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वैदिक परमाणु का रहस्य

यह परमाणु की गिनती क्या होती है?यह बात समझ से बाहर है। आप हमारे द्वारा वर्णित परमाणु को ; जो वैदिक परमाणु है जिसपर हमारे यहाँ कणाद एवं गौतम जैसे ऋषि काम करते रहे है। जिस परमाणु की व्याख्या पर सनातन धर्म का तमाम आध्यात्मिक जगत खड़ा है , वह परमाणु हमारी एक गणना के अनुसार 108 पॉवर 81 यानी 108 को 81 बार गुणा करने पर जो संख्या आएगी , प्रकाश कणों से यह इतने गुणा सूक्ष्म है। इसकी आधुनिक परमाणु से कोई तुलना ही नहीं है। यह वह कण है जिसको आज भी वैज्ञानिक ढूंढ रहे है कि वह मौलिक कण कौन सा है , जो मैटर का निर्माण करता है।इसका आधुनिक परमाणु से कोई भी तुलनात्मक अध्ययन अज्ञानता है।क्योंकि आधुनिक परमाणु उसकी अपनी ही परिभाषा के अनुरूप परमाणु नहीं है। क्योंकि परमाणु का अर्थ वह सबसे सूक्ष्म कण होता है ; जो खंडित नहीं किया जा सकता हो।आधुनिक परमाणु कई स्तर पर खंडित किया जा सकता है। इसलिए उसको परमाणु कहना सापेक्ष है। कभी कहा गया था इसलिए आज तक कहा जा रहा है। जब कहा गया था तब आधुनिक विज्ञान को ज्ञान नहीं था की इसे भी खंडित किया जा सकता है। पर जब बम बनने लगे खंडित करके ऊर्जा का उपयोग होने लगा , तो यह सिद्ध हो गया की इसे खंडित किया जा सकता है। और जिसे खंडित किया जा सके , वह परमाणु कैसा? हम जिसकी बात कर रहे है उसे आधुनिक विज्ञान मौलिक कण कहता है। और अभी तक उसके पास इसकी कोई रूप रेखा नहीं है।

प्रश्न यह उठता है कि मौलिक कण या आत्मा के बारे में प्रमाणिक रूप से इतना कुछ कैसे कहा जा रहा है? जबकि यह दुनिया के किसी भी माइक्रोस्कोप से ट्रेस नहीं किया जा सकता। इसका ज्ञान केवल मानसिक स्तर पर होता है और उसके लिए कठिन मानसिक परिश्रम करना होता है। हाँ, इसके बारे में उत्पत्ति, संरचना, क्रिया, आदि का जो विवरण है उसे इस सूत्र पर प्रमाणित किया जा सकता है कि जो नियम इसकी उत्पत्ति , संरचना एवं क्रिया के हैं , वे ही नियम सभी इकाइयों के हैं। मैं ५०० इकाइयों के परिक्षण किये है और पाया है की सब में यह नियम समान है। तो फिर इस अविश्वास का कोई कारण नहीं है कि सूक्ष्म स्तर पर ये नियम नहीं होंगे , कोई और होगा। सभी इकाइयों के परीक्षण में एक भी अपवाद सामने नहीं आया।जबकि सभी के स्तर और प्रकार अलग-अलग थे। जो कुछ भी आधुनिक विज्ञान का नक्षत्र , पिंड तारों आदि के बारें में ज्ञान है , वे भी इन्हीं नियमों के तहत निकले।अब आप बताये कि जब सर्वत्र परिक्षण से ये नियम सत्य हो रहे है , केवल कुछ जगह पर स्थानीय ऊर्जा धाराओं के कारण रूप गुण आदि में परिवर्तन है। परन्तु सब की क्रिया की समान है और सबकी उत्पत्ति एक प्रकार के नियमों से होती है, संरचना भी एक ही प्रकार की हैं। तो प्रमाण के लिए क्या चाहिए? ब्लैक होल का रहस्य जानना है, तो अमीबा का अध्ययन करो ।वैसे प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में पृथ्वी पर भी ऐसे छिद्रों के विवरण मिलते है जहाँ पदार्थ गायब हो जाता है और कहीं – कहीं उसमें अस्वाभिक परिवर्तन हो जाता है। भौगोलिक विवरण बदल जाने के कारण इनको ट्रेस कर पाना अब कठिन हो गया है

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