श्रीकृष्ण का आध्यात्मिक रहस्य

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कौन हैं कृष्ण? क्या वे सच में हुए थे? श्री कृष्ण का आध्यात्मिक सत्य क्या है? श्री कृष्ण के आखिर कितने रूप हैं? क्या है राधा और कृष्ण की कथा का सच?

देश भर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनायी जा रही है; पर श्रीकृष्ण के आध्यात्मिक रहस्य को समझे बिना इसका महत्व केवल सांस्कृतिक है, इसका कोई आध्यत्मिक लाभ या भौतिक लाभ नहीं है. गीता पाठ से धर्म कर्म नहीं सुधरता; गीता को समझने से धर्म कर्म सुधरता है. पर आजकल समझने वाले भी महामूर्ख विद्वान भी कम नहीं हैं; जो यह कहते फिर रहे हैं कि उसमें क्षत्रियों को हत्याएं करने का उपदेश दिया गया है. कुछ उसे कर्म का उपदेश मान कर ज्ञान छांट रहे हैं. पर उस ब्रह्मांड तक फैले विराट ज्ञान का सार जानने के लिए गीता को बार बार समझ कर पढना पड़ता है; इसी लिए उसे बार बार पढने को कहा गया है. यही उसका पाठ है.

गीता में ब्रह्मांड का सारा ज्ञान समाहित है इसके साथ ही मानव जीवन का आदर्श भी; जो उसी ब्रह्मांड के ज्ञान के परिपेक्ष में बताया गया है. वह  सनातनधर्म की व्याख्या है. उसके विज्ञान की व्याख्या. तोते की तरह श्लोकों को रटते रहने से उससे कुछ भी प्राप्त होनेवाला नहीं है. हमारा अनुरोध है की सनातन धर्म के किसी भी क्षेत्र के इस अंधे रूप को ग्रहण मत कीजिये इसका कोई भी ग्रन्थ, मंदिर, पूजा, साधना, देवी देवता,अवतार, आदि तर्कहीन आस्थाओं पर आधारित नहीं है. यह इस्लाम या ईसाइयत नहीं है.

श्रीकृष्ण विष्णु अवतार हैं. विष्णु ब्रह्मांड के केंद्र में नाभिक के केंद्र में बैठा एक सर्वशक्तिशाली वामनावतार है. वही अपनी प्रतिलिपियाँ शुक्राणु के रूप में विकरित कर रहा है. यही आत्मा है जो प्रत्येक प्राकृतिक ईकाइयों के केंद्र में बैठा उसके सिस्टम को भोग रहा है. श्री कृष्ण की हजारों रानियों एवं गोपिकाओं का रहस्य यहाँ है. हजारों एक सांकेतिक संख्या है. वह हर एक कण का भोक्ता है, वही वास्तविक ईश्वर है, जो ब्रह्मांड की आयु तक क्रियाशील रहता है ब्रह्मांड के लोप के समय परमात्मा में विलीन हो जाता है. यह अविनाशी स्त्री पुरूष सबमें हैं. अपनी राधा के साथ. केद्र में आत्मा, उसके चारों ओर नाचती शरीर रुपी राधा. शरीर में उसका उर्जा चक्र हमेशा नाचता रहता है. सभी तांत्रिक साधनाओं में इसे इसी अर्थ में लिया जाता है. आत्मा को श्री कृष्ण और शरीर को राधा मन जाता है. विदेह साधक स्वयं को कृष्ण मन कर साधना करते हैः और देहानुभुती वाले राधा मन कर .

यह कृष्ण छलिया है, क्योंकि जाने कितने रूपों में अभिव्यक्त हो रहा है, जिनमें एक भी इसका असली रूप नहीं है. यह रसिया है, क्योंकि यह प्रत्येक शरीर की गोपी के साथ रास करता उसे भोग रहा है. यह वंशी बजैया है, यह वंशी की आवाज़ अपने केंद्र में ध्यान लगाने पर सुनायी देती है. यह प्रेम और भाव का देवता है, इसे इसी भाव से पाया जा सकता है .

श्रीकृष्ण ने कहा है कि स्वयं को पहचानों और त्याग पूर्वक भोग करो. राग से मुक्त हो कर भोग करने का यह धर्म वाक्य वैदिक वाक्य है और संभवत विश्व का सबसे बड़ा धर्म ज्ञान है, जो मन को सन्यासी बनाने का उपदेश देता है, कर्मों को त्यागने का नहीं. यदि कभी भी पूर्वाग्रह से मुक्त हो कर जीव और वनस्पतियों को देखेंगे, उसकी संरचना और क्रिया को समझने की कोशिश करेंगे, तो श्रीकृष्ण के उस विराट  स्वरूप के दर्शन हर एक में हो जायेंगे जो उन्होंने अर्जुन को दिखाया था. दिव्य द्रिष्टि ज्ञान से भी प्राप्त होती है. देखने और समझने का दृष्टिकोण बदल जाता है .

राधा और कृष्ण के रास से ही सृष्टि है यह कोई आस्था नहीं है, बल्कि एक वैज्ञानिक सत्य है. भिन्न भिन्न मार्ग ने इसे अपने ढंग से कहा है. पर सत्य के कहने के तरीके चाहे हजार हों, सत्य तो सत्य ही होता है.

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