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शिव कौन हैं ?

सदाशिव=  एक अनंत तक फैला सारतत्व है .यह सांसारिक यानि भौतिक तत्व नहीं है .यह अनंत तक व्याप्त वह सार तत्व है ;जिसमें यह ब्रह्मांड एक चक्रवात की तरह उत्पन्न होता है.जैसे चक्रवात में नया कुछ उत्पन्न नहीं होता ,उसी प्रकार इस सदाशिव की धाराएँ ही ब्रहमांड को उत्पन्न करतीं हैं ,इसमें नया कुछ उत्पन्न नहीं होता .इकाइयों की विभिन्नता जीवों की अनुभूति क्षमता की मृगमरीचिका है, वस्तुतः यह केवल धाराओं के घूर्णन ,घनत्व ,आदि अनेक समीकरणों के अंतर से जीवों की अनुभूति क्षमता के अनुसार अनुभूत होनेवाली मृगमरीचिका है .इसमें नया कुछ नहीं बन रहा

यह सदाशिव वेदों का परमात्मा है. पुराणों का परब्रह्म, उपनिषदों का परमतत्व.

जाहि अनंत अखंड अछेद अभेद सुवेद बतावे .—-इस तत्व के फैलाव का कोई आदि अंत नहीं है .यह सर्व चेतन तत्व सर्वत्र व्याप्त है .स्थान का अस्तित्व इसके कारण है .

महाकाल =इस अनंत तत्व में बनाने वाली सदासिव का महाकाल रूप है . इसकी  आकृति मंदिरों में स्थापित शिवलिंग जैसी है . देवी भक्त इसे महामाया कहते हैं और आकृति भैरवी चक्र जैसी बताते हैं . बात एक ही है ,इन आकृतियों में कोई अंतर नहीं है .यह केवल देखने के कोण का अंतर है . यह ऋग्वेद का पुरूष है. यही श्री कृष्ण का वह विराट रूप है ,जो उन्होंने अर्जुन को ज्ञानदृष्टि दे कर दिखाया था ..यह आकृति नर्तन करते शिव की  है  . देवी भक्त इसे शक्ति कहते हैं ,पर वे भी कहते हैं कि शिव और शक्ति एक ही हैं और उन्हें एक -दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता .

शिव के अनंत रूप

इस प्रकृति में शिव के अनंत रूप हो जाते हैं .हम यहाँ कुछ मुख्य रूपों को सनातन विज्ञानं के अनुसार समझा रहें हैं


कैलासवासी शिव
जो ब्रहमांड है, वही इकाई है, के सूत्र पर समझें तो सर के चन्द्र के मध्य विन्दु रूप इनका स्थान है ,जिसका कनेक्सन पूरे शरीर से होता है .इससे ही सहस्त्रार चक्र विकसित होता है .इसके चारों  ओर जो उर्जा व्याप्त होती है ,वह पार्वती है वह दसों दिशा में व्याप्त  पुरूष में उत्पन्न होती है.  कैलाश यानी शीर्ष पर उत्पन्न होती है .

सतीपति शिव
इस चन्द्रमा से ऊपर एक उलटी शंकु रूप संरचना बनती है ,जो बड़ी तेजी से नाच रही होती है .इसके मध्य में घूर्णन बल नहीं होता ,इसलिए शिव का एक रूप यहाँ होता है .यह शरीर रुपी दक्ष प्रजापति के कारण उत्पन्न होने वाली संरचना है ,इसलिए इसे दक्षप्रजापति की पुत्री कहा जाता है .यह उत्पन्न हो हो कर चाँद के मध्य गिरती रहती है यानि अपनी आहुति देती रहती है .इसे ही ॐ में विन्दु के रूप में दिखाया गया है ..इस विन्दु में शिव  होते हैं .यह विन्दु शिव भक्तों का शिवसार है,गायत्री है, सावित्री है ,इसे ही गंगा भी कहा गया है .

राजराजेश्वर शिव शरीर के केन्द्रीय नाभिक के मध्य का विदु रूप शिव राज राजेश्वर शिव हैं .ये अनाहत चक्र के मध्य स्थित होते है .महर्षि रामानुज के विष्णु ,अघोर की काकिनी ,वैदिक आत्मा के सार यही हैं .इनका सम्बन्ध कैलाश पति शिव से होता है और वहां से ये अपने अस्तित्व का पोषण करते हैं .

कालभैरव यह मूलाधार के मध्य में होते हैं .काली की उत्पत्ति इनसे होती है और इन्ही से भैरव के आठों रूप उत्पन्न होते हैं .इससे आधार विकसित होता है .

प्राण उर्जा सार शरीर के सभी चक्रों [१०८+], रोम रोम तक पहुचने वाली उर्जा धाराओं के मध्य भी ये व्याप्त होते हैं. इसी कारण हमारा शरीर नहीं सड़ता और सेन्सिविटी  बनी रहती है.

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