शोध विवरण:- (आइन्स्टीन से आगे का रहस्यमय उर्जा और सृष्टि विज्ञान )

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यहाँ भ्रम में पड़ने की जरूरत नहीं है। उपर्युक्त का यह अर्थ नहीं है कि मैं उनसे बड़ा वैज्ञानिक या ज्ञानी हूँ। आइन्स्टीन ने कहा था की कुछ तो है, जो पदार्थ और इनर्जी का सार है, क्योकि हर एक दूसरे में परिवर्तित हो जाता है। इस सार को उन्होंने मूलतत्व की संज्ञा दी थी। पर वे नहीं बता पाए थे कि यह क्या है और इसकी व्याख्या क्या है एवं यह कैसे और किस प्रकार होता है। वस्तुतः यह एक प्रकाश कणों से [(१०८ पावर ८१) पावर ८१ गुणा] सूक्ष्म एक परमाणु है। यही मूलतत्व में सबसे पहले उत्पन्न होता है और शाश्वत नियमों से ब्रह्माण्ड में विकसित होता है। यही मूलतत्व को इनर्जी और मैटर में परिणत करता है। यह शोध इसी परमाणु की उत्पत्ति, संरचना, क्रिया और विकास के बारे में है। इसलिए इस सन्दर्भ में उपर्युक्त शीर्षक दिया गया है। उदेश्य यह है कि इसे विज्ञान के रूप में समझा जाए। किसी धर्म के धार्मिक बकवास के रूप में नहीं। यद्दपि इसके विवरण सनातन धर्म में यत्र तत्र टुकड़ों में मिलते हैं, पर इसका अर्थ शाश्वत नियम है। यह किसी मानव के आचार संहिता का धर्म नहीं है। भारत के सनातन धर्मी ऋषियों का विषय ब्रहमांड और इसकी उर्जा व्यवस्था ही रहें हैं। यह दूसरी बात है की आधुनिक अहंकार में डूबी मानव सभ्यता तत्कालीन पारिभाषिक शब्दों का अर्थ आज के अनुसार लगा कर अर्थ न समझ पाने पर उपहास उडाती रही है। यह उनके अहंकार का भी उत्तर है ।

वैज्ञानिक शाश्वत नियम ( ब्रह्मांड के सनातन धर्म )

[मूलतत्व क्या है? परिभाषा, व्याख्या और प्रमाण। मूलतत्व में पहले सूक्ष्म परमाणु की उत्त्पत्ति और क्रियात्मक विकास, परमाणु में तीन चरण में 9 उर्जा उत्त्पादन केन्द्रों की उत्त्पत्ति, उर्जाओं का वर्गीकरण , गुण और शक्ति, अंकों का वैज्ञानिक रहस्य, सृष्टि की अंक सांख्यिकी,  कैसे और कहाँ से उत्त्पन्न होता है, मैटर ?]

आध्यात्मिक सनातन धर्म (शाश्वत नियम): एक रहस्यमय प्रकृति विज्ञान, जो लुप्त हो चुका है।

[शिव/ परमात्मा (मूल तत्व ) का वास्तविक रूप और रहस्य; शिव से निगेटिव पोजिटिव क्षेत्र का उद्भव और मिलन; एक तीन विन्दु के जलते बुझते परमाणु का जन्म; पञ्च बिंदु परमाणु का उदय; पंचमुखी शिव और पञ्च भूत; शिव लिंगों का वैज्ञानिक रहस्य; शिव के डमरू और त्रिशूल का वैज्ञानिक रूप; वामनावतार का रहस्य; ९ विन्दुओं के परमाणु सृष्टि बीज का विकास; नौ देवियों का अर्थ; देवताओं का रहस्य; (इनमें कोई स्थूल रूप नहीं है, ये उर्जा जगत की व्याख्याएं हैं।); शेषनाग और चाइनीज ड्रैगन का रहस्य; महाकाल का रहस्य; ऋग्वेद के पुरुष और शैव मार्ग के महामाया का रहस्य; श्री कृष्ण के विराट रूप का सार्वजनिक दर्शन; भैरवी चक्र/ श्रीविद्या चक्र का रहस्य]

[इसी परमाणु में उदित होता है, सनातन धर्म और उसकी समस्त व्याख्याएं, वेद पुराण, उपनिषद, गीता और शिवलिंग से लेकर समस्त प्राचीन विद्याओं की उत्त्पत्ति इसी में होती है; क्योकि यही विकसित हो कर ब्रहमांड बन जाता है और एक विचित्र गोरखधंधे का मायाजाल खड़ा कर देता है। हम चुनौती के साथ कहतें हैं कि यदि इस परमाणु की उत्त्पत्ति , संरचना और क्रिया को नहीं जानोगे तो विज्ञान के हर क्षेत्र में भटकते रह जाओगे , सत्य का ज्ञान कभी नहीं होगा; क्योकि इस मायावनी प्रकृति का मायाजाल प्रकाश से (10881)108 गुना सूक्ष्म उर्जा जगत तक फैला है और हर एक उर्जा का अपना आयाम, अपनी दुनिया है। ये एक के अन्दर एक समाये हुए हैं और यह आयाम, जिसमें हम हैं, प्रकाश से कई गुना तेज गति से फ़ैल रहा है। कौन सा यंत्र बना लोगे भाई?]

प्राक्कथन

भारत में सनातन धर्म को रूपक कथाओं और कथावाचकों ने दिशाहीन करके एक फैंटम दुनिया में पहुंचा दिया है। यहाँ कोई उपनिषद् नहीं पढता। धर्म ग्रंथों को ज्ञान के लिए नहीं, स्वयं को प्रतिष्ठित करने के लिए प्रयुक्त करता है। इससे तो अच्छे आइन्स्टीन थे, जिन्होंने समझा कि परमात्मा का वास्तविक अर्थ क्या है। उन्होंने एक बार पूछने पर कहा कि हर वस्तु, हर उर्जा, एक से दूसरे में परिवर्तित हो जाती है, तो कुछ तो है, जो इनमें सार रूप में ढल रहा है। यद्दपि वे प्रक्रिया पर प्रकाश नहीं डाल पाये। उन्होंने इसे मूलतत्व कहा। परम + आत्मा का अर्थ भी यही है। आत्मा का अर्थ सार ही है। आपको आश्चर्य होगा कि हर उपनिषद में इसे ‘तत्व’ ही कहा गया है। तमाम शैव तंत्र में चाहे वह किसी शाखा से हो, इसे तत्व ही कहा गया है। सनातन धर्म इसी निराकार तत्व से उत्पन्न होता है। वस्तुत यह प्रकृति में व्याप्त वैज्ञानिक नियमों का तात्कालिक नाम है। इसे आचरण संहिता के मानव निर्मित धर्मों से तुलना और प्रतिस्पर्धा करने से ही हम हीरों के खान पर बैठ कर भीख मांग रहें हैं।

 तमाम दुनिया, जिस विज्ञान के पीछे भाग रही है, वह विज्ञान दिशाहीन टुकडें हैं। इसलिए उसका जीवन दर्शन केवल विनाश को आमंत्रित कर रहा है। केवल सनातन धर्म प्रारम्भ से बताता है कि यह सृष्टि क्या है, किससे, किसमें , किन नियमों से उत्त्पन्न होती है और किस प्रकार उन नियमों से सारा ब्रहमांड शासित होता है। यह ग्रहों से उपग्रहों तक और जीवन से चेतना तक का रहस्य बताता है। यद्दपि यह विज्ञान लुप्त है। संस्कृत के ग्रंथों में कुछ टुकड़े हैं, जो बताते हैं कि वे इसे प्रारम्भ से अंत तक जानते थे। यह एक विशाल और जटिल उर्जा विज्ञान है। मुझे जानने में ३३ वर्ष लग गए, पर मैं दावे के साथ प्रमाण सहित कह सकता हूँ कि उनका यह दावा सत्य है कि “इस ब्रहमांड में कहीं भी, कोई विकसित प्राणी उत्त्पन्न होगा तो इसी विज्ञान को जानेगा, क्योकि इसके सिवा कोई दूसरा विज्ञान है ही नहीं।”

शैवतंत्र का उर्ध्वनाम्णाय विज्ञान, साधना- सूत्र और जीवनदर्शन

( साइंटिफिक डिस्कवरी ऑफ़ सुपर एटोमिक युनिवर्सल पावर साइंस )

विश्व के तमाम वैज्ञानिकों एवं वैज्ञानिक संस्थाओं से अनुरोध: कृपया परीक्षण करके सत्य का निर्धारण करें। अंधी आस्था, अँधा ज्ञान किसी सत्य को जानने में सबसे बड़ी रुकावट होती है। मैं यहाँ भारत में इस अंधे विद्वानों को जगा नहीं पाया, इसलिए इसे विश्व स्तर पर प्रेषित किया जा रहा है। कहीं कोई तो ऐसा होगा, जो अपनी पूर्व आस्थाओं को त्याग कर परीक्षण करके विज्ञान को नए आयाम तक पहुंचाएगा। मानवता के लिए इस विज्ञान को जानना जरूरी है। प्रथम दृष्टया अकाट्य प्रमाण साथ दिए गये हैं। किसी धार्मिक नाम से भ्रमित न हों, ये प्राचीन कालीन उर्जा स्वरूपों के नाम हैं और यहाँ इन्हें वैज्ञानिक अर्थों में लिया गया है।               

परमतत्व ( सुपर एलिमेंट ): शिव 

यह पुस्तक शिव से उत्त्पन्न तंत्र के अति गोपनीय स्वरूप से सम्बंधित है। एक ऐसे क्षेत्र के सम्बन्ध में, जिसके बारे में इस युग के साइंटिस्ट ही नहीं, सनातन धर्म के आचार्य और साधक भी कुछ नहीं जानते। यह किसी संस्कृति या भौतिक धर्म से सम्बंधित नहीं है। यह ब्रह्मांड में व्याप्त उर्जा-व्यवस्था और उसकी क्रिया का विज्ञान है। एक ऐसा विज्ञान, जो विश्व के वैज्ञानिकों से ले कर सभी धर्म के जानकारों एवं श्रधालुओं को ज्ञान के प्रकाश से भर कर उनके धर्म और विज्ञान को परिभाषित करने की क्षमता प्रदान करेगा। यह मानवता के लिए ही अंतिम ज्ञान नहीं है,  ब्रह्मांड में कहीं भी, कोई भी, विकसित जीव उत्त्पन्न होगा, तो इसी विज्ञान को जानेगा; क्योंकि इसके सिवा कोई दूसरा विज्ञान है ही नहीं। उन तमाम प्राचीन रहस्यमय संकेतों, चिन्हों में व्यक्त रहस्य का भी पता चल जाएगा, जो सारी दुनिया में पाए जातें हैं। इतना ही नहीं; हमारे वैज्ञानिक जिस विज्ञान की शाखा में जहां उलझे हुयें हैं, यह उनका भी मार्ग-दर्शन करेगा। उनका ख्याल है कि वे विकसित युग में हैं। मैं नहीं जानता कि कैसे; पर यह उनका भ्रम है। यह इस रिसर्च को पढने से ज्ञात हो जाएगा, जिसको हम पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने की सोच रहें हैं, क्योंकि भारत की यूनिवर्सिटियों और सरकारों की इसमें दिलचस्पी नहीं दिखती । 

जब भी हम तंत्र या शिव की बातें करतें हैं, तंत्र के नाम पर भयानक वीभत्स क्रियाओं और जादू टोना की काली दुनिया में पहुँच जाते हैं। प्राचीन ग्रंथों और आचार्यों के कथन में भी इसकी कोई परिभाषा उपलब्ध नहीं है। जहाँ भी इसके बारे में पूछा गया है, बस एक ही उत्तर है – ‘यह शिव से उत्त्पन्न हुआ है।’… परन्तु, इस कथन से कुछ भी स्पष्ट नहीं होता। एक तो यह परिभाषा नहीं है। इसमें उत्त्पत्ति के सम्बन्ध में बताया गया है, दूसरे इसमें ‘शिव’ पारिभाषिक शब्द है। परिभाषा में दूसरे पारिभाषिक शब्द का होना, भारतीय तर्कशास्त्र के अनुसार त्रुटि है। इसलिये सबसे पहले हमें शिव को जानना चाहिये। यह क्या है?

जब भी हम शिव का नाम लेते हैं, एक ऐसे सन्यासी मानवाकृति का स्वरूप सामने आता है, जो एक बर्फ से ढके पहाड़ पर समाधि में बैठा हुआ है। पूरी दुनिया ही नहीं; सनातनधर्मी शिव के भक्त भी उन्हीं को शिव समझतें हैं। परन्तु, परम्परा से चला आ रहा यह चित्र सांकेतिक ध्यानरूप है। ऐसा कोई अति मानव कहीं नहीं रहता। न कैलाश पर्वत पर, न किसी लोक में। यह इस ब्रह्मांड का मूलसार है। आधुनिक भाषा में मूलतत्व। धार्मिक शब्दों में, निराकार परम तत्व परमात्मा या गॉड। इसे भिन्न भिन्न सम्प्रदाय या संस्कृति में भिन्न भिन्न रूप में जाना जाता है। स्वयं सनातन धर्म में भी यह परब्रह्म, परमात्मा, परमतत्व, तत्व कई नामों से जाना जाता है। पर ये सभी एक ही हैं। इसका एक अंशरूप ब्रहमांड सहित इसकी प्रत्येक इकाई के पोजिटिव पोल पर एक उर्जा छत्ररी से घिरा विद्यमान रहता है, जिसे संस्कृत में कैलाश कहतें हैं।

इस शिव से ब्रह्मांड की उत्त्पत्ति एक सूक्ष्म परमाणु के रूप में होती है और वही परमाणु कुछ शाश्वत नियमों और क्रियाओं से विस्तार करता हुआ ब्रह्मांड बन जाता है। इस ब्रह्मांड की उत्त्पत्ति आकस्मिक रूप से नहीं हुई है और न ही यह मनमाने तरीके और क्रियाओं से विकसित हो रहा है। यह कुछ शाश्वत नियमों से बद्ध क्रियाओं से विकसित और संचालित हो रहा है। यही शाश्वत नियम सनातन धर्म है। इस सिस्टम को ही तंत्र कहतें हैं, जो शिव से उत्त्पन्न हुआ है। यह एक सुपर एटोमिक पावर साइंस है। हम इसके प्रैक्टिकल और धार्मिक क्रियाओं को जानतें हैं। इस विज्ञान के बारे में कुछ नहीं जानते; क्योंकि यह लुप्त हो चुका है।

विज्ञान की सभी शाखाएं इसमें आ जातीं हैं। किसी भी क्षेत्र में जहा तक हम जानते हैं, उससे आगे जानने के लिए हमें इसके नियम और सूत्रों से सहायता मिलेगी।

क्या करूँ मैं?

एक मान्यता बन गयी है कि हमारा युग विकसित है और हम जो जानतें हैं , प्राचीन युग का मानव नहीं जानता था । यह एक मूर्खतापूर्ण विश्वास है, जो सारे ज्ञान-विज्ञान को अंधीआस्था के कुएं में डाल देता है।  हमें बहुत सी बातें जाननी हैं और हम कैसे दावा कर सकतें हैं कि बिना ० से ९ तक के अंकों को जाने हम किसी भी विज्ञान के गणितीय सूत्रों को सुलझा सकतें हैं? यह इस युग का ज्ञान नहीं है? तो प्राचीन ज्ञान को सम्पूर्ण रूप से कूड़ा मानने वालों को इसे भी कूड़े में फेंक देना चाहिए। बहुत ज्ञान-विज्ञान है, तो अपने अंकीय सूत्रों को खोजो। इस प्राचीन सूत्र को क्यों अपना रहे हो? आपको तो यह भी पता नहीं कि इनके आविष्कार का आधार क्या है? कभी हाथ की उँगलियों को आधार बताते हैं, कभी मटर के दाने को। यदि आपको हम यह कहें कि यह सृष्टि के प्रथम परमाणु की उत्त्पत्ति का सूत्र है, जिससे यह ब्रहमांड विकसित हो रहा है, तो आपके तो छक्के छूट जायेंगे।

दूसरी ओर हमारे धर्म के झंड़ावतार हैं,जो जाने क्या क्या अंधआस्था फैलाये जा रहें हैं। ये सनातन धर्म को महान बताने के लिए ऐसी ऐसी अनर्गल बातें कर रहें हैं कि सारी मानवता एक फैंटम फिक्शन को सच मान ले और इनकी रहस्यमय दुकानदारी चलती रहे। ये सनातन धर्म को नहीं; स्वयं को महान बनाने में लगे हैं।

क्या करूँ मैं? एक तरफ विज्ञान की अंधीआस्था है, जिसके लिए पश्चिमी विज्ञान मानक बना हुआ है। दूसरी ओर धर्म है, जो पुराणों की रूपक कथाओं को सत्य बनाने पर तुला हुआ है? मैंने विश्वविद्यालयों से बहुत चाहा कि भाई कम से कम परीक्षण तो करो। पर उन्हें डिग्री चाहिए। यानी यदि मैंने डारबिन और न्यूटन को नहीं पढ़ा, तो विज्ञान के बारे में कुछ कहने का अधिकार ही नहीं है। पर मैं क्या करूं? गौतम को न्यूटन के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था न कणाद को आधुनिक परमाणुविदों का ज्ञान था। आश्चर्य है कि उनका परमाणु प्रकाश से लाखों गुना सूक्षम था, पर वे तो चरवाहे थे। उनका परमाणु विज्ञान से क्या वास्ता? उनके पास मशीनें थीं? कहतें हैं कि मूर्खों के पास सिंग नहीं होते। वे देखने में आदमी जैसे ही लगतें है।

मैं माफ़ी चाहता हूँ कि मेरी भाषा कटु हो गयी है, परन्तु यदि १५ वर्ष आपने भी भारतीय व्यवस्था की मूर्खता में स्वयं को अपमानित होते महसूस किया होता, तो आप संभवत: पागलखाने पहुँच जाते। यह मूर्खों का देश है। मानसिक गुलामों का देश। समाज, राजनीति, विज्ञान , शिक्षा , आदर्श में किसी की कोई स्वतंत्र सोच नहीं है, न वह विचार करना चाहता है। पर अभी इन बातों का कोई अर्थ नहीं है।यदि आप वास्तव में वैज्ञानिक हैं, तो पहले इस विज्ञान को जानिये, फिर परीक्षण को परखिये और फिर इन बातों का अर्थ निकालिए। 

उर्ध्वनाम्णाय श्रीचक्र-विज्ञान (शैव-तंत्र का सृष्टिविज्ञान)

(साइंटिफिक डिस्कवरी लॉ ऑफ़ गॉड)

(टॉप सिक्रेट ऑफ़ यूनिवर्स)

विषय-प्रवेश

जब से मनुष्य को सोचने समझने की शक्ति मिली है, वह इस रहस्यमय ब्रह्मांड को देख कर चकित है। वह इसके स्वरूप और उसकी उत्पत्ति को जानने का प्रयत्न कर रहा है। सबने अपने अपने ढंग से इसे समझा और समझाया है। आज भी विश्व के वैज्ञानिक इसके रहस्य को जानने का प्रयत्न कर रहें हैं। विश्व के धर्मों ने भी इसके बारे में अपनी राय प्रगट की है, पर वे सभी फैंटम कॉमिक्स की कहानियां लगतीं है। यह केवल धर्म की ही बात नहीं है; मोटा धन और बड़ी बड़ी आश्चर्यजनक मशीनों के बाद भी वैज्ञानिक भी फैंटम दुनिया में घूम रहें हैं। इनका दावा है कि इनके पास तर्क और प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

परन्तु यहाँ तीन त्रुटि होती है। पहली तो यह कि उनकी अपनी ही परिभाषा के अनुसार प्रत्यक्ष अनुभूति का कोई स्टैण्डर्ड मानक नहीं है। दूसरी यह कि प्रत्यक्ष का मानक सत्य भी हो, तो उन पर निकले गये निष्कर्ष एक जैसे नहीं होते। यदि प्रत्यक्ष अनुभूति में ९ आ रहा है, तो कोई आवश्यक नहीं की वह ४ और पाँच के योग हों। वह २ और ७ , ३ और ६ आदि का भी योग हो सकता है। तीसरी सबसे बड़ी और आश्चर्यजनक गलती यह है कि उनके रिसर्चों में उनका अपना ही सबसे महत्वपूर्ण नियम कट जाता है कि वैज्ञानिक नियमों के अपवाद नहीं होते। यह कभी नहीं हो सकता कि सूरज के लिए कोई और नियम हों और पृथ्वी के लिये कुछ और। यदि कोई खोज वास्तव में खोज है, तो उसे सभी के लिए एक होने चाहिए। 

यही एक बात है, जो इस खोज को सभी वैज्ञानिक खोजों से अलग, एक अलग ही सम्पूर्ण विज्ञान के रूप में स्थापित करने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक आधार उपलब्ध करता है।परन्तु इसके लिए आवश्यक है कि इसको पढनेवाला हर एक व्यक्ति अपनी जानकारियों और विश्वास को अलग करके इसे पढ़े, बाद में अपनी जानकारियों से इसे परखे। किसी भी नए ज्ञान और विज्ञान की प्रगति के नियम यहीं हैं। अपनी जानकारियों और विश्वास से अलग हो कर ही नयी बातें जानी जा सकतीं हैं।मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि यह पूरा विज्ञान आज की अनेक वैज्ञानिक मान्यताओं का खंडन करता है। मान्यताओं का , नियमों का नहीं। उस जगह आप उन तथ्यों का परीक्षण करने की जगह यह सोचने लगे कि यह किसी महान वैज्ञानिक के सिद्धांतों का खंडन करता है, तो आपका मष्तिष्क उसी समय इसे रिजेक्ट कर देगा और आप इसके सत्य या असत्य का परीक्षण नहीं कर पायेंगे। यह एक मूर्खतापूर्ण तरीका है किसी सत्य का परीक्षण करने का।

यद्दपि  यह एक सुपर एटोमिक साइंस है। एक सूक्षतम परमाणु के उत्पन्न होने और उसकी ब्रह्मांड के रूप विकसित होने का सुपर एनर्जी साइंस, जो प्रकाश से भी कई गुणा सूक्ष्म है, तथापि इसे समझने या प्रमाणित करने के लिए वैज्ञानिक होना आवश्यक नहीं है। इसे विज्ञान का छात्र भी समझ सकता है और प्रमाण के प्रति आश्वश्त हो सकता है। क्योकि इसका प्रमाण प्राप्त करने की सबसे सरल विधि समानता के नियम हैं।                                     

मूलतत्व की शाश्वतता (क्या हैं शिव ?)

किससे, किसमें उत्पन्न होता है ब्रहमांड ?

जहाँ तक स्थान है, वहाँ तक एक एक तेजोमय सूक्ष्मतम तत्व फैला हुआ है। चूंकि स्थान का कोई आदि अंत नहीं, इसलिए इसका भी कोई आदि अंत नहीं है, यह एक ही है, इसमें कोई भेद नहीं है। यह शाश्वत तत्व है। न तो इसकी उत्पत्ति होती है, न ही इसका क्षरण होता है। अपने मूलरूप में अकेले होने के कारण इसमें क्रिया या गुण भी नहीं है। यह अनंत तक फैला हुआ है, इसलिये इसकी आकृति भी नहीं है। स्थान का अस्तित्व इसके कारण है। यह एक आश्चर्यजनक तत्व है। ऐसा इस प्रकृति यानी ब्रहमांड में कुछ भी नहीं है, जिससे इसकी तुलना की जा सके। तत्व कहते ही वैज्ञानिक अपने पदार्थों की तत्व सूची पर चले जाते हैं। पर यह भौतिक पदार्थ नहीं है। यह एक उर्जा प्रकृति का विरल तत्व है, पर यह उर्जा भी नहीं है। सभी उर्जा का सारतत्व यही है। उससे भी सूक्ष्मतम। एक विशेष सूत्र से की गयी गणना के अनुसार यह प्रकाश से भी (10881)108 [(१०८ पावर ८१) पावर १०८ गुणा] से भी दसियों गुना सूक्ष्म है और यह सर्वत्र व्याप्त है। जब प्रकृति नहीं होती इसमें कोई गति नहीं है, पर पर प्रकृति के प्रारम्भ होते ही इसकी गति किसी भौतिक उर्जा से बहुत अधिक है।

  यह एक विचित्र तत्व है। इसकी विस्तृत व्याख्या अन्त में दी जाएगी। अभी कुछ भी कहने से भ्रम उत्पन्न होगा। पहले यह जानना जरूरी है कि इसकी ब्रहमांड की उत्पत्ति और क्रिया एवं विकास में क्या भूमिका है। यही उपनिषदों और गीता का ‘तत्व’ है। वेदों का परमपुरुष या परमात्मा है। यही तंत्र का ‘शिव’ है। परमात्मा का अर्थ परमसार ही होता है। यह एक चैतन्य तत्व है। यह जब स्वतंत्र होता है, तो दूसरा कोई होता ही नहीं, जिसे यह अनुभूत करे। यह आत्मानुभूति में होता है। जब यह अणु में बंधता है, तो खुद को अलग अस्तित्व समझने लगता है और अपने सर्किट की क्षमता के अनुसार दूसरे सर्किटों को अनुभूत करने लगता है। तंत्र के आचार्यों ने इसे अणुमल ही कहा है। यह विश्लेषण आगे प्रमाणित किया गया है। जड़ से चेतना की उत्त्पत्ति का विश्वास भ्रामक है। जड़ का ब्रहमांड में कोई अस्तित्व नहीं है। तब भी नहीं जब हम पदार्थ को अलग मान लें। प्रकृति में कोई दूसरा सर्किट उत्त्पन्न ही नहीं होता। इसलिए दो प्रकार की उत्पति होती ही नहीं है।

शिव से तंत्र (ब्रहमांड की उर्जा-व्यवस्था) की उत्त्पत्ति

क्या है यह ब्रह्मांड? क्या है यह अनंत सा दिखनेवाला विशाल गोरख धंधा?  इसके अनंत तारों निहारिकाओं के बीच एक छोटे से गोले पर हम और हमारी दुनिया क्या है?  हम कहाँ से आते हैं, कहां चले जाते हैं? इसी उत्सुकता ने मुझे १९ वर्ष की उम्र में अर्धपागल सा बना दिया था। आज अंतिम समय में इसकी डिस्कवरी हो पायी है। पर इसका सत्य इतना आश्चर्यजनक है कि पूरी डिस्कवरी के बाद मैं हक्का बक्का रह गया। फिर रोमांचित हो उठा; क्योकि सत्य इतना आश्चर्यजनक है कि रोंगठे खड़े हो जातें हैं। मुँह से एक ही शब्द निकलता है – ‘अद्भुत’। हमारे वैज्ञानिक सोच भी नहीं सकते यह इतना आश्चर्यजनक है। उनके नक्षत्रविज्ञान और ब्रह्मांड की खोजों के अनेक क्षेत्र प्रश्नचिन्ह के घेरे में आ जाते हैं।

यह कोई तथ्यहीन कथन नहीं हैं। उन्होंने अपने वैज्ञानिक मूल्यों और नियमों पर अपने को जांचने का काम नहीं किया वर्ना वे समझ जाते कि उनके निष्कर्ष, जिन्हें वे सत्य मान रहें हैं गलत हैं। यह उनका ही मापदंड है कि नियमों के अपवाद नहीं होते। तो उत्पत्तियो के अपवाद कैसे हो सकते हैं? उत्पत्ति स्वयं एक शाश्वत नियम है, फिर एक की उत्पत्ति पर कोई और नियम, दूसरे पर कुछ और? ब्रहमांड में कुछ भी अपवाद नहीं है। जो नियम किसी क्रिया के लिए एक पर लागू है, वही सब पर लागू है। इस प्रकार सबकी उत्पत्ति, क्रिया, संरचना, विकास और विनाश के नियम एक से हैं। जो भी भिन्नता रूप, गुण आकार या क्रिया में नजर आ रही है, वह अनुभूतियों की कमजोरी है। चाहे वे अनुभूतियाँ यंत्रों से ही क्यों न की गयी हों। कुछ और भी कारण है, जिनमें नजदीकी इकाई की ऊर्जा और चुम्बकीय शक्ति प्रमुख हैं। कहीं कहीं ये इस प्रकार कई के एक साथ मिल जातें हैं कि इनका विश्लेषण करना बहुत कठिन हो जाता है। समानता ही इस विज्ञान का सबसे बड़ा प्रमाणिक होने का सार है। और यही मेरी कसौटी भी रही है। अभी तक हम जहां भी उलझे हुए हैं, वहां इस समानता का परीक्षण ही चाभी है।

 मुझे इस जटिल रहस्य को जानने में ३३ वर्ष लग गए। परिश्रम तो मेरा ही था, पर मुझे मार्ग दिखाने वालीं ऐसी शक्तियाँ थीं, जिनकी चर्चा करना बेकार है। कोई विश्वास नहीं करेगा। इसकी जरूरत भी नहीं है। कैसे? … कोई मायने नहीं रखता। जो मैं बता रहा हूँ, उसका परीक्षण कीजिये, सत्य का ज्ञान स्वयं हो जायेगा। रास्ते आगे स्पष्ट होंगे। इसके लिये वैज्ञानिक होने की जरूरत नहीं है। कोई इंटर के विज्ञान का स्टूडेंट भी प्रत्यक्ष परीक्षण कर सकता है।

इस तत्व में अंतरधारायें चलतीं हैं और इन पर इसी के पावर स्पर्म बनतें हैं। ये इसी तत्व की झागनुमा संरचनाएं होतीं हैं। आधुनिक शब्दों में इसे चार्ज कहा जा सकता है, पर यह जिस स्तर की उर्जा होती है, उसकी आधुनिक विश्व में कोई कल्पना नहीं है। इन धाराओं के टकराने से एक विस्फोट होता है। यह भौतिक जगत का विस्फोट नहीं है। एक सूक्ष्म तरंगों का सर्किल फैलता है और उसके मध्य में क्रिया प्रारम्भ हो जाती है।

यह क्रिया वही होती है, जो चक्रवात या जल-भँवर में होती है। कारण भी वही होता है। विस्फोट के विन्दू पर घनत्व का कम हो जाना। इसे भरने के लिये चारों और से धारायें दौरातीं हैं और एक नाचती हुई तश्तरी में रस्सियों जैसी धाराओं से एक पिरामिड बनता है। तश्तरी के साथ यह भी नाच रहा होता है और इसकी गति भयंकर होती है, क्योकि घर्षण और आकर्षण नहीं के बराबर होती है। इस पर तेजोमय तत्व में घूमने के घर्षण से अंतर धाराओं से अलग प्रकार की सूक्ष्म-उर्जा का चार्ज बनने लगता है। जो नुकीले हिस्से पर संघनित होता है। इसके मध्य में घूर्णनबल नहीं होता , इसलिए एक नली जैसी स्थिति में गैप बनता है, जिसमें मूलतत्व शुद्ध रूप में भरा होता है। यहाँ एक बात स्पष्ट जानना चाहिए कि यह तत्व विकार युक्त नहीं होता। केवल घूर्णन और उससे बनाने वाले विशेष प्रकार के सर्किट का अंतर ही इसमें भिन्न भिन्न गुण उत्त्पन्न करता है और यह एक ही तत्व अनेक रूप धारण कर लेता है।

गौतम के न्यायसूत्र के अनुसार  हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। इस संरचना की प्रतिक्रिया में ठीक ऐसी ही दूसरी संरचना इसके विपरीत प्रगट होती है । यह आयतन, धाराओं और घूर्णन गति में समान होती है, पर घनत्व में अंतर होता है । इस पर भी चार्ज बनते हैं , पर वे विपरीत प्रकृति के होते हैं । उल्टा होने के कारण दोनों के शीर्ष आमने सामने होते  है और विपरीत आवेश के कारण दोनों खिंच कर एक दूसरे में समा जातें हैं ,पर तब तक इनकी आकृति बड़ी हो जाती है ।इनके दोनों शीर्ष के मध्य विस्फोट होता है और एक सूर्य जैसी महाप्रकाश की उत्पत्ति होती है । इसके दोनों और डमरू का दोनों हिस्सा होता है।

नाचते हुए ये शंकु एक दूसरे के पेंदे के मध्य में टकरातें हैं और वहाँ भी दोनों ओर विस्फोट होता है। एक तीसरा विस्फोट धूरी के मध्य होता है। ये सब ज्ञात नियमों से होतें हैं। ये ही नियम ब्रह्मांड के हर क्षेत्र, हर इकाई पर व्याप्त हैं। मध्य का विस्फोट और नाभिक की उत्पत्ति धूरी की नली में प्रेसर बढ़ने के कारण होता है, क्योकि यह संरचना कुछ निश्चित नियमों से स्वचालित हो जाती है।

इस तरह तीन उर्जा उत्पादन विन्दू बनतें हैं, धूरी के शीर्ष और नीचे के पोल पर दो, धुरी के मध्य में एक। यही पहले परमाणु का भ्रूण है। यही विकसित हो कर सुपर ऐटम बनता है और यही ब्रहमांड और उसकी इकाइयों की उत्पत्ति करता है। डिटेल एक एक कर समझना होगा। सबसे पहले इस परमाणु की उत्पत्ति संरचना को समझना होगा। तभी आगे की विकास प्रक्रिया समझ में आएगी।

वैदिक ग्रंथों में इसे धरती (निगेटिव आधार),  आकाश (पोजिटिव), एवं सूर्य (नाभिक) की उत्त्पत्ति कहा गया है। इन शब्दों के आधुनिक अर्थों को प्रयोग करके इस कथन की भारी आलोचना भी हुई है।

प्रथम परमाणु की उत्त्पत्ति

सरल नियमों से जटिलतम धाराओं से बनी पहली संरचना

प्रथम चरण

जिन नियमों से इस मूलतत्व में पहले परम परमाणु (सुपर ऐटम) की उत्पत्ति होती है, वे सारे नियम विज्ञान के जाने पहचाने नियम हैं। इन नियमों का ज्ञान वैज्ञानिकों को ही नहीं, सामान्य विज्ञान के छात्रों को भी है। यद्यपि ये एक से दूसरे की उत्त्पत्ति करते हुये मकड़े के जाले के समान नियमों का एक विशाल नेटवर्क बना लेते हैं। पर इस परमाणु में ही नहीं ब्रहमांड और इसकी सभी इकाइयों  की उत्पत्ति में ये नियम जाने-पहचाने हैं। वैज्ञानिकों ने इन नियमों को दूसरे सम्बन्ध में ढूढ़ा है, पर ये नियम यहाँ उत्त्पन्न होतें हैं। सृष्टि के प्रारम्भ में।

पहला पराविस्फोट

यहाँ परा का अर्थ है, ब्रहमांड से परे यानी तब जब ब्रहमांड नहीं था। मूलतत्व एक सुपर इनर्जेटिक  तत्व है। यह सूक्ष्मतम और विरल भी है। स्वभाविक है कि इसमें आंतरिक धाराओं की गति होगी। इस गति का कारण भी आगे बताया गया है, क्योकि यहाँ उसे समझना मुश्किल होगा। इसमें अतरधारायें चलतीं हैं और सुपर इनार्जेटिक होने के कारण इन धाराओं पर इसके ही झागनुमा आयन बनते हैं, जिन्हें आधुनिक भाषा में हम आवेश कह सकते हैं, पर ये जिस स्तर के होते हैं, वैसे आवेश ब्रहमांड में नहीं पाए जाते।

इस प्रकार की दो या दो से अधिक अंतरधारायें जब विभिन्न पोटेंसी पर आपस में टकराती हैं, तो एक विस्फोट होता है। इस विस्फोट के साथ ही विस्फोट विन्दु पर घनत्व कम होता है और चारों और से धारायें केन्द्रभिगामी हो कर मध्य विन्दु पर टकराती हैं। वहां वे सर्पिल स्प्रिंग की तरह शंक्वाकार रूप में ऊपर उठती हैं।

पहले शंक्वाकार भंवर की उत्त्पत्ति

इस विस्फोट के बाद एक शंक्वाकार पिरामिड जैसी संरचना ऊपर उठती है। इसका पेंदा एक आधे प्याले जैसी नाचती हुई उर्जा संरचना में होता है, जिसके पेंदे में चारों और से मूलतत्व की धाराये केंद्र की ओर प्रवाहित होती हैं। पिरामिड के मध्य में घूर्णन बल नहीं होता, इसलिए यहाँ मूलतत्व अपने स्वभाविक रूप में होता है। यहाँ आगे चित्र दिया गया है, पर यह आउटर स्केच है। इसके अन्दर जटिल संरचना होती है।

सारे चक्रवात, भंवर इन्हीं नियमों से बनते हैं।

दूसरे शंक्वाकार भंवर की उत्पत्ति।

पहले भंवर की प्रतिक्रिया में एक दूसरा भंवर उसके सामने उल्टा बनता है, यह सब प्रकार से पहले के समान होता है। केवल इसकी धाराओं में घूर्णन बल कम होता है। इसलिए घनत्व भी कम होता है। पहले पर घूर्णन बल ज्यादा होता है इसलिए उसकी धाराओं में घनत्व अधिक होता है।

दोनों पर चार्ज की उत्पत्ति

ये दोनों भंवर उल्टा आमने सामने नुकीले प्वाइंट किये तीव्र गति से नाच रहें होते हैं, इनका घर्षण मूलतत्व से हो रहा होता है। इसलिए दोनों पर चार्ज बनते हैं। ये चार्ज और कुछ नहीं मूलतत्व के ही घूमते झाग जैसे कण होते हैं। दोनों में ये चार्ज समान होते हैं, पर घनत्व के अंतर के कारण ये भिन्न प्रकृति के होते हैं। पहले पर घनत्व अधिक वाले और दूसरे पर घनत्व कम वाले।इस प्रकार पहला निगेटिव और दूसरा पोजिटिव हो जाता है। इसके निगेटिव पोजिटिव का मापदण्ड मूलतत्व को पोजिटिव मान कर किया गया है और यही स्थिति प्रकृति की सभी उर्जाओं में नियम की तरह व्याप्त हैं। ये चार्ज दोनों के शीर्ष पर संघनित होते हैं, क्योकि वहाँ घूर्णन बल चौरे गोल बेस की अपेक्षा अधिक होता है।

खिंच कर एक दूसरे में समाहित होना।

दोनों पर भिन्न भिन्न प्रकार के पोजिटिव निगेटिव चार्ज होते हैं, इसलिए वे खिंच कर एक दूसरे में समां जाते हैं।

                                         स्वचालन और उसका कारण

दोनों शंकु जब एक दूसरे में समाते हैं, तो उनकी पोजिटिव निगेटिव धाराएँ एक दूसरे को काटतीं हुईं अन्दर जाती हैं। इससे उनमें कई तरह की उर्जा का उत्पादन होता है,

जो दोनों के शीर्ष पर चलीं जातीं हैं।  दोनों की मध्य नली एक दूसरे में समां जातीं हैं और उनका आयतन कम होने लगता है। दोनों के शीर्ष जब दोनों के पेंदे के मध्य पहुचने लगतें हैं, तो वहाँ स्फुलिंग होती है। दोनों ओर उर्जा की छतरी बनती है इससे मध्य-नली के दोनों मुंहाने पर मूलतत्व के बाहर निकलने के रास्ते बंद हो जाते हैं। नली में प्रेसर बढ़ जाता है और उसके मध्य विस्फोट होता है। मध्य में एक और उर्जा उत्पादन विन्दु उत्पन्न हो जाता है, इसके साथ ही चार्ज समाप्त हो जाता है।

चूंकि दोनों शंकु एक ही दिशा में नाच रहे होते हैं, इसलिए चार्ज समाप्त होते ही ये अलग हटने लगते हैं। ये पूरी तरह अलग नहीं हो पाते , क्योकि पोजिटिव निगेटिव कई सर्पिल धाराएँ एक दूसरे को काटती हुईं इनको जकड़े रहतीं हैं। इन क्रास प्वाइंट पर दो पोटेन्सी की धाराएं टकरातीं हैं, इसलिए यहाँ भी विस्फोट होता है और सभी क्रास प्वाइंट पर यही डमरू जैसी संरचना उत्पन्न होती है, जो अपने अन्दर भी मध्य में विस्फोट कर रही होती है। यानी प्रथम परमाणु की ही संरचना सामान क्रियाओं के साथ यहाँ बीज रूप में बनती है। प्रारम्भ में ये बहुत ही सूक्ष्म होतीं हैं।

दोनों शंकु पर फिर चार्ज बनते हैं, एक सीमा तक संघनित हो कर वे फिर पेदों से टकराते हैं, फिर डिस्चार्ज हो कर दूर हटते हैं ,फिर चार्ज हो कर टकराते हैं।

इस प्रकार सर्पिल धाराओं से बनी एक डमरू जैसी संरचना तीव्र गति से नाचती हुई तीन उर्जा विन्दुओं से जलते बुझते क्रम में तीन प्रकार की उर्जा का उत्पादन करनें लगतीं हैं।

                                           नारंगी जैसा पुच्छल तारा

इसके साथ ही कई घटनाएं घटतीं हैं। अर्धप्याले के उठे हुए किनारे नाचते हुये लहरें काटतीं हैं और उनकी लहरें आगे बढ़ कर एक दूसरे से टकरातीं हैं। और पूरा डमरू एक गोल उर्जा खोल में ढक जाता है, और एक गोल खोल बन जाता है। जिसके दोनों पेंदों के मध्य मूलतत्व के प्रवाह के कारण गह्वर बन जातें हैं। इस खोल की धाराएं भी जटिल संरचना में होतीं हैं। दोनों ओर गह्वर होता है और इसकी आकृति नारंगी जैसी हो जाती है। और भी अनेक क्रियाएं भी साथ ही उत्पन्न होतीं हैं।

शीर्ष के पेंदे से टकराते ही चार्ज ख़त्म हो जाता है और घूर्णन के कारण दोनों शंकु-भवर दूर होने लगते हैं। फिर चार्ज बनता है और संघनित होने पर ये फिर खिंच कर टकराते हैं। इस तरह एक स्वचालित पम्पिंग शुरू हो जाती है। धूरी की नली का आयतन बढ़ता है, तो मूलतत्व अन्दर जाता है और सिमटता है, तो प्रेशर से सभी धाराओं के मध्य में अपना प्रेसर बढा देता है। इससे ही मध्य में नाभिक की उत्पत्ति होती है और अगली क्रियाएं चलती हैं। जब दोनों शीर्ष पेदों से टकराने लगतें हैं, तो तीनो विन्दु से तीन तरह की उर्जा का उत्सर्जन होता है। जब शंकु हटते हैं, तो वे बुझ जाते हैं। फिर टकराने के समय उत्सर्जन होता है।

इस तरह एक जलते-बुझते पुच्छल तारे का जन्म होता है, जिसके शीर्ष से फव्वारे छूट रहें होते हैं और निगेटिव पेंदे से जेट जैसी उर्जाधारा, जो आगे जा कर छितरा जाती है। ये दोनों मध्य नली की उर्जा धाराओं में प्रेसर के कारण होते हैं। इस प्रकार यह पुच्छल तारा का, जो नाचते हुए तीव्र गति से आगे बढ़ रहा होता है। इसकी धूरी पर तीन और शरीर में अनेक उर्जा उत्पादन विन्दु होते हैं, जो जल बुझ रहे होते हैं।

चित्र का विशेष स्पष्टीकरण

यह एक रफ स्केच है| मैं कंप्यूटर तकनीकी का ज्ञान नहीं रखता और जो मिल रहे है, मेरी बात समझ नहीं पा रहे|

अपनी फव्वारा उसी रूप में होता है , जिस रूप में पानी के कृत्रिम फव्वारे चलते है| नीचे का जेट उसी संरचना में होता है , जिसमें जेट बनाते है| आन्तरिक संरचनाये सभी ऊर्जा धाराओं की एक ही,  होता है, पर यह अत्यंत जटिल रूप , गति एवं दिशाओं में होती है| आगे समझाया गया है , जितना हमने उचित समझा है| उससे आगे की जटिलताओं को बताना या सार्वजनिक करना जनहित और राष्ट्रहित में उचित नहीं है|

पर यह क्रिया इतने तक ही नहीं होती। नाचते हुए इसका गोल कवर मूलतत्व में घर्षण करता है। इस कवर से भी अन्दर की उर्जा का विकिरण हो रहा होता है। वह अपने समीकरण में प्रतिक्रियात्मक उर्जा की लहरें उत्त्पन्न करने लगतीं हैं, जो इसको चारों और से ढक लेतीं हैं जहा ये अंत करतीं हैं, वहाँ भी एक उर्जा कवच बन जाता है। यह क्रिया उस कवच से भी होती है और इसकी कई पुनरावृति से किसी नक्षत्रिय पिंड का भौतिक अस्तित्व बनता है। सभी पिंडों तारों में वायुमंडल का निर्माण इस क्रिया से प्राप्त उर्जा से ही होता है। यह उर्जा उस पिंड या तारे के ही उर्जा समीकरण में होता है;क्योकि यह उसकी ही विकरित हो रही उर्जा के बाहरी उर्जा के घर्षण से बनता है। हर पिंड किसी डमरू जैसी धारा की संरचना में फंसा है, इसलिए उसके चारों और उन धाराओं का अस्तित्व होता है। इस प्रकार सभी का वायुमंडल अलग हो जाता है। यदि आप हर जगह अपने जैसा वायुमंडल , जो उन्हीं गैसों से बना हो, खोजते हैं, तो यह आपकी गलती होगी। वह समानता के नजदीक हो सकता है, समान कभी नहीं।

यह पुच्छल-तारा ही सृष्टि बीज है। पर यह इसकी उत्पत्ति इसका पहला चरण है। यह तीन स्टेप में पूर्ण होता है। यही वामनावतार है और पुरानों का ब्रहमा भी।

कुछ विशेष स्पष्टीकरण

  • इन धाराओं में कोई नया तत्व नहीं बनता। ये कई रूप में जटिलतम संरचना में होतीं हैं।पर इनमें मूलतत्व ही घूर्णन के बल से घनत्व परिवर्तन करके गतिशील होता है। जिन विन्दुओं से उर्जा का उत्पादन होता है; वहाँ भी कोई नया तत्व या उर्जा नहीं बनती, वे मूलतत्व के ही घूर्णन करते झागनुमा कण होते हैं। यहाँ भी केवल घूर्णन का ही अंतर होता है, जिससे इनके घनत्व में भी अन्तर आ जाता है और भिन्न भिन्न गुण उत्पन्न हो जाते हैं।
  • इस संरचना की मध्यनली में सेंटर होने के कारण घूर्णनबल नहीं होता; इसलिये यहाँ मूलतत्व अपने वास्तविक रूप में होता है। पर इसके ऊपर तीन लेयर होते हैं, जो डमरू जैसी धाराओं के घर्षण से बनते हैं। जब नाली का मुंह शंकुओं के दूर हटने से खुलता है, तो इसमें मूलतत्व अन्दर आता है और जब पेंदों पर स्फुलिंग होता है, तो बाहर निकल नहीं पाता, इससे इसके मध्य में विस्फोट होता है और नाभिक की उत्पत्ति होती है।
  • यह प्रेसर हमेशा नहीं रहता। डिस्चार्ज होते ही नली बड़ी होती है, मुंह भी खुल जाता है। इससे तीनों विन्दु पर उर्जा का निकलना बंद हो जाता है और साथ का विकिरण भी। शीर्ष के फव्वारे और पेंदे का जेट भी गायब हो जाता है। फिर मूलतत्व भरता है और पहले की तरह चार्ज हो कर दोनों शंकु  टकराते हैं। इस तरह यह तीन बल्ब वाला जलता बुझता गोला बन जाता है। फव्वारों से सांस चलने लगती है। निगेटिव प्वाइंट पर बननेवाली उर्जाधाराओं में घूर्णनबल और घनत्व अधिक होता है। इस कारण ये शीर्ष के फव्वारे से अधिक समय तक बने रहते हैं। इससे यहाँ हमेशा कुछ न कुछ उर्जा बनी रहती है और यह मुंह लगभग बंद रहता है। मूलतत्व का रास्ता केवल पोजिटिव प्वाइंट पर खुलता है। पर यहाँ भी वह शुद्ध रूप में अन्दर नहीं आता। इस प्वाइंट पर बननेवाली उर्जा की प्रतिक्रिया में इसके ऊपर जो पोजिटिव उर्जा बनती है, उसके मध्य में होता है।
  • सारे डमरू में दोनों शंकु की सर्पिल धाराओं में तीन लेयर होते हैं, इनके घूर्णन बल और घनत्व में अंतर होता है। ये तीनों तीन प्रकार के दोनों ओर के पेंदे की आकृति के कारण होता है। यह पेंदा वक्रीय होता है, इस कारण।
  • सभी धाराओं के मध्य में घूर्णनबल नहीं होता, इसलिए यहाँ भी मूलतत्व मकड़े की जाली की तरह केंद्र की मुख्यनली से जुड़ा सबके मध्य फैला रहता है। प्रेसर घटने बढ़ने से इन सूक्ष्म नलियों में भी इसका प्रेसर घटता बढ़ता है। यह पल्स में सारी धाराओं में दौड़ता है।

सनातन धर्म के विवरण

वैदिक ग्रंथों में इसे दो पाट के रूप में व्यक्त किया गया है। शैव तंत्र और देवी तंत्र में पहले शंकु को आद्या योनी और दूसरे शंकुको शिवलिंग कहा जाता है। इन दोनो के मिलन से अर्ध नारीश्वर की उत्त्पत्ति होती है। इसे सद्यशिव, राजराजेश्वर शिव, महाकाल आदि कहा जाता है। आद्य शक्ति का कोई रूप नहीं होता। यह योनिरूप होती है। इस पर इतना आवेश होता है कि यह सब कुछ भक्षण कर लेना चाहती है। इसलिए इसे योनी रूप महाकाली या कामख्या भी कहा जाता है। तंत्र शास्त्र में इसकी बहुत महिमा है। यही पहली शक्ति है, जो परमतत्व या शिव में उत्त्पन्न होती है। इसकी प्रतिक्रिया में ही शिवलिंग नामक उलटे शंकु की उत्त्पत्ति होती है। इन दोनों के समागम से ही सृष्टि है। इन समस्त कथन का अर्थ उपर्युक्त के आधार पर निकालिये।

दूसरा चरण

मुख्यनली में प्रेसर बढ़ता है, तो इसके मध्य में जो विस्फोट होता है। इस विस्फोट का भी कारण है। धूरी पर नली तीन उर्जा लेयर से घिरी होती है नीचे निगेटिव प्रकृति की, ऊपर पोजिटिव प्रकृति की। प्रेसर से ये भी केंद्र की और गमन करतीं हैं और आपस में टकरा कर विस्फोट करतीं हैं और नाभिक की उत्पत्ति होती है। पर मुख्यनली में विस्फोट का सिलसिला आगे भी जारी रहता है। निगेटिव प्वाइंट नाभिक और पोजिटिव प्वाइंट नाभिक के बीच पुन: विस्फोट होता है। अब यह परमाणु पाँच उर्जा उत्पादन विन्दुओं से युक्त हो जाता है। अन्य क्रियायें पूर्ववत चलतीं रहतीं हैं।

पञ्चतत्व : पञ्चदेवता

अब सनातन धर्म के उस कथन पर आइये , जिसमें कहा गया है कि शरीर पांच तत्वों से निर्मित है। यह आध्यात्मिक कथन चीन, जापान, थाईलैंड, कोरिया, नेपाल और बहुत से देशों एवं संस्कृतियों में उपलब्ध है। इसकी वैज्ञानिकों ने भारी आलोचना की है कि जिन पांच तत्वों का उल्लेख किया गया है, वे तत्व हैं ही नहीं। पृथ्वी ग्रह है, पानी रासायनिक यौगिक, वायु एक भौतिक मिश्रण है, अग्नि उर्जा है और आकाश का कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं है। यह पूरा कथन धार्मिक अंधआस्था है। मूर्खों का कथन।

परन्तु यहाँ एक अत्यंत साधारण किन्तु मूर्खतापूर्ण त्रुटि हुई है। वे इस बात पर विचार करना भूल गये कि जिस युग के कथन की वे समीक्षा कर रहें हैं। उस युग में तत्व किसे कहा जाता था और तत्व का अर्थ क्या है? इसका अर्थ उनका एलिमेंट नहीं है। तत्व का अर्थ है, जो खंडित नहीं किया जा सके यानी परमसार। तमाम उपनिषदों, गीता आदि में तत्व का यही अर्थ है। अब यदि किसी शब्द के साथ तत्व का विशेषण लगा है, तो उसका क्या अर्थ हुआ? यह तत्व के बाद की अवस्था के पांच सार का वर्णन है। शरीर का अर्थ मनुष्य मात्र का शरीर नहीं है। यह कथन कहता है कि कोई भी पदार्थ पाँच प्रकार की सारउर्जा से फ़ार्म होता है। यानी उसमें पाँच प्रकार की उर्जा होती है, जो उसके पाँच गुणों का निर्धारण करती है। इन उर्जाओं के समीकरण पर ही पदार्थ की पांच अवस्थायें होतीं हैं।

हमारे वैज्ञानिक तीन अवस्था को बताते हैं, पर हर पदार्थ से उर्जा का उत्सर्जन होता है। यह इसका अग्नितत्व है, जिसकी गणना उन्होंने की ही नहीं। पांचवीं अवस्था स्पेस में किसी पदार्थ के आयतन की है। यह एक ऐसी उर्जा के कारण होता है, जो क्षितिज में फार्म होती है। चित्र में इसे ०1 से दरशाया गया है।

यहाँ आधुनिक विज्ञान से आगे का भी कुछ है। वह यह कि पदार्थ की ठोस, द्रव, गैस, अग्नि, में परिवर्तित होना; इन उर्जाओं के समीकरण पर निर्भर करता है। ताप के प्रभाव से इन समीकरणों में अंतर होता है और रूप बदल जातें हैं। रूप बदलता है, यह तो आज ज्ञान में है, पर क्यों? यह यहाँ है।

पञ्चदेवता

ये पाँच प्रकार की उर्जा इस पञ्चमुखी परमाणु के पांच विन्दुओं से निकलती है। वहाँ क्रिया होती है। यह किसी शक्ति के कारण होती है। इसी शक्ति का नामाकरण पाँच देवताओं के रूप में किया गया है। मार्ग-भेद से इनके नामों और लिंग में अंतर हैं, पर गुणों के मानक पर ये एक ही हैं। 

आधुनिक युग के अनुसार समझें, तो यह उन पांच प्रकार की सार उर्जा के उत्पादन स्थल में क्रियारत शक्ति का उल्लेख है, जिससे भौतिक पदार्थों में पांच गुण उत्त्पन्न होतें हैं। तीन तो आधुनिक वैज्ञानिक भी मानतें हैं, ठोस, द्रव और गैस। इस कथन में कुछ अधिक है।  

तीसरा चरण

तीसरे चरण में सभी के मध्य विस्फोट होता है और चार और उर्जा उत्पादन विन्दु बन जाते हैं। यहाँ इस परमाणु की मध्यनली का विकास रुक जाता है ।इसके प्रेसर का मूलतत्व अब इसकी डमरू की धाराओं में प्रेसर बढाता है और वहा क्रास प्वाइंट पर उत्पन्न डमरुओं में प्रेसर से विकास होने लगता है। वे बड़े होने लगते हैं। इस प्रकार यह परमाणु अब ९ उर्जा विन्दुओं वाला बन जाता है । इन ९ उर्जाओं से 0 (मूलतत्व) के संयोग से इस ब्रहमांडरूपी अनंत साख्यिकी की इकाइयों से युक्त संरचना विकसित हो रही है।

नवशक्ति –

नौ देवियों की नवशक्ति , नवधाभक्ति, नौ दुर्गा ,आदि इन्हीं उर्जा विन्दुओं से सम्बंधित हैं। ये पुच्छल तारे की शारीरिक धूरी में हैं। हर इकाई में। इनसे निकलने वाली शक्ति अर्थात उर्जा की प्रवृति सब में एक ही प्रकार की हैं। यहाँ हम फिर एक बात कहना चाहेंगे कि इनका स्थूलरूप, इनकी मूर्तियाँ ध्यान के लिए कल्पित भाव मूर्तिया हैं। ये आदि उर्जारूप शक्तियाँ हैं। इनका कोई रूप नहीं होता। मानसिक शक्ति से इन उर्जाओं को संघनित करके प्रत्यक्ष किया जाता है। यह बहुत कठिन मानसिक साधनाओं से सिद्ध होतीं हैं। इसका सबसे सरल मार्ग उर्ध्वनाम्णाय है। इसके बहुत से मार्ग हैं, जिनमे अलग अलग तकनिकी से शरीर में इन उर्जाओं की प्राप्ति के लिए प्रयोग हैं। इन्हें ही हम साधना सिद्धि के नाम से जानतें हैं। यहाँ एक मूर्खता उन गुरुओं से भी हुई है, जो इन मार्गों के जनक थे। उन्होंने ज्ञान और नियम सूत्र को छोड़ कर सारा ध्यान प्रैक्टिकल पर लगा दिया और वे नियम सूत्र गायब हो गए, जो इनके आधार थे। हम यह कहना चाहतें हैं कि इनसे आज हम अनेक चमत्कारिक यंत्र बना सकते हैं, क्योंकि आज शरीर ही यंत्र नहीं रह गया है, अनेक सूक्ष्म उर्जा तरंगों के यंत्र बनाने की विधि उपलब्ध है। हमें पौराणिक फैंटम से निकलना होगा। उन कथाओं में हर बात सत्य है, पर वे रूपकों में कहे गए हैं। पञ्च तंत्र की कथाओं की तरह। यह उस युग की एक विधा थी। आप अपना पूरा विज्ञान जानिये। हर कथा का अर्थ मालूम हो जाएगा। मूल सार नियम और सूत्र तो इस परमाणु की उत्त्पत्ति, संरचना और क्रिया में ही सामने आ जातें हैं।

हम सभी वास्तविक धर्म जिज्ञासुओं और सिद्धि, साधना में लगे वास्तविक धर्म के मार्गियों से कहना चाहते हैं कि तरह तरह की वेश भूषा को धारण करके नौटंकी करने वाले चमत्कारी बाबाओं से बचें। ज्ञान प्राप्त करें। यह आपको स्वयं पूरा मार्ग दर्शन करेगा। आपको चमत्कार के अनंत मंजिलों तक पहुंचा देगा। इस ब्रह्मांड में कोई चमत्कार नहीं होता। जो होता है, नियमों से ही होता है। जिन्हें हम नहीं जानते उन नियमों से घटित घटना या फल हमें चमत्कार लागतें हैं। विज्ञान की माला जपने वालों को भी समझना होगा कि वे बहुत थोड़ी जानकारी पर इतर रहें हैं। गर्व का हाल यह है कि न प्रत्यक्ष का मानक है, न अनुभूतियों का मानक है, न प्रकाश से नीचे की सूक्ष्मता का ज्ञान है, न ही तारों से आने वाले प्रकाश के मार्ग का ज्ञान है, पर दूरी और अन्य सत्यों की रीडिंग परफेक्ट है। जीवन, चेतना, अनुभूति, आदि हर विषय पर केवल सिद्धांत हैं। मन की परिभाषा ज्ञात नहीं, पर पूरा मनोविज्ञान खड़ा है।

श्रीमान प्रधानमन्त्री को लिखे गए पत्र की प्रति

सेवा में :-

श्रीमान् प्रधानमंत्री,

भारत सरकार,

नई दिल्ली

विषय – सृष्टि के प्रथम परमाणु सुपर एटम की उत्पत्ति , संरचना एवं क्रिया के सम्बन्ध में |

मान्यवर ,

          मैं पहले भी इस सम्बन्ध में आपके कार्यालय को पत्र लिख चुका हूँ, पर शायद वह आप तक पहुंचा ही नहीं|

मैं कोई वैज्ञानिक नहीं हूँ| परन्तु 17 वर्ष की अवस्था से प्रबल जिज्ञासा के कारण मैं इस ब्रह्माण्ड के रहस्य को जानने के लिए पागलपन की हद तक प्रयत्नशील रहा हूँ| विज्ञान, धर्म, धार्मिक पंडितों के क्षेत्र में भटकता रहा हूँ, पर कहीं जिज्ञासा शांत नहीं हुई |

अपने ही स्तर पर प्रयत्न करना पड़ा, विज्ञान से लेकर सनातन धर्म के प्राचीनतम ग्रन्थों से बहुत सहायता मिली और इस समय में इस स्थिति में हूँ कि कंप्यूटर के विशेषज्ञ मिलने पर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को उत्पन्न होते, क्रिया करते दिखा सकू| मेरा आधार सनातन धर्म और उसके शैवतंत्र, देवीतंत्र की डिस्कवरी से सम्बन्धित है|

मैं जानता हूँ कि आपको विश्वास नही होगा| शायद हंसी भी आ रही होगी, पर यह सत्य है  कि जिन रहस्यों को जानने के लिए आज का सारा वैज्ञानिक जगत प्रयत्नशील है; उनका आदि और अंत कचरा समझकर फेंके इन विषयों में है, हालाकि यह टुकड़ों में है और रूपकों में है; पर इनकी सारा सत्य इशारों, संकेतो, चिन्हों में व्यक्त है| यद्यपि इसके एक एक बिंदु को समझने के लिए महीनों सर खपाना पड़ा है| इसका कारण यह है कि खुद सनातन धर्म के विद्वानों, पंडितों ने कथाओं को प्रतिष्ठित कर दिया है| विज्ञान गायब है|

मुझे किसी अनुदान, उपाधि , मान्यता , पुरुस्कार की जरूरत नही है| यह एक सुपर एटॉमिक एनर्जी साइंस है और इस देश की संस्कृति से सम्बन्धित है| इस राष्ट्रिय बौद्धिक सम्पत्ति पर पहला अधिकार देश की सरकार का होता है , इसलिए आपके पास इसका संक्षिप्त विवरण जो हर एक की समझ में आ जाये; इस पत्र के साथ संलग्न करके भेज रहा हूँ|

मैं पिछले 15 वर्षों से देश की यूनिवर्सिटीयों से सम्पर्क करता रहा, पर हर जगह मेरा उपहास उड़ाया गया| उनकी नजर में सपेरों, चरवाहों की संस्कृति में परमाणु विज्ञान की कल्पना भी नहीं की जा सकती| उन्होंने मुझे धार्मिक पंडित या बाबा समझ लिया| मेरी समझ में नहीं आया कि ये लोग किस प्रकार के विद्वान् है , जो पहले से सबकुछ जानते है और किसी विषय को देखना तक नहीं चाहते है|

मैं अपने विषय में यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैं कोई बाबा या धर्माचार्य नहीं हूँ| पेशे से साहित्यकार और कई राष्ट्रीय पात्र- पत्रिकाओं का सम्पादक रहा हूँ| इस समय इस प्राचीन विद्याओं के इसी रिसर्च के साथ 100 से अधिक पुस्तकें सारे राष्ट्र में बिक रही है|

मुझे आपसे केवल एक अनुरोध है| संलग्न सामग्री को किसी प्रमाणिक साइंटिस्ट को देकर विश्लेषण करवाएं और कुछ प्रथम दृष्टया पॉजिटिव दिखता हो, तो मुझे वैज्ञानिक क्षेत्र में सनातनधर्म के वैज्ञानिक क्षेत्र को वैज्ञानिक स्वरुप में  बताने का अवसर प्रदान करें|

मैंने स्व. वाजपई  जी से भी संपर्क किया था| कुछ किताबे भी दी थी, पर उनकी शुभकामना मुझे उनके एक सलाहकार से प्राप्त हुई बधाई के साथ| मूल आधार की कोई चर्चा ही नहीं थी|

संघ के तत्कालीन सर संघ चालक स्व. सुदर्शन जी ने मिलने के लिए बुलाया था; पर जहाँ उन्होंने बुलाया था , वहाँ वे आये नही| संघ के एक पदाधिकारी महनी जी ने कहाँ कि आपको नागपुर बुलाया है|  अर्थाभाव के कारण मैं वहां जा नहीं पाया| आपसे अनुरोध है कि देश के लेखकों, साहित्यकारों के लिए भी कुछ कीजिये| यहाँ प्रकाशन करोडो कमाते है, पर इनको जरूरतों के लाले होते है| यह एक आश्चर्य ही है कि 100 से अधिक हॉट केक की तरह बिकने वाली मूल्यवान पुस्तकों का लेखक अर्थाभाव के कारण मेरठ से नागपुर नहीं पहुच सकता| भारत का कॉपीराइट कानून एक्ट एक छलावा है| मनमाना प्रयोग हो रहा है| सरकारी तन्त्र कॉपरेट नहीं करता|

पर इस समय हमारे वर्तमान विषय पर ध्यान दीजिये| निश्चय जानिये, यह एक विशाल एनर्जी साइंस है, जो न केवल आज के विज्ञान की तमाम क्षेत्र के उलझनों को सुलझा सकता है, बल्कि धर्म के क्षेत्र में जो शिवलिंगों पर सर पटकते है, उन्हें भी प्रकाशित कर सकता है कि वे क्या है  और वास्तव में ऐसे उनकी कृपा प्राप्त की जा सकती है

                                                                   आवेदक

प्रेम कुमार शर्मा

श्रीमान कुलपति, डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय को लिखे गए पत्र की प्रति

सेवा में,                                                                            प्रेषक :

मान्यवर कुलपति,                                                                 प्रेम कुमार शर्मा,                                                                                                डाक्टर हरीसिंह गौर विश्व-विद्यालय,                                          

सागर, मध्य प्रदेश                                                                

विषय – एक विशेष सूक्ष्मतम परम परमाणु (एटम) की उत्पत्ति संरचना और क्रियात्मकता के शोध को मूल्यांकन करने के सम्बन्ध में| कृपया इसका मूल्यांकन करवाएं| विशेष जानकारी माननीय प्रधानमंत्री को लिखे पत्र एवं संलग्न शोध पत्र में उपलब्ध है|

मान्यवर ,

विषय ऊपर स्पष्ट है| मैं विज्ञान का डिग्री होल्डर नहीं हूँ, पर मैंने इस पर ३३ वर्ष काम किया है और जरूरत के हिसाब से वैज्ञानिक परिक्षण भी किया है|

यह शोधपत्र किसी मानक उपाधि या अनुदान के लिए आपकी सेवा में नहीं भेजा जा रहा| कृपया अपने भौतिक विभाग से इसका मूल्यांकन करवाएं और यदि इसमें कोई सार नजर आता है, तो अपने विश्वविद्यालय में इसपर एक कार्यक्रम रखें| मैं इसपर बहुत कुछ बताना चाहता हूँ, जो परमाणु –विज्ञान और पॉवर साइंस के विषय पर ही नहीं; देश मानवता और संस्कृती के लिए भी एक आयाम है|

विज्ञानं की डिग्री न होना ,कोई विशेष मानक नहीं है| स्वतंत्र अनुसन्धान पर ही आज का विज्ञान खड़ा है| इसे प्रमाणित किया जा सकता है और मैं प्रत्येक शंका का उत्तर भी देने के लिए तैयार हूँ|

ज्यादा परेशानी न हो, इसलिए इसका अत्यंत संक्षित प्रारंभिक सार ही संलग्न कर रहा हूं|

आशा है, आप अपेक्षित कार्यवाई करेंगे| 

इसे देश के कई विश्वविद्यालय में प्रेषित किया गया है| इसको विश्व स्तर पर भी प्रेषित करने की इच्छा है; पर देश में  कोई रिस्पांस मिल जायेगा तो आभारी रहूँगा|

प्रेम कुमार शर्मा

श्रीमान मोहन भागवत, सर संघ प्रमुख को लिखे गए पत्र की प्रति

सेवा में :-                                                                प्रेषक:

श्री मोहन भागवत                                                        प्रेम कुमार शर्मा,

सर संघ प्रमुख,                                                           पत्रकार, साहित्यकार एवं सनातन

नागपुर, भारत                                                            धर्म के शोधकर्ता,                                                                                                                                      

विषय– सनातन धर्म के परमाणु विज्ञान और पॉवर एनर्जी साइंस के के शोध के सम्बन्ध में| आपसे विशेष सहायता की आशा में|

मान्यवर ,

          यहाँ एक सूक्ष्मतम परमाणु की उत्पत्ति, संरचना ,क्रिया और उससे सनातन  धर्म की उत्पत्ति के शोध का सार संक्षेप संलग्न करके आपकी सेवा में भेज रहा हूँ|

सनातनधर्म यानी प्रकृति के शाश्वत नियम की उत्पत्ति इसी से होती है, क्योंकि यही   विकसित होकर ब्रह्माण्ड बन जाता है| जिन नियमों, क्रियाओं से इसकी उत्पत्ति, क्रिया और विकास होता है, वह इस ब्रह्माण्ड की हर इकाई पर व्याप्त है| स्वयं ब्रह्माण्ड पर भी| सनातन धर्म को इसी अर्थ में हमारे ऋषियों ने लिया था| हमारे सभी देवी–देवता, धार्मिक, चिन्ह, स्थल, आदर्श कथनों में इसी ऊर्जा जगत की बातें है, जो ऊर्जा विज्ञान का एक विशाल क्षेत्र है| क्योंकि यह ब्रह्माण्ड के ऊर्जा जगत का सार-सूत्र है|

मेरे पास विज्ञान की डिग्री नहीं है और भारत के विश्वविद्यालय सनातन धर्म और परमाणु विज्ञान के के नाम पर ही उपहास उड़ाने लगते है| वे इस सत्य से भी बेखबर है कि आज का सारा विज्ञान नन डिग्री के आधार पर खड़ा है और उन्हें ही पढ़ा कर वे डिग्री बाँट रहे है|

विधि के अनुसार परमाणु विज्ञान सम्बंधित कोई शोध पहले भारत सरकार को दिया जा चाहिए| मैं वाजपेयी जी से भी मिला था और स्व. पूर्ण संघ चालक सुदर्शन जी से भी पत्र द्वारा सम्पर्क किया था, पर इसका मूल्यांकन नहीं हो पाया| कारण मेरी आर्थिक दशा और उनका ऑफ रेकॉर्ड इसे किसी को देने की बात थी| मुझे इस देश के सिस्टम पर विश्वास नहीं, क्योंकि मेरा सारा जीवन पत्रकारिता  के वरिष्ठ क्षेत्र से जुड़ा रहा है|

इसलिए मैंने इसका अत्यंत संक्षिप्त सार संक्षेप प्रधानमंत्री मोदी जी को भेजा है; पहले भी संपर्क करने की कोशिश की थी, पर बात उनतक पहुँचती ही नहीं| पहले ही सेंसर हो जाती है, शायद|

इसलिए उनके पत्र सहित उस सार संक्षेप को आपके पास भेज रहा हूँ कि आप सनातनधर्म को वैज्ञानिक मंच पर लाने में मेरी सहायता करें| मैं अकेला बुद्धिजीवी हूँ, आर्थिक अपंग भी हूँ| आपका सहयोग आवश्यक है|

मैं किसी अनुदान, उपाधि पुरस्कार का आकांक्षी नहीं हूँ| मेरी केवल यही कामना है कि इस परमाणु ऊर्जा विज्ञान को, जो इस सृष्टि का पॉवर साइंस है; वैज्ञानिक मंच मिल सके| मैं विशेषज्ञ मिलने पर, कंप्यूटर पर सारा ब्रह्माण्ड उत्पन्न होकर विकसित होते दिखा सकता हूँ|

मुझे आपके सशक्त व्यक्तित्व के माध्यम से आपके विशाल संगठन से जुड़े वैज्ञानिकों या विज्ञान के विद्वानों का एक समूह चाहिए, जिनको मैं इसके बारे में बता सकू और चोरी का खतरा नहीं रहे| हमारे ऋषियों ने कहा है कि यह सनातन धर्म स्वयं अपनी सत्यता को प्रकाशित करता है; क्योंकि इसकी उत्पत्ति सत्य से होती है| वैज्ञानिकों के शंका का समाधान मैं करूंगा और प्रमाण के रास्ते बताऊंगा, जिन पर मैंने परीक्षण किया है|

प्रेम कुमार शर्मा

श्रीमान योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री, उत्तरप्रदेश को लिखे गए पत्र की प्रति

सेवा में :-                                                      प्रेषक:

श्रीमान योगी आदित्यनाथ,                                   प्रेम कुमार शर्मा,

मुख्यमंत्री,                                                       सनातन धर्म विज्ञान का

उत्तर प्रदेश,                                                     शोधकर्ता,

                            

विषय – विज्ञान की डिग्री ने होने के कारण एक महत्वपूर्ण परमाणु विज्ञान का मुल्यांकन नहीं हो पा रहा; आपके आदेश की आवश्यकता है|

शोध विषय–सृष्टि में सबसे पहले उत्पन्न  होने वाले परम परमाणु की उत्पत्ति ,संरचना , क्रिया  और उससे ब्रह्माण्ड के विकसित होने की प्रक्रिया| वह परमाणु जो ‘मैटर’ की उत्पत्ति करता है|

(विशेष जानकारी माननीय प्रधानमंत्री को  लिखे  पत्र से प्राप्त हो सकती है| मैटर भी संलग्न  है| आप से अनुरोध है कि स्वयं भी थोडा समय निकाल कर पढ़े, क्योंकि यह सनातन धर्म का सत्य पावर साइंस है. मूल्यांकन हो और इसे वैज्ञानिक मंच मिले तो मैं विश्व के किसी भी वैज्ञानिक को उनकी शंका का उत्तर दे सकता हूँ. हमारे इस कांसेप्ट को समझने के लिए वैज्ञानिक होना जरूरी नहीं है इसके लिए वैज्ञानिक होना जरूरी नहीं है|)

मान्यवर,

          मेरा बैकग्राउंड पत्रकारिता का रहा है| कई अखबारों पत्रिकाओ का सम्पादक रहा हूँ| वर्तमान में मेरी सौ से अधिक साहित्यिक, धार्मिक, दार्शनिक पुस्तकें प्रकाशित होकर देश –विदेश में बिकती है|

19 वर्ष की अवस्था से मैं किसी आंतरिक जिज्ञासा से ब्रह्माण्ड के रहस्यों को जानने के लिए प्रेरित हुआ| प्रारंभ तो विज्ञान से ही हुआ, पर असंतुष्टि सनातन धर्म  की ओर ले गयी| ३३ वर्ष के परिश्रम से बहुत से रहस्य उजागर हुए|

मैंने चाहा कि इनका वैज्ञानिक मूल्यांकन हो, यूनिवर्सिटीयों के चक्कर लगाये, पर सनातनधर्म का नाम सुनते ही वे उपहास उड़ाने लगे| मेरे पास विज्ञान की डिग्री नहीं है, इसलिए इसी आधार पर मेरी बात तक नहीं सुनी| रास्ते बंद हो गये|

मैंने वाजपेयी जी और पूर्व सरसंघ चालाक सुदर्शन जी से भी सम्पर्क किया था, उन्होंने रिस्पांस भी लिया, पर मै ऑफ रिकॉर्ड किसी को यह देने के लिए तैयार नहीं था, इसलिए आगे नहीं बढ़ पाया | कारण यह भ्रष्ट सिस्टम है, जिसके बारे में आप भी जानते है|

मैं आपसे किसी आर्थिक सहायता या अनुदान का प्रार्थी नहीं हूँ| मेरी प्रार्थना है कि किसी यूनिवर्सिटी को ऑन रिकॉर्ड मूल्यांकन के लिए भेज दें, ताकि मैं इस पर आगे बहुत कुछ बता सकू| यह विज्ञानं मानवता, सनातन धर्म, देश सबके लिए उपकारी है, ऐसा मेरा विश्वास है | एह एक परमाणु और उर्जा के विस्तृत आयाम का विज्ञान है. इसे मैं पुस्तक में सार्वजनिक करना नहीं चाहत. फिर सूक्ष्म बातें भी बतानी होगी और यह राष्ट्र हित में नहीं होगा.

विशान्त कुमार पटेल

धर्मालय सचिव

Ph- 8090147878

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