श्मसान –साधना

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इसका अर्थ बाहरी श्मसान से नहीं है। साधक बाहरी श्मसान में जाकर श्मसान की सभी साधनाएं इसलिए करते है कि वातावरण का प्रभाव मानसिक भाव पर पड़ता है और सांसारिक भौतिकता से ‘शून्यता’ का भाव प्राप्त होता है।
वास्तविक श्मसान यह शुन्यभाव है। कमरे में बन जाये, तो वही श्मसान है।इस भाव को प्राप्त करके सभी प्रकार की मानसिक एवं आध्यात्मिक शक्तियों की सिद्धियों को सरलता से प्राप्त किया जा सकता है।
यह अघोरपंथ का मार्ग है।

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