सनातन धर्म की वैज्ञानिकता को जानिए (डिस्कवरी रिसर्च राईट रिज़र्व)

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परमात्मा – यह के सूक्ष्म, तेजोमय, विरल अभौतिक तत्व है। इसके अपने कुछ स्वाभाविक गुण है, पर इसमें कोई भौतिक गुण नहीं है। इसलिए इसे निर्गुण कहा जाता है। सनातनधर्म से सम्बन्धित ग्रंथों में इसका विस्तार अनंत कहा गया है। स्थान का अस्तित्त्व इसके कारण है और स्थान अनंत तक है। यद्यपि यह कोई भौतिक तत्व (फिजिकल एलिमेंट) नहीं है; फिर भी यह एक अस्तित्त्व है। इसलिए इसे ‘शून्य’ तत्व (क्योंकि केवल इसका खंडन नहीं होता) , अक्षर तत्व , अविनाशी तत्व, परमात्मा (परमसार) पर ब्रह्म (ब्रह्माण्ड के भौतिक रूप से परे); सदाशिव आदि कहा गया है। इन ग्रंथों के अनुसार इस तत्व की उत्पत्ति नहीं होती, यह शाश्वत है और यह नष्ट भी नहीं होता।

विज्ञान के शब्दों में इसे मूलतत्व या प्रकृति का मूलसार कहा जा सकता है। यह एक अद्भुत तत्व है और प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में प्रत्येक ऋषि, तंत्राचार्य , आचार्यों ने सबसे अधिक इसी ‘तत्व’ की महिमा गाई है। इन्होंने कहा है कि यह तत्व अद्भुत है। यह प्रकृति इसी के कारण, इसी में, इसी से उत्पन्न होती है। वास्तव में ब्रह्माण्ड एक चक्रवात जैसी संरचना है; जो एक पॉवर सर्किट के रूप में इसी की धाराओं से अस्तित्त्व में आता है। ब्रह्माण्ड एक अजूबा है। यह एक पराविस्फोट (ब्रह्माण्ड से परे यानी अस्तित्त्व से पूर्व के विस्फोट) से एक परमाणु के रूप में अस्तित्त्व में आता है, जिसमें इसी ‘तत्व’ की धाराएं एक जटिल संरचना में नाच रही होती हैं और यह परमाणु इसी मूलतत्व को खींच-खींचकर अपनी ही जैसी प्रतिकृतियों (संरचनात्मक समानता) को उत्पन्नकरता हुआ अपना विस्तार करता जा रहा है। इसमें नया कोई ‘तत्व’ नहीं बन रहा; सर्किट ही सर्किट को अनुभूत कर रहा है।

हमारे रिसर्च और परीक्षणों एवं साधनात्मक प्रयोगों से ज्ञात हुआ है कि इस पहले परमाणु की उत्पत्ति परा विस्फोट के बाद निश्चित नियमों एवं क्रियाओं द्वारा होती है। भौतिक की ओर पहले एक , फिर दो, फिर तीन, फिर चार-पांच , फिर छै-सात –आठ-नौ प्रकार के ऊर्जा – उत्पादन बिंदु उत्पन्न होते है ( इसकी धूरी पर) और इसी से इसके सम्पूर्ण बॉडी की संरचना बनती है ( यह बहुत जटिल संरचना है)। इन नौ उत्पादन बिन्दुओं से नौ प्रकार की मुख्य आधार ऊर्जा का उत्पादन होता है और इनके ही समीकरण से शाश्वत नियमों एवं क्रियाओं द्वारा इसकी अन्य संरचनाएं उत्पन्न होती हैं।

जिस प्रकार ‘0’ से ‘9’ तक के अंकों से अंकों से अनन्त सांख्यकी की उत्पत्ति होती है; उसी प्रकार ‘0’ से ‘9’ इन आधार ऊर्जा के समीकरणों से ब्रह्माण्ड की अनन्त इकाइयों की उत्पत्ति हो रही है।

धर्म (नियम) का राज (शासन) – यह बात प्राचीन ऋषियों ने कही है है और मैंने इस पर काफी परिक्षण किया है कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति से लेकर विकास तक की सारी क्रिया नियम बद्ध और निश्चित स्वरुप में हो रही है। ये नियम एवं क्रियाएं , जो ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति , क्रिया और संहार (विनाश) से सम्बन्धित है; वे इसकी प्रत्येक इकाई पर लागू हैं। सभी इकाइयों की आंतरिक ऊर्जा संरचना एवं क्रियाएं एक ही हैं।

इनमें कहीं कोई अन्तर नहीं है। संभवतः इसीलिए ‘यथा ब्रह्माण्ड यथा पिण्डः’ जैसे वाक्य संस्कृत ग्रंथों में पाए जाते हैं।

प्राचीन ऋषियों ने कहा है कि ये नियम शाश्वत हैं (सनातन हैं) ये सभी पर लागू हैं। इस ब्रह्माण्ड पर भी; क्योंकि इनकी उत्पत्ति मूलतत्व से एक-एक करके होती है। ये ब्रह्माण्ड के नियम नहीं हैं। ब्रह्माण्ड इनसे नियंत्रित होता है। यह हजार बार बने बिगड़े, नियम ये ही रहेंगे।

सनातन धर्म , सनातन विज्ञान – मैंने बहुत साधनाएं की और पर उनके द्वारा प्राप्त सभी जानकारियों को मैंने भौतिक वैज्ञानिक स्तर पर परिक्षण किया। अपवाद कहीं नहीं है। सत्य में ही ये नियम सभी पर लागू हैं और उत्पत्ति , क्रिया और संहार के नियम और क्रियाएं भी एक ही हैं। विभिन्नता का भ्रम इसलिए होता है कि हम इस दृष्टिकोण से किसी इकाई का परीक्षण करते ही नहीं है।

इसकी आंतरिक क्रियाओं एवं नियमों का विज्ञान तो प्राचीन ग्रंथों में कहीं स्पष्ट नहीं है; पर यह विवरण जरूर मिलता है कि इस धर्म (नियमों) की उत्पत्ति परमात्मा से होती है और इनसे परे कोई नहीं है। सभी नियमों में बंधे हैं और सदा रहेंगे। यह सनातन विज्ञान के नियम है; सदा से हैं , सदा रहेंगे। नए ब्रह्माण्ड में भी और नये-नये अनंत ब्रह्माण्ड में भी।

विशेष – मैंने इसकी सम्पूर्ण डिस्कवरी वैज्ञानिक स्वरुप में की है और भारत सरकार की वन्दना में हूँ कि कब वह फ़रियाद सुने और इसके डिटेल्स को अपने संरक्षण में ले। यह सार्वजनिक करने योग्य नहीं है। इसका संरक्षण सरकार ही कर सकती है।

इस ब्रह्माण्ड में कोई दूसरा विज्ञान है ही नहीं

आश्चर्य यह है कि उस प्राचीन युग में , जिसे हम सपेरों – चरवाहों और बंदरों का युग मानते हैं; भारत के तमाम ऋषि मुनि, तमाम तन्त्रचार्यों, सभी ज्ञान-विज्ञान के अन्वेषकों और सभी सम्प्रदाय के आचार्यों ने जो प्रैक्टिकल और जीवन-दर्शन के विषय पर एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं; सनातन धर्म के इस महाविज्ञान के सम्बन्ध में एक स्वर में कहा है – ‘यही सत्य है। इस ब्रह्माण्ड में कोई दूसरा सत्य या विज्ञान नहीं है।”

और एक बार मैं फिर इसी सनातन कथन को दुहराता हूँ – “ब्रह्माण्ड में कहीं कोई भी विकसित प्राणी उत्पन्न होगा, तो वह इसी विज्ञान को जानेगा, क्योंकि इसमें कोई दूसरा विज्ञान है ही नहीं। एक यही विज्ञान है, जो ‘A to Z’ इसकी उत्पत्ति से विकास और इसके विनाश की पूरी प्रक्रिया बताता है और हमें ऐसे शाश्वत नियमों से परिचित कराता है, जो इसकी समस्त इकाइयों की उत्पत्ति, क्रिया, विकास और विनाश के नियमों को बताता है; जिन पर इस ब्रह्माण्ड के प्रत्येक रहस्य को जाना जा सकता है और सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है। यह इतना आश्चर्यजनक है कि हमारी जितनी भी मशीने बन रही है, जो आविष्कार आज दुनिया को चकचौंध किये हुए है, जो आधुनिक विज्ञान के सार नियम और सूत्र है; सभी इसके ही नियमों एवं सूत्रों पर आधारित हैं।”

इस विज्ञान का A to Z आन्तरिक विवरण कहीं प्राप्त नहीं है। मैंने संस्कृत के दुर्लभ ग्रंथों को टटोला है और उन्हें समझने की कोशिश की है; परन्तु वहाँ यत्र-तत्र टुकड़े में केवल इसकी महिमा गाई गयी है। कुछ सत्य रूपकों में कहा गया है, पर वह भी आज धर्म की फैंटम आस्थाओं में डूबा हुआ है। और वह इतना जड़ हो गया है कि लोग बुद्धि-विवेक को ताक पर रखकर उसे अजीबोगरीब रूप में मान रहे है। संभवतः यह इसकी गोपनीयता के कारण है। लेकिन इससे इस सनातन विज्ञान पर ऐसी धूल जम गयी है, जिसका प्रकाश मानव-संसार तक नहीं पहुँच पा रहा। इसके साधनात्मक प्रैक्टिकल भी उपलब्ध नहीं है।इसके स्थान पर पूजा-पाठ आदि हैं और भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों ने नाम-विधि आदि की अपनी व्याख्या कर रखी है , जिससे ये भी भ्रम में उलझा गयी हैं।

ब्रह्माण्ड और इसमें पृथ्वी जैसे ग्रहों पर जीव-जंतु –वनस्पति की उत्पत्ति को जीव माननेवाली नासा जैसे आधुनिक वैज्ञानिक संस्थाएं और वैज्ञानिक भी भारी भ्रम में पड़े हुए हैं। उनके भ्रम से उनके परिक्षण-अन्वेषण का दृष्टिकोण ही विचलित हो गया है और वे एक-एक कर कई मुद्दों पर भटक रहे हैं।

उदाहरण के लिए जीव, जीवन, चेतना ला विषय लेते हैं। सनातन विज्ञान के नियमों के अनुसार (डिस्कवर्ड फैक्ट्स) यह कोई अपवादात्मक उत्पत्ति नहीं है। यह एक पॉवर-सर्किट है; जिसमें चेतना-संवेदना-प्रतिक्रिया-अनुभूति के गुण उत्पन्न होते है। किसी में कम किसी में अधिक। इसकी उत्पत्ति का कारण – पानी, ऑक्सीजन-कार्बन नहीं है। यह न्यूक्लियर फ्यूज़न से उत्पन्न होता है। ब्रह्माण्ड में इसकी जटिल प्रक्रिया चल रही है। और अनंत लेयर पर चल रही है। कोई दूसरा पॉवर-पॉइंट बन ही नहीं रहा। स्थानीय ऊर्जा धाराओं के समीकरण एवं इकाइयों के प्रयोग से आकृति और गुणों में अंतर आ रहा है। इसलिए सभी जीव हैं और अपने उत्पत्ति स्थल के वातावरण से आवश्यकताओं की पूर्ती करते हैं। जो इनकी विभिन्नताओं में सत्य की तलाश करते हैं; उन्हें सनातन धर्म के एक सबसे बड़े वैज्ञानिक कथन को ध्यान रखना चाहिए – ‘प्रकृति में अपवादात्मक संरचनाएं उत्पन्न नहीं होती; न इसमें कोई अपवादात्मक नियम कहीं पाया जाता है। जो नियम समस्त विषयों पर ब्रह्माण्ड पर लागू है; वे ही नियम इसकी समस्त इकाइयों पर लागू हैं। चाहे वह सूर्य हो या पृथ्वी , मनुष्य हो या वनस्पति , परमाणु हो या प्राकशकण या उससे सूक्ष्म कण । सभी की उत्पत्ति, क्रिया, संरचना , पोषण और संहार के नियम एक ही है।”

और यह इसकी प्रामाणिक वैज्ञानिकता है। जो सभी पर लागू हों , वे ही नियम होते हैं। मैंने सर्वत्र इसका परिक्षण किया है और यह सत्य है। आश्चर्य मुझे इसलिए नहीं हुआ कि ये सर्वत्र सत्य हैं। आश्चर्य इसलिए हुआ कि पृथ्वी पर मानव विकास के इतिहास का सच क्या है? यह जानकारी तो विकसितों के भी विकसित के मस्तिष्क की सीमा से परे की है। इसे वे कैसे जानते थे, जिनको सपेरे-चरवाहे कहती हुई; हमारी सरकारें गौरव महसूस करती हैं और ज्ञान-विज्ञान को आधुनिक युग की देन समझकर विदेशों में तकनीकियों की भीख मांगती फिरती है? मैंने तमाम रहस्यों की पहेली हल कर ली; पर इस पहेली को न जान सका। सत्या क्या है?…. जबसे इसकी जानकारी मुझे हुई है मैं सकते में हूँ। जब एकांत में बैठकर सोचने लगता हूँ , तो रोने लगता हूँ । कौन कहता है कि सत्य की दुर्दशा नहीं होती और ज्ञान की कद्र हर जगह होती है । ज्ञान –विज्ञान , संस्कृति और माँ-बाप को गाली देने वालों के नायाब उदाहरणों को देखना है; तो हमारे देश में आईये। इसका यह महातीर्थ जैसा पर्यटन स्थल है।

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संस्थापक

प्रेम कुमार शर्मा

www.dharmalay.com

 

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