतरी की तरह +,- पोल पर छा जाते है।

शेषनाग के इसी फणों को सहस्त्रार चक्र की जटाएं कही गयी है। पृथ्वी का अस्तित्त्व इसी पर टिका है का अर्थ है कि किसी इकाई के भौतिक अस्तित्त्व का कारक यह है। यह न हो, तो कोई अस्तित्त्व बना ही नहीं रह सकता। हमारे सर्किट पर पृथ्वी की ऊर्जा के गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव पड़ रहा है, जिससे शेषनाग के ये फण दोनों और से सिमटकर नीचे की ओर एक बिंदु पर मिलते है और सभी की फुफकार यहाँ केन्द्रियभूत हो जाते है। यही से हमारे नाक की उत्पत्ति होती है। हमारा अस्तित्त्व इसी नाक और कोशिकाओं पर टिका है। यह तो प्रमाणित है ।

अब मुसीबत यह है की हम उस नाग को ढूंढ रहे है, जिसने पृथ्वी ननामक ग्रह को अपने सिर पर उठा रखा है, जैसा की कैलेंडर चित्रों में दिखाया जाता है। अब यह तो कहीं मिलेगा नहीं , जो सुनेगा हंसेगा और हम तब विचार नहीं करेंगे; जो इसको नहीं मानेगा; उसको नास्तिक कहकर उसका सिर तोड़ देंगे। उसे सनातन धर्म विरोधी करार देंगे।……. कैसी अंधी आस्था है यह? अब इस चैनल वालों न तो इस नाग को ढूंढ भी लिया है। हमारे यहाँ ऐसे ही ‘वीर’ पैदा होते है, कोई स्वर्ग की सीढ़ी ढूढ़ लेता है, तो कोई पाताल का मार्ग ।

 

देखि देखि रचना विचित्र मन ही मन रहिये।

कहे अलख कविराय सत्य कबहूँ ना कहिये।

सत्य कहे तो होत है, जग में बहुत हसाय।

कुत्ता भौंके सडक पर , खिखिवर(लोमड़ी) भी खिखियाये ।

 

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