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शिवलिंग क्या है?

जब ब्रह्म विद्या को समझते नहीं तो तोता मार्का शास्त्र ज्ञान को प्रदर्शित मत करो। यह युग शास्त्र प्रमाण का नहीं प्रत्यक्ष प्रमाण का है।

तीन तांबे के ईयर फोन में कान की ओर लगे वायर जितने मोटे तार को ऐंठ कर रस्सी जैसा बनाओ। इन तारों से नीचे से लपेट कर तीन लेयर में लपेट कर शंकवाकार पिरामिड बनाओ।
जैसे पेड़ों में उपरी जड़ें धरती में ३० डिग्री पर लगी होती है, वैसे इन्हीं तारो को फैला कर इस पर मध्य में पिरामिड फिक्स करो।१ सी एम पिरामिड को लेते हुए धरती में तारों को चारों ओर फैला कर गाड़ दो। पिरामिड के व्यास से १० गुणा त्रिज्या वाली तांबे के पत्तर का चौकोर पिरा मिड
तार के पिरामिड से १८ गुणा ऊंचा बनाओ। मध्य में तार के पिरामिड को के कर इसे भी १५ गुणा ऊपर और ३ गुणा धरती में गाड़ दो। इसके ऊपर एक त्रिशूल लगाओ।
केवल तांबेवाले पिरामिड जैसा एक और बनाओ। इस पर भी त्रिशूल लगाओ। इसे उल्टा धरती में गड़े पिरामिड के के ऊपर लगाओ,। दोनों त्रिशूल की नोकें आमने सामने ३ एम एम की दूरी पर फिक्स हो।

ऊपर के त्रिशूल से एक वायर और नीचे के पिरामिड से एक वायर किसी सूक्ष्म इनार्जी मापक या फोटो प्लेट से जोड़ों। ।

तुरंत मालूम हो जाएगा कि यह क्या है। यह ब्रह्मांड की ऊर्जा से एक नए प्रकार की ऊर्जा प्राप्त करता है, जो स्वतंत्र रूप से ब्रह्मांड में नहीं पाई जाती। यह ऊर्जा हमारी खोपड़ी पर भी बन कर काक में गिरती है। यही वह अमृत है, जिससे ब्रह्मांड का हर प्राणी, हर इकाई जीवित है। वहां शिवलिंग और मंदिर स्वयं उसका ऊर्जा शरीर होता है। यह शिव(परमात्म तत्व) का अमृत सार है। इसी लिए देवी भक्त या शिव भक्त को कहा गया है कि स्वयं को शिव ही समझो।

सावधानी।

जुमेट्री का ख्याल रखें।
शिव लिंग यानी तार का पिरामिड बड़े पिरामिड के मध्य क्रास पवाइंट पर होना चाहिए।
त्रिशूल और ताम्र पत्र पिरामिड की हर चीज एक जैसी होनी चाहिए।
त्रिशूल के तीनों नोक बिल्कुल आमने सामने होना चाहिए।

मेरा ख्याल है कि यह यंत्र ब्रह्मांड के सिग्नलों को भी पकड़ सकता है, पर न मर पास साधन है, न वक्त।

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