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सत्संग ज्ञानगंगा

धर्मालय द्वारा चलाये जा रहे , इस सत्संग में कोई भी भाग ले सकता है। आप अपनी कोई भी धार्मिक पारिवारिक या आध्यात्मिक शंका पर प्रश्न पूछ सकते है । गुरुवर श्री प्रेम कुमार शर्मा आपके प्रश्नों के देंगे। आपका परिचय नहीं दिया जायेगा , आप अपना नाम पता या ईमेल ज़रूर दें।

कृपया अपनी शंका धर्मालय के ईमेल पर भेजे । उनके उत्तर भी साईट पर देखें। व्यक्तिगत उत्तर देना वर्जित है। समयाभाव इसका बड़ा कारण है।

फोन , whatsapp आदि से सम्पर्क न करें । धर्मालय का केवल यही काम नहीं है। यह सनातन धर्म की रिसर्च व्यवस्था है । अनेक क्षेत्र में काम करना पड़ता है।

 

विशान्त कुमार पटेल

धर्मालय सचिव

 

 

 

सत्संग ज्ञानगंगा – 1

  1. भगवान क्या है ?

भगवान इस ब्रह्माण्ड के केंद्र में बैठी इसकी आत्मा है। यह एक ऊर्जा परमाणु है, जो प्रकाश कणों से (81 के पॉवर 108) गुणा सूक्ष्म है । यही वामनावतार इस ब्रह्माण्ड का स्वामी है।

स्मरणीय है कि ब्रह्माण्ड कि प्रत्येक इकाई के केंद्र में यही आत्मारूपी परमाणु होता है और उस इकाई के शरीर का भोक्ता एवं संचालक है ।

  1. विष्णु क्या है ?

ब्रह्म , विष्णु , हरि कामेश्वरी , काकिणी आदि अनेक नामो से जानी जाने वाली यह शक्ति ब्रह्माण्ड का नाभिक है। इसके केंद्र में आत्मा होती है। यह नाभिक प्रत्येक इकाई में भी होती है। जटिल सिस्टम और प्रक्रिया से सभी श्रेणीबद्ध रूप से एक – दूसरे से जुड़े होते है।

  1. आत्मा क्या है?

यह एक नन्हा परमाणु है, जो हर इकाई के केंद्र में होता है। वास्तविक जीव यही है। यह ब्रह्माण्ड के केंद्र में बैठे पहले परमाणु का प्रतिलिपि होता है। इसकी बौछार ब्रह्मांडीय नाभिक की नाभि से निरंतर होती रहती है। यह ब्रह्माण्ड  के बने रहने तक बना रहता है। बार बार अपना बाहरी सर्किट बदलता है।

 

  1. क्या देवी-देवता , भगवान् ईश्वर आदि का कोई अस्तित्व है ? या यह कल्पना है?

इनका शाश्वत अस्तित्व है। वास्तव में ये इस ब्रह्माण्ड की ऊर्जा उत्पन्न करके संचालित करने वाली , निराकार अमूर्त शक्तियाँ है। जैसे किसी रेडियो , कंप्यूटर आदि के सर्किट के भिन्न – भिन्न बिन्दुओं पर काम करने बाली शक्ति। इनका कोई मूर्त रूप नहीं । जिन रूपों कि हम पूजा – साधना करते है। वे ध्यान लगाने के लिए भावरूप है। उस मानवीय मूर्त रूप में वे कहीं नहीं है।

 

रहस्य

वस्तुतः , यह भारतीय तंत्रविद्या की एक तकनीकी है । प्रकृति में एक नियम है कि आप जिस भाव में डूबेंगे , उस भाव के समीकरण की ऊर्जा को उत्पादन करके वाले ऊर्जबिंदु अधिक क्रियाशील हो जायेंगे । यह आवश्यक है , क्योंकि हमारी इच्छाओं से अभाव का भाव बनता है और उस इच्छा की पूर्ती के लिए उसी समीकरण में ऊर्जा प्राप्त होती है। तन्त्र , मंत्र , योग , ध्यान सबमें  इसी तकनीकी का प्रयोग होता है।

तन्त्र साधनाओं में देवी – देवताओं की सिद्धि के लिए उनके गुणों के अनुरूप भाव ध्यानरूप कल्पित किया गया है। यहाँ एक ही शक्ति के कई – कई रूपों को सिद्ध किया जाता है। ये ही ध्यानरूप सामान्य लोगों में रूढ़ होकर मूर्तियाँ बन गया है।

 

  1. स्वसिक और श्री चक्र क्या है?.

स्वस्तिक ब्रह्माण्ड और उसकी इकाइयों के घूमने का रेखा सूत्र है। श्री चक्र ब्रह्मांडीय सर्किट का ब्लू प्रिंट । स्मरणीय है कि ये हर इकाई में भी वही उसी रूप में होते है

 

  1. गुरु जी । ध्यान नहीं लगता, संयम के नियम का भी पालन अन्हीं कर सकता । क्या मुझे सिद्धि मिलेगी?

आप लालसा में , जिसमें रूचि नहीं है वह सिद्ध करने में लगे हैं। इसलिए ध्यान नहीं लगता। जिस भाव में रूचि हो, चाहे वह शतरंज का खेल हो या प्रेमिका का ध्यान उस पर अभ्यास करें। जब अभ्यस्त हो जायेंगे, तो कोई भी भाव बदलने से ध्यान लगेगा।

और आपको किसने कहा कि इसमें किसी संयम की आवश्यकता है? बाज कौन सा संयम करता है । किसी भी भाव या कार्य की सिद्धि के लिए रूचि, अभ्यास और एकाग्रता कि जरूरत होती है , नियमों के बंधन में बंधने की नहीं। विज्ञान के सभी आविष्कार इन्हीं तीन से होते है। भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धियों की प्राप्ति भी इन्हीं सूत्रों से होती है। प्रकृति में अपवादात्मक नियम उत्पन्न नहीं होते।

 

  1. मैं आपको गुरु बनाना चाहती हूँ । क्या आप मुझे दीक्षा देंगे?

गुरु भगवान के सदृश्य होता है।….. और भगवान् की कृपा के लिए दीक्षा आवश्यक नहीं । हम संप्रदाय नहीं चला रहें। आप श्रद्धा से मानेंगे तो , मैं आपका गुरु ही हूँ। धर्मालय से हर ज्ञान आप ईमेल से प्राप्त कर सकते। यह श्रृंखला इसीलिए प्रारंभ की गयी है।

 

  1. मैं सिद्धि चाहती हूँ । क्या मार्गदर्शन करेंगे ?

यह प्रश्न आपका ही नहीं है। प्रतिमाह सैकड़ों पत्र आते है । इस सम्बन्ध में कृपया निम्नलिखित बातों का ध्यान दें

सबसे पहले पहले निर्धारित करें कि आप किस ईष्ट की सिद्धि चाहते हैं। इसमें लालसा नहीं , रूचि को ध्यान में रखें।

इसके बाद ध्यान करें कि किस प्रकार के माध्यम से चाहते है – तामसी, सात्विक , भैरवी मार्ग , अघोर मार्ग

जब यह निर्धारित हो जाये , तो इस मार्ग की आवश्यक शर्तों का ज्ञान करें –

 

तब गुरु की बात आती है ।

गुरु चुनकर उन्हें ओने यहाँ बुलाएं । उसका सत्संग आयोजित करे। इससे गुरु के ज्ञान और उसके व्यक्तित्व का ज्ञान होगा। सिद्धि का क्षेत्र गुप्त होते है। सत्संग के इस काल में उनकी सेवा सत्कार करके सिद्धि क्षेत्र की पूरी जानकारी , प्रक्रिया , गुप्त क्षेत्र , रहस्य क्षेत्र को जान लें।

तब दीक्षा लें अन्यथा किसी पाखंडी के जाल में फँस कर समय, धन और बहुत कुछ बर्बाद हो जायेंगे।

इस प्रक्रिया में गुरु और शिष्य दोनों की कसौटी परख हो जाती है।

सिद्धि का मार्ग सरल नहीं है। यह मार्गदर्शन का विषय नहीं है। कोई माई का लाल किसी नये व्यक्ति का मार्गदर्शन करके कंप्यूटर सिंबल नहीं करवा सकता , जबकि हर पार्ट भी स्वयं ही बनाना हो।

 

  1. किसी ने मेरे पति और ननद पर जादू टोना कर कर दिया है। काट का कोई उपाय बताइए।

आप खुद ही डॉक्टर है और जानते है कि जादू टोना कर दिया है , तो उपाय भी कर लीजिये ।

हम पहले भी कह चुके है कि ऐसे मामलों में ईमेल पर पूरी बात लिखें कि समस्या क्या है और इस ज्ञान का आधार क्या है कि जादू टोना किया गया है। आजकल लोग भाग कर स्थानीय ओझा – तांत्रिक के पास चले जाते है और वह बता देता है कि तुम पर जादू टोना है। … पर इलाज नहीं करता ।

यदि जादू टोना है , तो जादू टोना से ही इलाज होगा । पूरी बात लिखें।

 

  1. क्या तन्त्र – मंत्र – कला जादू होता है?
  2. धर्मालय में विस्तार में इसका उत्तर है । देखें काला जादू । वस्तुतः यह एक सूक्ष्म ऊर्जा तकनीकी है । इसमें प्राचीन रसायन शास्त्र भी मिला हुआ है।

(क्रमशः)

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