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विद्युत् उत्पादन के रिसर्च का आधार-सूत्र क्या है?

आपका रिसर्च क्या है?

यह प्रश्न लगातार कई व्यक्तियों द्वारा फोन पर पूछे जा रहे है। इसके बावजूद कि मैं लोगों से हाथ जोड़कर कई बार प्रार्थना कर चुका हूँ कि कृपया हमारा ईमेल प्रयुक्त कीजिये। 25 हजार लोग जुड़े हुए है और प्रश्न सबके होते है, चाहे वह आध्यात्म के हों या अन्य विषय के। मैं यह नहीं कर सकता और मुझे गुस्सा आने लगता है; जो कि उचित नहीं है; परन्तु वेबसाइट (www.dharmalay.com) पर सारी जानकारी रहने के बाद भी लोग फोन पर डिस्कस करने लगते है और इतना भी कॉमन सेंस भी नहीं रखते कि सात बजे सुबह से 11 बजे रात तक कभी भी फोन करके बहस छेड़ देते है। यह सोचने का कष्ट नहीं उठाते कि एक कंप्यूटर भी यह नहीं कर सकता। फोन फेल है। एक बात होती रहती है, तब तक चार मिस काल आ जाते है। कृपया अपने बारें में मत सोचिये। मेरे बारें में भी सोचिये। क्या मेरा अपराध यह है कि मैं डायरेक्ट फ़ोन पर उपलब्ध होता हूँ?

मैं पहले भी स्पष्ट कर चुका हूँ कि बिजली बनाने के लिए मैं अपने रिसर्च में नहीं उतरा था। यह चर्चा पुष्पक विमान बनाने की चर्चा में सामने आई है। वस्तुतः यह पुष्पक विमान का भी रिसर्च नहीं है। यह रिसर्च था ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति , इन चाँद-तारों का रहस्य, जीवन-मृत्यु का रहस्य, इस सृष्टि की क्रिया के रहस्य से सम्बंधित। प्रारंभ में तो एक ही प्रश्न दिमाग में था कि यह विचित्र अजूबा क्या है और इसमें हम क्या है? हम कहाँ से आते है , कहाँ चले जाते है? इसका प्रारंभ मैंने यह जानने से किया कि पदार्थ यानी मैटर क्या है? क्या यह शाश्वत है ? और निरंतर आधुनिक विज्ञान के ही माध्यम से इनका प्रश्न ढूंढता रहा; पर कहीं कोई संपूर्णता नहीं थी। एक गोला फट गया, सूर्य-तारे बन गये, सूर्य फटा तो पृथ्वी बन गयी। एक बच्चे के बकवास के अतिरिक्त कुछ नहीं था। ढेर सारे प्रश्नों का कोई उत्तर उपलब्ध नहीं था। जीवन-पानी-ऑक्सीजन कार्बन आदि रसायनिक पदार्थों की उत्पत्ति है; पर प्रमाण नदारद थे।

जब रास्ता न हो, तो निराशा हाथ लगती है। मैं भी पढाई के बाद भौतिक जीवन में लग गया और बी.ए. मात्र होकर भी दो राष्ट्रीय पत्रिकाओं का संपादक बन गया। धीरे-धीरे ये लाखों में बिकने लगी। प्रतिष्ठा थी, अधिकार था, सुखमय जीवन था; पर जिज्ञासा का अधूरापन असामान्य किये रहता था। यहीं एकाएक मुझे एक उपनिषद् मिला। मैं समय व्यतीत करने के लिए उसे पढने लगा। धर्म के प्रति आस्था रखते हुए भी मेरे मन में कोई विशेष आस्था नहीं थी।पर इसको पढ़ते-पढ़ते मैं चौक पड़ा। जो मैं जानना चाहता था, वह यहाँ था। इसके बाद मैं संस्कृत के पुराने साहित्यों को पढने लगा। श्लोक रटने या शाब्दिक अर्थ जानने या धार्मिक मोक्ष के लिए नहीं। इसलिए कि वे वास्तव में क्या कह रहे थे। बातें आधी-अधूरी थी; पर गले से उतरने वाली थी। मैंने रिजाइन कर दिया। घर चला गया और आस-पास आसाम, नेपाल आदि में साधकों आदि के बारे में जानकार मिलने लगा। समय बीतता गया, पर यह न रुका और इसी विषय के रिसर्च के आध्यात्मिक स्वरुप की वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए लिखी गयी पुस्तकों पर प्राप्त अल्पधन से मेरी भौतिक जरूरतें पूरी होने लगी।

और फिर एक दिन सारे रहस्यों की जानकारी पूर्ण हो गयी और मैं हक्का-बक्का था कि क्या वे प्राचीन ऋषि मुनिगण मनुष्य थे? यह एक विशाल ऊर्जा विज्ञान था; जिसमें सृष्टि का प्रत्येक रहस्य छुपा हुआ था। यह टुकड़ों में नहीं था, जैसा कि आधुनिक विज्ञान था। यह ‘0’ से उत्पन्न होने वाली अनंत ऊर्जा सांख्य की और उसकी रहस्यमय उत्पत्तियों को बताने वाला विज्ञान था। इसमें आधुनिक शब्दों में कहे तो कहा गया था –

“यह सारा ब्रह्माण्डीय अजूबा एक ऐसे तत्व में उत्पन्न होता है; जो भौतिक नहीं है। यह एक अद्भुत तत्व है, जो अनंत तक व्याप्त है; सर्वचैतन्य है।इसमें कोई क्रिया नहीं है, क्योंकि दूसरा कोई है ही नहींकि यह कोई क्रिया करें। यह अजन्मा और शाश्वत है। इसका विनाश भी नहीं होता।यह ब्रह्माण्ड इसकी ही धाराओं से उत्पन्न एक भँवर मात्र है; जो एक सर्किट बना रहा है और अपने अंदर अनंत सर्किटों को उत्पन्न कर रहा है। सर्किट ही सर्किट को अनुभूत कर रहा है; पर प्रत्येक की अनुभूति क्षमता भिन्न-भिन्न है, इसलिए यह एक ही ब्रह्माण्ड अनंत रूपों में अभिव्यक्त हो रहा है। जिसमें से इसका एक भी स्वरुप वास्तविक नहीं है। वास्तव में तो यह कोई उत्पत्ति ही नहीं है। इसमें केवल ‘तत्व’ की धाराएं है, दूसरा कुछ भी नहीं।”

यहाँ हम बता दें कि उपनिषदों एवं गीता में इसे ‘तत्व’ (जो विच्छेदित, खंडित न हो) कहा गया है। कहीं इसे परमात्मा (परमसार), कहीं सदाशिव, कहीं परब्रह्म कहा गया है। इस फैंटम से बाहर निकलिए कि यह परमात्मा कोई चक्रधारी महापुरुष है। वेद उपनिषदों में इसका वर्णन इसी रूप में है। निष्क्रिय, निराकार, निर्गुण, निर्मल, अघोर तत्व के रूप में। वाममार्ग का सदाशिव, अघोर भी यही है। यह पूरी तरफ एक वैज्ञानिक अस्तित्त्व है। कोई अंधी आस्था नहीं।

इन ऋषि मुनियों ने तत्कालीन रूप में जो कुछ कहा है , वह धार्मिक तानों-बानों में लिपटा है; क्योंकि विज्ञान ही धर्म का आधार था।एक विज्ञान क्षेत्र था, दूसरा प्रयोग क्षेत्र; पर इसका स्वरुप सार इस प्रकार है –

“इस परमतत्व में एक नन्हा परमाणु उत्पन्न होता है। यह शाश्वत नियमों एवं क्रियाओं से उत्पन्न होता है। फिर यह कुछ शाश्वत नियमों एवं प्रक्रियाओं से अपना विस्तार करता हुआ एक से अनेक रूपों में ढ़लता हुआ विशालकाय ब्रह्माण्ड बन जाता है।”

“वस्तुतः यह परमाणु या इसका विस्तार परमतत्व की धारओं से बनने वाला एक सर्किट है; जो नौ मख्य ऊर्जा उत्पादन बिन्दुओं को केंद्र में लिए उनके समीकरणों से ही अपना विस्तार कर रहा है।जिस प्रकार 0 से 9 तक के अंकों से अनंत सांख्यकी की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार 0 से 9 ऊर्जा प्रकृतियों के समीकरणों से अनंत ऊर्जा समीकरणों की उत्पत्ति हो रही है और यही ब्रह्माण्ड है।

इसका दूसरा भाग कहता है कि जो नियम और प्रक्रिया ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति , संरचना, विकास और संहार के है ; वे ही नियम एवं संरचनाएं, वे ही क्रियाएं – इसकी हर इकाई पर लागू है। सबकी संरचना भी एक ही है और क्रिया भी ये शाश्वत नियम है। परमात्मा रुपी उस ‘0’ तत्व से उत्पन्न होते है। ये सभी पर समान रूप से लागू है। ब्रह्माण्ड नष्ट होकर हजार बार बने; नियम यही रहेंगे। इसीलिए इन्हें ‘सनातन धर्म’ (शाश्वत नियम) कहा गया है। ये परमात्मा से उत्पन्न होकर ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति , क्रिया और संहार को संचालित करते है और इसके नष्ट होने पर पुनः तत्व में विलीन हो जाते है।

इसका विस्तार –

  1. जीव की उत्पत्ति और जीव का रहस्य ( यह न्यूक्लियर फ्यूज़न है, न कि रसायनिक पदार्थों के संयोग की उत्पत्ति)
  2. पृथ्वी के जंतु जगत और वनस्पति जगत की उत्पत्ति का रहस्य
  3. चाँद, तारों , सूरज, निहारिकाओं की उत्पत्ति का रहस्य
  4. आकाशीय पिंडो में ऊर्जा उत्पादन , उसकी घूर्णन गति एवं परिक्रमा गति का रहस्य
  5. इन पिंडो पर गैसीय आवरण का रहस्य

आदि-आदि इतना विस्तृत है कि इसकी सूची ही 200 से अधिक पेजों में होगी। आश्चर्य यह है कि यह शुरू से एक-एक स्टेप है और प्रारंभ से अंत तक जो भो होता है, वह सब आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी ‘हाँ’ में है। हमारे तमाम मन्दिर, पूजा, यज्ञ, साधनाएं, तन्त्र-मन्त्र, ज्योतिष, वास्तु, सिद्धि-साधनाएँ, देवी-देवताओं के पीछे आधार स्वरुप में यह विज्ञान है।इसमें स्पष्ट कहा गया है कि एक ही सर्किट है। यह अपने पॉवर-पॉइंटोकी क्षमता के समीकरणों में ट्यूंड होकर भिन्न-भिन्न गुणों को अभिव्यक्त कर रही है। बाहरी रूपों पर उसके वातावरण का प्रभाव है। यह विज्ञान इतने विस्तार में है या इसके सूत्र –नियम इतने व्यापक है कि यह ब्रह्माण्ड के हर रहस्य का ज्ञान थोड़े से परिश्रम से करवा सकते है।पृथ्वी और विज्ञान के कई अनसुलझे रहस्यों को बता सकते है।

अब मुसीबत यह है कि जब लोग पूछते है कि आपका रिसर्च कॉस्मिक एनर्जी से सम्बन्धित है क्या? बिजली में मैगनेट का क्या करेंगे? अच्छा… अच्छा… जीवन…मृत्यु पर रिसर्च है। कुछ संस्कृत के श्लोक सुनाने लगते है , तो कुछ यूरोपियन विज्ञान के अपने अधकचरे ज्ञान को उड़ेलने लगते है। मैं लाख समझा रहा हूँ कि आप (धर्मालय – www.dharmalay.com) का ‘ज्ञान क्षेत्र’ पढ़िए। वहां से संतुष्टि न मिले तो ‘मृत्यु के बाद’ साधना पॉकेट बुक दिल्ली (011-23822006) मंगवाकर पढ़िए; पर वे …….. नहीं .. नहीं कुछ बता दीजिये। क्या बताऊं मैं? यही पोस्ट मैं कम –से कम तीन बार कर चुका हूँ। क्या अब मुझे अलग-अलग व्यक्तियों से डिस्कस करना होगा? फिर एक विशालकाय महासागर के अनंत रूपों के बारें में अलग-अलग क्या बताऊं कि यह रिसर्च क्या है?

कृपया ध्यान रखें। यह एक विश्व की तक़दीर को बदल देने वाला ज्ञान है। इसकी जो भी अब तक मेरी पुस्तकों में अभिव्यक्ति की गयी है या धर्मालय में है उसका कोई यांत्रिक लाभ नहीं उठाया जा सकता; क्योंकि उसमें कई हजार गुप्त बातें नहीं है।फिर भी यदि कोई कुछ बना सकता है , तो बनाये। पर इस संस्कृति के साथ गद्दारी न करें।यह कहे कि यह सनातन धर्म के विज्ञान –सूत्रों पर आधारित है। माँ-बाप को प्रतिष्ठा देने से किसी की प्रतिष्ठा नहीं घटती। मुर्ख-अहंकारी ही स्वयं को ज्ञानी और बाप को मुर्ख चरवाहा सपेरा साबित करने लगते है।इस विज्ञान के नियमों एवं सूत्रों से हर प्रकार के यंत्र बनाये जा सकते है; क्योंकि इन नियमों – सूत्रों के अतिरिक्त कोई दूसरा विज्ञान है ही नहीं। आधुनिक आविष्कारों पर भी इसके सूत्र लागू अहि। उदाहरण के लिए – अपने स्वस्तिक को देखिये।यह कह रहा है कि ब्रह्माण्ड की हर इकाई या ऊर्जा बायें से दायें घूम रही है। यही सृष्टिक्रम है। इसके विपरीत दायें से बायें घूमना संहार क्रम है। किसी यंत्र में, कहीं भी ऐसे पेंच , बोल्ट लगाईये जो दायें से बायें घूम कर कसता हो।उस यंत्र का भगवान ही मालिक है । यही कारण है कि हर जगह बाएँ से दायें क्रम में ही इन्हें कसा जाता है। यह तो एक उदाहरण है । हर जगह ये नियम ही लागू है। हमारे आचार्य ने कहा है – “ जो तुम इसके विरुद्ध चलोगे, विनष्ट हो जाओगे” – यानी विपरीत नियमों से विनाश होगा, निर्माण नहीं।

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