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विराट रूप वैश्म्पायर

श्री कृष्ण ने अर्जुन को जिस विराट रूप का दर्शन कराया था, वह यही ब्रह्माण्ड है। इसमें प्रतिक्षण जीवन-मृत्यु का तांडव चलता रहता है। वैदिक ऋषियों ने इसे ‘महामाया’ कहा है; क्योंकि यह विचित्र पॉवर सर्किट परमात्मा तत्त्व(मूलतत्व) की धारों से बना हुआ एक चक्रवात मात्र है। इसमें कोई नया ‘तत्व’नहीं बन रहा, बल्कि उसी मूलतत्व की धाराओं से बने सर्किटों का एक जटिल संयोजन है यह। इसके सर्किट बनते-बिगड़ते रहते है और निर्माण एवं विध्वंस की यही प्रकिया ‘जीवन और मृत्यु’ के नाम से जानी जाती है|

विचित्र मायाजाल है यह ब्रह्माण्ड। इसमें बन-बिगड़ कुछ नहीं रहा। हमें जो ठोस, द्रव, गैस, पृथ्वी, तारों, निहारिकाओं का अनुभव हो रहा है, वह हमारी अपनी अनुभूति है। हमारी इन्द्रियों की क्षमता सिमित है, इसलिए जब हम लोहे का एक टुकड़ा देखते है, तो उसके परमाणुओं और परमाणुओं में चलने वाली ऊर्जा धाराओं की अनुभूति नहीं होती और हम उसे ठोस लोहे के टुकड़ों के रूप में देखते हैं। हम देखते है कि हमारा एक शरीर है। हम उसे छूकर अनुभूत करते है, खाते-पीते, चलते, नाचते, गाते देखते है, परन्तु यह शरीर दिखाई ही नहीं पड़ता;क्योंकि यह भी उस सर्किट का एक हिस्सा मात्र है। इसमें भी ऊर्जा धाराएं ही चल रही है। इनमें भी ठोस कुछ नहीं है। यह केवल हमारी अनुभूति है|

इसीलिए वैदिक ऋषियों ने इसे ‘महामाया’ का नाम दिया है। यह मूलतत्व की धाराओं से बनी एक चक्रवात-जैसी संरचना है, जिसमें छोटे-बड़े असंख्य भंवर चल रहे है। ये भंवर ही एक दूसरे को अनुभूत कर रहे है और प्रत्येक की अनुभूति क्षमता अलग-अलग है। इसलिए यह एक ही ब्रह्माण्ड अलग-अलग सर्किटों (जीवों) को अलग-अलग रूपों में अनुभूत होता है। इनमें कोई भी रूप वास्तविक नहीं होता|

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