शिव के सम्बन्ध में भ्रांतियां (रूप भेद का रहस्य)

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सबसे पहली भ्रान्ति, तो यह है की शिव का कोई मूर्त रूप है और वे किसी लोक में रहते हैं. सदाशिव निराकार परमात्मा का नाम है. उस परम तत्व का, जिससे यह सृष्टि बनी है. इस सृष्टि के समस्त रूपों में वही सार है. इस प्रकृति में उसके अनंत रूप हैं, पर सभी एक विशेष संरचना में हैं और, इस संरचना में उसके पञ्च रूप प्रमुख मानें गए हैं. हम भी उसी संरचना में हैं, इसलिए अपने शरीर में उनका स्थान जानना चाहिए.

एक रूप कैलास पति शिव का है, जो हमारे शीर्ष के चाँद के मध्य विन्दु रूप है. इनके चारों ओर पारवती का निवास है. इससे मस्तिष्क की जटाएं विकसित होतीं हैं. दूसरा रूप हमारे कंठ के मूल में हैं, जो रीढ़ और कंधे की जोड़ की घुंडी के मध्य है. इनसे हमारा भाव उत्त्पन्न होता है. तीसरा रूप केन्द्रिय नाभिक के मध्य है, जिसे राज राजेश्वर शिव कहा जाता है ये जीवात्मा के सार हैं. भोक्ता शिव हैं. चौथा रूप महाकाल भराव रूप है जो मूलाधार के मध्य है. महाकाली शिव इनकी ही शक्ति का नाम है.

मंदिरों में स्थापित सभी श्याम शिवलिंग मूलाधार के शिव का ही रूप है. ये केवल प्रतिक नहीं हैं, यहाँ एक विशेष विधि के प्रयोग से सच में शिव को अवतरित किया जाता है. पंचम रूप हमारे सर के चाँद के उपर अवतरित होता रहता है. ये सतीपति शिव हैं. शरीर रुपी दक्ष प्रजापति के हवन कुण्ड में लगातार उनकी आहुति हो रही है. यही हमारा अमृत है, जिससे हमारा जीवन है या पोषण है.

यह समूर्ण प्रकृति उन का महाकाल रूप है. काल का अस्तित्व इसमें है इसके बाहर नहीं. सभी शक्तियां इनके अन्दर ही होती हैं, इनसे बाहर नहीं. इसे ही ऋग्वेद में पुरुष के रूप में वर्णित किया गया है. यह केवल मार्ग भेद का अंतर है.

जो भी हम मानव जैसे रूपों को कलेंडर आदि में देखते हैं, वे ध्यान लगाने के लिए भावरूप हैं. प्राचीन कई ग्रंथों में प्राचीन आचार्यों ने इसे स्पष्ट किया है, यह तंत्र की किसी अमूर्त शक्ति को अपने शरीर में लाने की एक टेक्निक है. इन शक्तियों को मूर्त रूप में कहीं होने की बात सोचना घोर अज्ञानता है.

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